शुक्रवार, 30 नवंबर 2007
गंदगी से लाखों गरीब लोग मरते हैं हर साल
यूएनओ की एक रिपोर्ट में बताया गया है, प्रतिवर्ष गंदगी के चलते 15 लाख बच्चे मर जाते हैं क्योंकि उनके पास साफ पानी, साफ-सफाई और शौचालय की सुविधा नहीं होती. महिलाओं और लड़कियों को इसकी मार अधिक झेलनी पड़ती है क्योंकि उन्हे मुंह अंधेरे उठ कर घर से बाहर शौच के लिए जाना पड़ता है.
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून और नीदरलैंड के प्रिंस विलियम एलेक्जेंडर यूएन मुख्यालय में 2008 को अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छता वर्ष के रूप में मनाए जाने की घोषणा करेंगे ताकि अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में इसे भी प्रमुखता से शामिल किया जा सके. प्रिंस एलेक्जेंडर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पानी एवं स्वच्छता को लेकर गठित किए गए सलाहकार मंडल के अध्यक्ष हैं.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के कार्यकारी निदेशक आन वेनेमन ने कहा कि विद्यालयों में साफ पानी, स्वच्छ शौचालय और हाथ धोने की समुचित व्यवस्था होने से लड़कियां ठीक से पढ़ पाती है. जिन 2.6 अरब लोगों को ये दिक्कतें झेलनी पड़ती है, उनमें 98 करोड़ बच्चे है.
संयुक्त राष्ट्र ने इन लोगों के लिए स्थितियां बेहतर करने की मुहिम में 10 अरब डालर खर्च करने की बात कही है ताकि 2015 तक इस समस्या से जूझने वालों की संख्या आधी हो जाए. भारत में परिस्थितियां अनुमान से कहीं बदतर हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में हालात आज भी उन्नीसवीं सदी जैसे ही बने हुए हैं.
गुरुवार, 29 नवंबर 2007
देश का सबसे प्रदूषित शहर कौन सा?
पर्यावरण और वन राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा ने लोकसभा में एक सदस्य के सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी हाल ही में दी है. उन्होंने बताया कि न केवल लुधियाना देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है, बल्कि पहले दस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में पंजाब के कई शहर शामिल हैं. इस सूची में दिल्ली का 16वाँ, कोलकाता का 39वाँ तथा मुंबई का 45वाँ स्थान है.
उन्होंने बताया कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के तहत 339 स्थानों पर परिवेशी वायु गुणवत्ता की निगरानी कर रहा है. शहरों की रैंकिंग प्राय: प्रदूषण के स्तर के आधार पर की जाती है. 2005 में एनवायरमेंटल सस्टेनेबिलिटी इंडेक्स पर एक अध्ययन किया गया जिसमें पूर्व के और मौजूदा प्रदूषण स्तरों सहित विभिन्न आँकड़े एकत्र किए गए. इसमें भारत का 146 देशों में 101वाँ स्थान है.
पिछले डेढ़ सौ सालों में छठा सबसे गर्म वर्ष
केन्द्र की ओर से इसकी शोध रिपोर्ट के आधार पर कहा गया था कि 1860 में तापमान की गणना शुरू होने के बाद लगभग 150 सालों में वर्ष 2007 सर्वाधिक गर्म रहेगा. जबकि इस साल के मध्य तक ही यह बात गलत साबित होना शुरू हो गई थी. जानकारों का मानना है कि इस आशंका को जाहिर करने के बाद पर्यावरण के प्रति दुनिया भर में चलाई गई मुहिम इस मामूली से सुधार का कारण हो सकती है.
बैक्टीरिया लड़ेगा ग्लोबल वार्मिग से
स्थानीय मीडिया के अनुसार सूक्ष्म जीव विज्ञानी डा. मैथ्यू स्टोट की टीम ने रोटूआ इलाके में हेल गेट नामक जगह पर इस बैक्टीरिया की खोज की है. हेल गेट की मिट्टी लवण, अम्लीय पदार्थो और मिथेन गैस से प्रभावित थी लेकिन ये बैक्टीरिया पृथ्वी के भीतर मौजूद मीथेन का भक्षण कर लेते थे और इस प्रकार यह गैस मिट्टी के अंदर ही स्वत: समाप्त होती रहती थी.
अपनी इस खोज के बारे में डा. स्टोट का कहना है कि ये बैक्टीरिया वातावरण में मीथेन गैस की मात्रा को काबू में करने के काम में काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं. मीथेन गैस को ग्लोबल वार्मिग के लिए प्रमुख उत्तरदायी गैस के रूप में माना जाता है. अब वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन बैक्टीरिया की मदद से मिथेन गैस के उत्सर्जन की समस्या से बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है.
फिलहाल तो डा. स्टोट की टीम इस बैक्टीरिया के बड़े पैमाने पर प्रजनन के काम में लगी है. वह विभिन्न जीव विज्ञानियों के सहयोग से इनको प्रयोगशाला में पैदा करने की तकनीकी ईजाद करने के मिशन में जुटे हुए हैं. उनका लक्ष्य यह है कि बड़े पैमाने पर बैक्टीरिया का प्रजनन कर मीथेन की मात्रा समाप्त करने में इसका इस्तेमाल किया जा सके.
बुधवार, 28 नवंबर 2007
तो डूब जाएंगे कोलकाता जैसे शहर
निकट भविष्य में समुद्र के जलस्तर कई मीटर बढ़ने से कोलकाता, ढाका और शंघाई जैसे कई एशियाई शहरों को खतरा होगा. इस भावी संकट से निपटने के लिए सभी देशों की सरकारों को फौरन प्रयास करने होंगे. 1961 से 1993 तक समुद्र का जल स्तर 1.8 मिलीमीटर सालाना की दर से बढ़ रहा था लेकिन पिछले चौदह वर्ष से इसकी रफ्तार 3.1 मिलीमीटर प्रति वर्ष हो गई है.
इस खतरनाक वृद्धि की वजह उत्तरी ध्रुव पर बर्फ की चादर का लगातार पतला होना है. इससे कोलकाता, ढाका और शंघाई जैसे तटीय नगरों को सबसे ज्यादा मुश्किलें होंगी. इसी कारण यह सदी खत्म होते-होते मछलियों की बीस से तीस फीसदी प्रजातियां खत्म हो सकती हैं. बढ़ते तापमान का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक ग्लोबल जीडीपी तीन प्रतिशत तक कम हो सकती है. लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान कृषि और वनस्पतियों का होना है. अफ्रीका की कई फसलों के लिए पानी की उपलब्धता आज से आधी होगी जबकि एशिया के तटीय नगरों में जहां डूब वाले क्षेत्र बढ़ेंगे, वहीं पीने का पानी बहुत कम मिलेगा.
इन हालात से निपटने के लिए पर्यावरण क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित संस्था 'इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज' के अध्यक्ष डा. आर के पचौरी ने कुछ उपाय सुझाए हैं. उनका कहना है कि आगामी तीन दिसंबर से बाली में होने वाले विश्व पर्यावरण सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र महासचिव और पूर्व अमेरिकी उप राष्ट्रपति अल गोर के मौजूद रहने से इन मुद्दों की गंभीरता बढ़ेगी. तकनीकी तौर पर पर्यावरण के मौजूदा खतरों से निपटने में हम सक्षम हैं लेकिन कोशिश फौरन करनी होगी.
डॉ पचौरी साधारण दिखने वाले उपायों पर जोर देते हैं. बकौल डा. पचौरी सार्वजनिक परिवहन के साधनों में वृद्धि सड़कों पर वाहनों की तादाद कम करेगी. लोगों को खुद भी रोज-रोज वाहन निकालने से बचना होगा. मकानों का नक्शा ऐसा बनाना होगा जिससे एसी की जरूरत कम हो. उनका मत था कि पर्यावरण के खतरों से आम आदमी को जागरूक करके ही लड़ा जा सकता है.
जलवायु परिवर्तन से निपटने को मदद मांगी
फाइटिंग क्लाइमेट चेंज ह्यूमन सोलिडरिटी इन ए डिवाइडेड वर्ल्ड शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में विकासशील देशों से आह्वान किया गया है वे जलवायु परिवर्तनों को सहने योग्य बुनियादी ढांचे सर्वाधिक खतरे का सामना कर रहे लोगों को अधिक सामाजिक सुरक्षा, सामुदायिक क्षमता का निर्माण तथा आपदा नियंत्रण को मजबूत बनाने के लिए अधिक प्रयास करें.
जलवायु परिवर्तनों को सहने के लिए होने वाले उपायों के वित्तपोषण के लिए रिपोर्ट में सिफारिश की है कि विकसित देश 86 अरब डालर की राशि अब से वर्ष 2016 तक विकासशील देशों को दें. रिपोर्ट जारी करते हुए योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दुनिया के सभी भागों पर पड़ेगा, खासकर दक्षिण एशिया पर अधिक. इन परिवर्तनों के चलते मलेरिया जैसी बीमारियां बढ़ेगी वहीं हिमालय के हिमनद तथा मानसून पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.
अहलूवालिया ने कहा कि इसलिए भारत को अकेले नहीं बल्कि सभी देशों को मिलकर इन परिवर्तनों को कम करने और इनके प्रभावों को सहने के लिए सामूहिक उपाय करने चाहिए. भारत में विकास कार्यो पर जलवायु परिवर्तनों के प्रभाव की चर्चा करते हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की स्थानीय प्रतिनिधि मैक्सीन ओलसान ने कहा कि भारत में लोगों के स्वास्थ्य शिक्षा और समृद्धि को सुधारने की दिशा में धीमी प्रगति हुई है. लेकिन अब भी काफी लोग विकास की दौड़ में पिछड़ रहे हैं.
ओलसान का मानना है कि अगर इन कमियों के होते हुए जलवायु परिवर्तन का खतरा भी आए तो असमानता बढ़ेगी. ओलसान ने कहा कि अगर देश को समग्र विकास की महत्वाकांक्षा को हकीकत में तब्दील करना है तो गरीब लोगों की क्षमता इन परिवर्तनों के सहने योग्य बनानी होगी.
मंगलवार, 27 नवंबर 2007
ग्लोबल वार्मिंग: कपड़े उतार कर विरोध
चेतावनी : कृपया ध्यान दें, इस वीडियो में न्यूडिटी है लेकिन अश्लील नहीं है. यह बच्चों के देखने के लिए नहीं है.
दिल मजबूत है तो देखें: जीव हिंसा के दृश्य
शिकार की तलाश
सोमवार, 26 नवंबर 2007
पर्यावरण अनुकूल उत्पादों का बाजार बन रहा है अब
लग्जर इंटरनेशनल का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग बढ़ रही है. वहां यह नया विचार है. हम तेजी से बढ़ रहे इस प्रचलन को भुनाना चाहते हैं. कंपनी ने बताया कि लग्जर की 75 देशों में पहुंच है और ब्रांड 125 देशों में पंजीकृत है. पिछले वित्त वर्ष में लग्जर ने 10 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 58 करोड़ रुपये की लागत वाले लेखन उपकरणों का निर्यात किया था.
कंपनी अपने उत्पादों को खुदरा स्टोरों जैसे वाल-मार्ट, आफिस-मार्ट को भी बिक्री के लिए बेचती है. गौरतलब है कि लग्जर लाइटिंग इंस्ट्रूमेंट ने नोएडा में पिछले साल 100 फीसदी निर्यात संबंधित विनिर्माण इकाई स्थापित की थी. कंपनी ने बताया कि उक्त इकाई. 25000 वर्ग फुट क्षेत्र में फैली है और इसकी विनिर्माण क्षमता लगभग 20 लाख लेखन उपकरणों की है. कंपनी ने पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को कंपनी की अनुसंधान एवं विकास दल से विकसित किया है. इन उत्पादों को रीसाइकिल्ड सामग्री से तैयार किया जाएगा.
पर्यानाद्: यह किसी कंपनी के प्रचार के लिए लिखा गया पोस्ट नहीं है. यह महज एक समाचार है. मेरा उद्देश्य सिर्फ यह बताना है कि अब पर्यावरण की चिंता समाज में एक स्थाई व्यवहार के रूप में स्थापित हो रही है. क्या ही बेहतर हो कि जब खरीददारी करें तो अन्य चीजों के साथ एक बार यह जानने का प्रयास भी करें कि आपके द्वारा खरीदा जाने वाला उत्पाद पर्यावरण अनुकूल है या उसे क्षति पहुंचाने वाला है्. इतना सोचने में तो कोई बुराई नहीं है.
नहीं रोकेगा जापान व्हेल का शिकार
एक बार फिर भारी विरोध के बावजूद जापान ने व्हेल के शिकार अभियान को जारी रखने की मंशा जताते हुए कहा है कि सुरक्षा कारणों से इसकी तिथि बाद में बताई जाएगी, जबकि व्हेल बचाने के हिमायती कार्यकर्ताओं के मुताबिक सरकार अंतरराष्ट्रीय टकराव से बचने के लिए अभियान में विलंब कर रही है, ना कि इसलिए कि व्हेलों की हत्या को लेकर उसके रवैये में कोई बदलाव आ गया है.
जापान ने अपने इस सालाना अभियान के तहत अंर्टाकटिक महासागर में एक हजार से ज्यादा व्हेल मारने की योजना बनाई है. इस योजना के चलते काफी समय से जापान के साथ आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड का तनाव चल रहा है. जापान ने पहली बार हंपबैक व्हेलों को पकड़ने की योजना बनाई है, जिसको लेकर पर्यावरणविदों में गुस्सा है. इस प्रजाति की व्हेल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय मानी जाती है और शिकारियों के बीच काफी लोकप्रिय है.
जापान के मत्स्य विभाग ने कहा है कि इसके पोत अभियान पर रवाना होंगे, लेकिन तारीख की घोषणा सुरक्षा कारणों से अभियान के केवल कुछ वक्त पहले की जाएगी. व्हेल शिकार विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि हमने जो दिन तय किया है, उसी दिन रवाना होंगे.
जापानी पोत व्हेल के शिकार के लिए आमतौर पर नवंबर में रवाना होते हैं. उधर, ग्रीनपीस संगठन ने आरोप लगाया है कि राजनीतिक कारणों के चलते शिकार अभियान को टाला गया. ग्रीनपीस के एस्परान्या के नेता कार्ली थामस ने कहा कि व्हेल का शिकार जापान एवं अमेरिका जैसे व्हेल संरक्षण समर्थक देशों के बीच राजनयिक तनाव का कारण है. एस्परान्या व्हेल के शिकारियों पर नजर रखने की कोशिश करेगी.
रविवार, 25 नवंबर 2007
प्राकृतिक आपदाओं में चार गुना वृद्धि
रिपोर्ट में कहा गया है कि आबादी में बढ़ोत्तरी के कारण लाखों की संख्या में लोग बाढ़ और तूफ़ान और चक्रवात के कारण प्रभावित हो रहे हैं. जलवायु परिवर्तन और मौसम में आ रहे बदलावों की वजह से बाढ़ या सूखा जैसी आपदाओं का सबसे प्रमुख कारण तापमान में बढ़ोत्तरी यानी ग्लोबल वार्मिंग को बताया गया है.
ऐजेसी के आंकड़े के अनुसार अब हर साल औसतन 500 आपदाएँ घटित होती हैं जबकि 20 साल पहले यानी 1980 के आसपास इनकी संख्या 120 हुआ करती थी. इसी तरह पिछले बीस सालों के दौरान बाढ़ की विभीषिकाओं में लगभग छह गुना बढ़त देखी गई है. ऑक्सफ़ैम के अनुसार इसी साल के दौरान सिर्फ़ एशिया महाद्वीप में ही बाढ़ से लगभग 25 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं.
छोटी आपदाओं की चिंता: ऑक्सफ़ैम ने कहा है कि आमतौर पर बड़ी प्राकृतिक आपदाओं पर ही सरकारों का ध्यान होता है, जबकि मौसम की गड़बड़ी के कारण छोटी और मध्यम दर्ज़े की आपदाओं को नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक साबित हो रहा है. ऐजेंसी ने चिंता जताते हुए कहा है कि ऐसी छोटी घटनाओं से प्रभावितों की संख्या ज्यादा होती है लेकिन इन्ही तक अंतरराष्ट्रीय सहायता या राहत सबसे कम पहुँच पाती है.
ऑक्सफ़ैम से जुड़े जॉन मैकग्राथ का कहना है,"आबादी में बढ़ोत्तरी के कारण लोग अब जंगलों और पहाड़ों की तरफ़ विस्थापित होने को मजबूर हैं जबकि ऐसे क्षेत्र ही आपदाओं के मामले में सबसे ख़तरनाक साबित होते हैं." ऐजेंसी के अनुसार राहत और सहायता उपलब्ध कराने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भविष्य में मौसम संबंधी घटनाओं से निपटने के लिए कमर कस लेनी चाहिए.
शनिवार, 24 नवंबर 2007
तितली की प्रजाति का नाम 40 हजार डॉलर में
फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने मैक्सिको के सोनोरान रेगिस्तान में उल्लू प्रजाति की एक तितली की खोज की और उसे नामित करने के अधिकरों को नीलाम करने का फैसला किया. तितली की इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम ओप्सीफेन्स ब्लाइथेकिट्जमिलेरे है लेकिन बोली लगने के बाद इसे मिनर्वा नाम दिया गया है. तितली की प्रजाति का यह नाम ओहियो की मार्गरी मिनर्वा ब्लीथ किट्जमिलर की याद में रखा गया है.
फ्लोरिडा म्यूजियम डेवेलपमेंट के निदेशक बेवेरली सेन्सबैक के अनुसार मार्गरी को मिनर्वा और बैंगो के नाम से जाना जाता था. वह एक बेहद अच्छी इंसान थीं और उनके पोते-पोतियां तितली की इस खूबसूरत प्रजाति को उनका नाम देकर उनका सम्मान करना चाहते थे. तितलियों की मिनर्वा प्रजाति की खोज महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रजाति हाल ही में खोजी गई प्रजातियों में सबसे रंगीन और बड़ी है.
विरोध के स्वर
शुक्रवार, 23 नवंबर 2007
स्वच्छ पर्यावरण के लिए चलाएंगे साइकिल
इस योजना को अमल में लाने के लिए क्लीयर चैनल आउटडोर के साथ एक समझौता किया गया है. सैन फ्रांसिस्को पहले ही क्लीयर चैनल के साथ इस संबंध में एक समझौता कर चुका है. इसके अलावा न्यूयार्क, शिकागो, पोर्टलैंड, ओरेगन में भी इस योजना पर अध्ययन किया जा रहा है. साइकिल कार्यक्रम योजना के सलाहकार पाउल डेमाओ ने कहा कि अमेरिकी लोगों में साइकिल को लेकर खासी रुचि है. साइकिल कार्यक्रम के लिए 2008 बड़ा वर्ष होने जा रहा है.
डेमाओ ने कहा कि वेलिब कार्यक्रम जुलाई में पेरिस में शुरू किया गया था. वेलिब दो शब्दों से बना है. जहां वेलो का मतलब है बाइक वहीं लिबर्टे का आशय आजादी से है. उन्होंने कहा कि इस योजना को खासी लोकप्रियता मिली है.
अमेरिका में राजधानी परिवहन विभाग में पैदल यात्री और साइकिल मामलों के संयोजक जिम सेबास्टियन ने कहा कि वाशिंगटन में साइकिल योजन पर पिछले कई सालों से अध्ययन किया जा रहा है. सेबास्टियन के अनुसार योजना के पहले चरण के तहत वाशिंगटन के 10 स्थानों पर 120 साइकिलों को रखा जाएगा. साइकिल उपयोग की लागत और सदस्यता के बारे में बाद में घोषणा की जाएगी. इस योजना को अगले वर्ष मार्च या अप्रैल में अमल में लाया जा सकता है.
गुरुवार, 22 नवंबर 2007
ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रिकार्ड स्तर के करीब
यह रिपोर्ट ऐसे समय जारी हुई है जब इन गैसों के उत्सर्जन पर लगाम कसने के लिए दुनिया के 41 औद्योगिक व विकासशील देश क्योटो की जगह नई वैश्विक संधि पर चर्चा करने के लिए बैठक करने जा रहे हैं. मौसम में आ रहे बदलाव पर जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 1990-2000 के बीच में घटा, लेकिन यह 2000-2005 के बीच 2.6 प्रतिशत की दर से बढ़ गया.
यूएन कंवेंशन आन क्लाइमेट चेंज की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि क्याटो प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर करने वाले औद्योगिक देशों ने 2012 तक इन गैसों के उत्सर्जन में पांच फीसदी की कमी लाने पर सहमति व्यक्त की है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में अमेरिका टाप पर है.
जलवायु परिवर्तन पर शीघ्र करनी होगी कार्रवाई: भारत एवं पूर्वी एशिया शिखर वार्ता (ईएएस) में भाग ले रहे अन्य नेताओं ने जलवायु के विपरीत प्रभाव पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने इस मुद्दे पर तत्काल अकेले और सामूहिक कदम उठाने तथा ऊर्जा के नवीकरणयोग्य एवं वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग कर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया.
शिखर वार्ता में भाग ले रहे सोलह सदस्यों ने एक स्वर में कहा कि वह वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को स्थिर रखने के साझा लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है. शिखर वार्ता की समाप्ति पर जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा और पर्यावरण पर सिंगापुर घोषणा जारी की गई. इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित आसियान के 10 सदस्य देशों और जापान, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया चीन व दक्षिण कोरिया के नेताओं के दस्तखत हैं.
सिंगापुर घोषणा में जलवायु बदलावों पर चल रही विश्वव्यापी बहस में भारत तथा अन्य देशों के योगदान की सराहना की गई है. नेताओं ने माना कि तेज विकास ने सतत विकास और गरीबी निवारण में योगदान दिया है लेकिन इसने अधिक ऊर्जा उपभोग की समस्या तथा क्षेत्रीय एवं वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा चिंताओं से निपटने संबंधी नयी चुनौतियां पेश की हैं.
तो दुनिया का सबसे छोटा भालू खो जाएगा?
दक्षिण-पूर्वी एशिया के जंगलों में गैरकानूनी शिकार और पेड़ों के कटने की वजह से दुनिया के सबसे छोटे भालू के सामने विलुप्त होने खतरा पैदा हो गया है. ‘सन बेअर’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस भालू का निवास स्थान भारत से इंडोनेशिया तक फैला हुआ है और इसे विश्व संरक्षण संघ द्वारा ‘असुरक्षित’ घोषित किया गया है.जिनेवा स्थित एक समूह (आईयूसीएन) के एक भालू विशेषज्ञ रॉब स्टीनमिट्ज का कहना है, “हमारा अनुमान है कि सन बेअर की संख्या में पिछले 30 सालों में 30 प्रतिशत की गिरावट आई है और यह गिरावट इसी दर से जारी है.” आईयूसीएन भालू विशेषज्ञ समूह के सह अध्यक्ष डेव गारशेलिस का कहना है कि आंकड़ों के अनुसार फिलहाल केवल 10,000 से कुछ ज्यादा भालू ही बचे हैं.
करीब 90 से 130 पाउंड तक के वजन वाले इस भालू का शिकार इसके कड़वे हरे पित्त को हासिल करने के लिए किया जाता है. कई सालों से चीनी चिकित्सकों द्वारा इस पित्त का इस्तेमाल आंखों, जिगर और अन्य अंगों की बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है. भालू के पंजों को भी स्वादिष्ट भोजन के रूप में खाया जाता है. स्टीनमिट्ज का कहना है कि भालुओं के निवासस्थान यानी जंगलों को भी पेड़ काटने वालों से खतरा पहुंच रहा है.
गारशेलिस का कहना है कि थाईलैंड ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने जंगल काटने और शिकार करने के खिलाफ कड़े कानून अपनाए हैं ताकि सन बेअर की संख्या सामान्य बनी रहे. आईयूसीएन का कहना है कि भालुओं की आठ में से छह प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं.
आईयूसीएन के अनुसार जिन अन्य भालुओं की प्रजाति विलुप्ति के कगार पर हैं वे हैं एशियाई काला भालू, भारतीय उपमहाद्वीप का स्लथ भालू, दक्षिण अमेरिका का एंडियन भालू और पोलर भालू. भूरा भालू और अमेरिकी काले भालू को फिलहाल कम खतरा है. लेकिन जल्द ही ये भी विलुप्त होने के कगार पर पहुंच सकते हैं.
अमेरिकी काले भालुओं की संख्या कनाडा, अमेरिका और मेक्सिको में मिलाकर 90,000 तक है जो कि भालुओं की सभी प्रजातियों की संख्या की तुलना में दोगुनी है. भूरा भालू भी अमेरिका और यूरोप में सुरक्षित है. लेकिन दक्षिण एशिया जैसे पाकिस्तान, भारत और नेपाल आदि में इन भालुओं की संख्या काफी कम है.
गारशेलिस के मुताबिक चीन के संरक्षण प्रयासों के बावजूद 3,000 से भी कम संख्या में बचे ‘जायंट पांडा’ की प्रजाति भी विलुप्ति की कगार पर है. ऑस्ट्रेलिया के कोआला भालु, जो भले ही भालू न होकर शिशु धानी प्राणी है, पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है.
तापमान की मार महिलाओं पर ज्यादा
अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी ‘एक्शनएड’ के रमन मेहता, जो इस अध्ययन में शामिल थे, ने एक उदाहरण देकर इसकी व्याख्या की है. उन्होंने कहा, उदाहरण के लिए जब मैं इस साल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में बाढ़ राहत अभियान में शामिल था, मैंने देखा कि वहां प्रतिकूल हालात में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक शिकार हुईं.
मेहता ने कहा इसके कई कारण हैं. आर्थिक दबाव के तहत महिलाएं हर कार्य करती हैं. कभी-कभी उनके पतियों द्वारा उन पर यह आरोप लगा कर उन्हें छोड़ दिया जाता है कि वे परपुरुषगामी हैं. ऐसी चुनौतियों से वे अकेले ही लड़ती हैं. मेहता ने कहा कि तापमान परिवर्तन से बाढ़ एवं सूखा की समस्या तो पैदा होगी ही, साथ ही महिलाओं को खाना पकाने के लिए ईंधन का संग्रह करना कठिन हो जाएगा.
रिपोर्ट में कहा गया है कि कई महिलाओं, खासकर ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को अधिक मुश्किलों का सामना करना होगा. वे पहले से ही ईंधन, चारा एवं पानी की व्यवस्था करने के लिए लम्बी दूरी तय करती हैं. तापमान परिवर्तन से पर्यावरण और वन क्षेत्र को हुए नुकसान से महिलाओं पर भार बढ़ेगा.
मंगलवार, 20 नवंबर 2007
क्लाइमेट एक्शन का हिस्सा बनें
इस ड्रामे से किसका भला हो रहा है, कहा नहीं जा सकता लेकिन दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस समस्या पर महज औपचारिक बैठकों के इस सिलसिले का विरोध कर रहे है. वे ठोस कार्रवाई यानि रीयल क्लाइमेट एक्शन की मांग कर रहे हैं. वास्तव में तो हमें भी इनमें से एक होना चाहिए क्योंकि इन लोगों को हमारे समर्थन की जरूरत है.
यह सही समय है कुछ कर दिखाने का. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दुनिया के किस हिस्से में हैं. यदि आप बाली में होने वाली बैठक में भाग लेने वाले लोगों को कोई संदेश देना चाहते हैं तो आपके पास अवसर है. पर्यानाद् आपको वह रास्ता बता रहा है जो आपको बिना किसी मशक्कत के इस लक्ष्य तक पहुंचा देगा. बस एक मैसेज भेजिए. बैठक के दौरान बाली में आपका संदेश आकाश में लहराती सैकड़ों पारंपरिक इंडोनेशियाई पतंगों में से एक पर दिख सकता है.
जलवायु परिवर्तन से किसी एक व्यक्ति या स्थान या देश विशेष का नुकसान नहीं होगा. यह एक वैश्विक समस्या है और इसकी चपेट में पूरी मानव प्रजाति आएगी. या यूं कहा जाए कि आ चुकी है तो बेहतर होगा. इसलिए यह हम सभी की लड़ाई है. ग्रीनपीस की पहल पर सोलर जेनरेशन नामक ग्रुप ने इस लड़ाई को लड़ने का बीड़ा उठाया है.
दुनिया भर के लोग बाली बैठक के पहले संदेश भेज कर संयुक्त राष्ट्र संघ की अगुवाई में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों पर दबाव बना रहे हैं कि वे कोई ठोस कार्रवाई करें. इस दबाव को बढ़ाने के लिए एक संदेश आप भी भेज सकते हैं. और कुछ नहीं कर सकें तो क्या हुआ, क्लाइमेट एक्शन की ग्लोबल मांग का समर्थन कर उसका हिस्सा तो बन ही सकते हैं.
संदेश भेजने के लिए यहां क्लिक करें
सोलर जेनरेशन के बारे में और जानें
सोमवार, 19 नवंबर 2007
लाखों रोजगार लीलेगा जलवायु परिवर्तन
हालाँकि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए बड़ी संख्या में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होने की भी संभावना व्यक्त की गई है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक अचीम स्टेनर का कहना है कि पर्यावरण प्रौद्योगिकी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होंगे, ताकि ग्लोबल वार्मिंग के अवसर को कम किया जा सके.
उन्होंने कहा कि अमेरिका में पर्यावरण क्षेत्र में रोजगार वृद्धि हो रही है तथा जर्मनी में 2020 तक पर्यावरण क्षेत्र ऑटो मोबाइल्स क्षेत्र में आगे निकल जाएगा. ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप समुद्र के जल स्तर में अस्वाभाविक वृद्धि तथा मौसम चक्र में परिवर्तन से निपटने के उपायों की अपरिहार्यता नवीन व्यावसायिक पद्धतियों की खोज का कारण बन रही है. तापमान में वृद्धि से तेज समुद्री तूफान, सूखा, बाढ़ आदि के कारण करोड़ों लोगों को विस्थापन की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है.
विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव मिशेल जेरौड का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग से 70 प्रतिशत व्यवसाय के तौर-तरीकों पर प्रभावी असर पड़ना तय है. उन्होंने कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन रोकने के उपायों पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत व्यक्त की. जेरौड का कहना है कि विश्वस्तर पर कई बड़े परिवर्तनों पर विचार किया जा रहा है, जो उतना ही असरदार होगा जितनी औद्योगिकी क्रांति हुई थी.
पर्यानाद्: ऐसे न जाने कितने और खतरे हैं जिन्हें एक न एक दिन हमें सामना करना ही पड़ेगा. क्या हम इनसे निपटने में सक्षम हैं.
रविवार, 18 नवंबर 2007
ओह! तो अब ताजमहल नहीं रहेगा.....
अभी ज्यादह दिन पुरानी बात नहीं है जब एक देशव्यापी पागलपन के चलते भारतवासियों ने एसएमएस और ई-मेल भेज भेज कर ताजमहल को दुनिया के सात अजूबों में सरे फेहरिस्त बनाया था. लेकिन उसके बाद क्या? किसी को चिंता है कि ताज महल के साथ अब क्या हो रहा है? किसी को चिंता है कि मोहब्बत की यह सबसे खूबसूरत यादगार एक ऐसे विनाश के कगार पर खड़ी है, जहां उसके अस्तित्व पर गंभीर संकट उठ खड़ा हुआ है? अब कहां है वह कंपनी जिसने करोड़ों हिंदुस्तानियों के एसएमएस से अरबों रुपए बनाए?ताज महल के अस्तित्व पर मंडरा रहे खतरे को लेकर दैनिक जागरण में एक समाचार प्रकाशित हुआ है. इस समाचार के मुताबिक उत्तर भारत में गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी यमुना जिसके किनारे बने ताजमहल की खूबसूरती और बढ़ जाती थी, आज इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि न सिर्फ आगरा शहर बल्कि दुनिया के सात अजूबों में शुमार ताज को भी इससे खतरा पैदा हो गया है. वास्तुविदों और संरक्षणविदों ने इस नदी की दुर्दशा पर चिंता जताते हुए दावा किया है कि इससे ताज की नींव को नुकसान हो सकता है.
समाचार के मुताबिक मुगल वास्तुकला के जाने माने इतिहासकार प्रो. आर नाथ ने बताया कि यमुना सिमट कर एक नाला बन गई है. इसमें औद्योगिक अवशिष्ट से लेकर हर तरह की गंदगी बहाई जा रही है. इससे न केवल इंसानों के लिए खतरा पैदा हो गया है बल्कि ताजमहल को भी नुकसान हो रहा है. उन्होंने कहा कि यदि यहां की मौलिक पारिस्थितिकी को बहाल नहीं किया गया, तो किसी दिन यह पूरा स्मारक जमीन में समा जाएगा या इसकी मीनारे खतरनाक रूप से झुक जाएंगी. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एस. साहा का कहना है कि यमुना किसी भी लिहाज से नदी नहीं रह गई है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले सप्ताह ही तीन अलग अलग जगहों पर मरी हुई हजारों मछलियां नदी में पानी की सतह पर दिखाई दे रही थीं. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को तैलीय परत और औद्योगिक व रासायनिक अवशेष नदी में मिले थे. ब्रजमंडल विरासत संरक्षण समिति के सुरेद्र शर्मा का कहना है कि यह ठीक है कि यमुना से हमारी धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई है लेकिन वर्तमान में इसकी हालत को देखते हुए इसे मौत की नदी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.
पर्यानाद्: तो साहेबान तैयार हैं मोहब्बत के इस स्मारक को जमींदोज होते देखने के लिए? अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को इस तरह नष्ट करने का दुस्साहस दुनिया में शायद हम भारतीयों के अलावा और कोई नही कर सकता. क्या कहीं कोई है जो इसे रोक सके? आगरावासी सुन रहे हैं क्या?
मोटापे से ग्लोबल वार्मिंग का क्या संबंध?
इससे चिंतित होकर अमेरिका में सेंटर्स फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते मोटापे के खिलाफ एक मुहिम चलाने का फैसला किया है. इस मुहिम के तहत लोगों में पैदल चलने, नियमित व्यायाम करने और मांसाहार के बदले शाकाहार अपनाने की पैरवी की जाएगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानि डब्लूएचओ की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग से पर्यावरण में आए बदलावों के चलते विश्व में सन् 2000 में 1.6 लाख लोगों की मौत हो गई थी.
अमेरिकी स्वास्थ्य विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि 10 से 74 साल की उम्र के सभी अमेरिकी रोजाना आधा घंटा पैदल चलना शुरू कर दें तो वे साल भर में करीब साढ़े छह करोड़ टन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती कर सकते हैं. इतना ही नहीं, इससे हर साल 6.5 करोड़ गैलन पेट्रोल की बचत होगी और अमेरिकियों के शरीर से तीन करोड़ टन चर्बी निकल जाएगी. कहिए कैसा लगा यह जान कर? सच्चाई यह है कि मोटापा सारी दुनिया में एक ऐसी बीमारी का रूप ले चुका है जो बिना किसी शोर शराबे के फैलती जा रही है.
आप पूछ सकते हैं कि मोटापे और ग्लोबल वार्मिंग के बीच क्या संबंध है? संबंध है और काफी सीधा सा है. मोटापा बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अनियंत्रित खान-पान के अलावा यह है कि हमने पैदल चलना छोड़ दिया. आधा किमी दूर भी जाना हो तो अपनी टांगों को कष्ट देने की जगह वाहन की चाबी घुमाते हैं. नतीजा अनावश्यक प्रदूषण के रूप में सामने आ रहा है, दिन रात धुआं उगलते वाहन ग्लोबल वार्मिंग की सबसे बड़ी वजहों में से एक है.
भारत को ही लें, कृपया यह न कहें कि यहां तो लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं. यह कड़वा सच मैं भी जानता हूं लेकिन मोटापा हमारे यहां भी एक समस्या है. इसे देखने के लिए हम अपनी-अपनी कमर का नाप भी ले सकते हैं. सच्चाई कहीं से आयात करने की जरूरत नहीं है. बहरहाल मेरा कहना है इससे बचने के लिए कोई बहुत बड़ा हिमालय पर्वत उठाने जैसा काम भी नहीं करना है. बस अपनी जीवन शैली में जरा सा सुधार करना होगा. शुरुआत में इसे कुछ इस तरह किया जा सकता है.
मान लीजिए कि आप घर के पास स्थित बाजार में शॉपिंग के लिए जा रहे हैं, तो अपनी कार या मोटर साइकल स्टार्ट करने के बजाए पैदल जाएं. इससे पर्यावरण प्रदूषण तो कम होगा ही, साथ ही साथ मोटापा भी नियंत्रित रहेगा. पैदल चल कर आप जो थोड़ा बहुत पसीना बहाएंगे वह आपकी अतिरिक्त कैलॉरीज़ की मात्रा को कम करने में मददगार होगा. तो कैसा है यह छोटा सा उपाय? सोच कर देखें!! धरती के लिए न सही अपने लिए ही कीजिए.
शनिवार, 17 नवंबर 2007
राजनेता भी अब जान जाएंगे
खबर के मुताबिक आईपीसीसी की रिपोर्ट को अंतिम रुप दे दिया गया है और संभावना है कि स्पेन में चल रहे सम्मेलन में आज इसे स्वीकार कर लिया जाएगा. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून आज जारी करने वाले हैं. ख़बरें हैं कि इस रिपोर्ट को अंतिम रुप देने के लिए गर्मागर्म बहसें हुई हैं लेकिन अमेरिका का ज़ोर था कि इसकी भाषा को संतुलित रखा जाए. नोबेल शांति पुरस्कार से पुरस्कृत संस्था आईपीसीसी की यह अंतिम रिपोर्ट उन तीन रिपोर्टों के महत्वपूर्ण बिंदुओं को भी समेटेगी जिन्हें आईपीसीसी पहले ही जारी कर चुकी है.
कड़ी चेतावनी: इस अंतिम रिपोर्ट में जिन बिंदुओं पर ज़ोर रहेगा उनमें एक तो यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर साफ़ दिखाई दे रहा है, दूसरा इसके पीछे मानव गतिविधियों से उत्सर्जित होने वाली ग्रीनहाउस गैसों का हाथ है और तीसरा यह कि जलवायु परिवर्तन को तर्कसंगत खर्च करके रोका जा सकता है.
जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के निदेशक हैंस वेरोल्मे ने कहा है कि इस रिपोर्ट के बाद कोई भी राजनीतिज्ञ यह नहीं कह सकेगा कि वह नहीं जानता कि जलवायु परिवर्तन क्या है और इसके बारे में उसे क्या करना है. इससे पहले जो रिपोर्ट प्रकाशित की गई थीं, उसकी तुलना में इस रिपोर्ट की भाषा थोड़ी कड़ी है और इसमें साफ़ कहा गया है कि परिवर्तन आकस्मिक और अपरिवर्तनीय होगा.
वेरोल्मे का कहना है, जलवायु परिवर्तन हो रहा है, इसका असर हमारी ज़िंदगी पर हो रहा है और हमारी अर्थव्यवस्था पर हो रहा है और हमें इससे निपटने के लिए कुछ करना होगा. माना जा रहा है कि आईपीसीसी के शोध और उसकी रिपोर्ट अगले महीने इंडोनेशिया में होने वाले नीति-निर्धारकों के सम्मेलन में काम आने वाली है. इस सम्मेलन के बाद जलवायु परिवर्तन पर नया अंतरराष्ट्रीय समझौता होने की संभावना है.
शुक्रवार, 16 नवंबर 2007
आप भी कुछ कर दिखाएं, ये रहा मौका
अपने आप से ईमानदारी से एक प्रश्न पूछिए कि आज तक पर्यावरण को बचाने के लिए क्या सचमुच मैने कोई ठोस पहल की ? उत्तर किसी को मत बताइए, स्वयं जान लीजिए और कुछ कर दिखाने का संकल्प कीजिए. फिलहाल आप क्या कर सकते हैं इसका एक छोटा सा नमूना पेश्ा है. शीघ्र ही एक विस्तृत जानकारी वाला लेख भी प्रस्तुत करूंगा.
पुनश्च: पिछला लेख 'क्या आप भी खरीदते हैं सीएफएल' आप सभी को बेहद पसंद आया, और आपकी प्रतिक्रियाओं से मुझे बेहद संतुष्टि मिली. सभी को मेरा धन्यवाद.
देखिए क्या कर सकते हैं आप?
यदि आप भी कुछ करना चाहते हैं, तो इस अभियान में शामिल हों. यदि सक्रिय कार्यकर्ता बनना चाहते हैं तो ग्रीनपीस से जुड़ें. सायबर एक्टिविस्ट बनने के लिए यहां क्लिक करें.
गुरुवार, 15 नवंबर 2007
क्या आप भी सीएफएल खरीदते हैं?
यही हालत हर उस व्यक्ति की है, जो कम बिजली खपत के लिए सीएफएल बल्ब की ओर आकर्षित हुआ. दरअसल होता ये है कि वोल्टेज का उतार-चढ़ाव ये बल्ब सहन नहीं कर पाते और इस वजह से जल्दी-जल्दी फ्यूज हो जाते हैं. अब कमरे में उजाला करने के लिए ज्यादा पैसा तो दो ही, साथ ही ज्यादा समय तक नहीं चलने का नुकसान भी उठाओ. तिस पर भी इसके डिस्पोज़ल में परेशानी आती है. जो पढ़े लिखे और समझदार हैं वो जानते हें कि इस तरह के बल्ब को यूँ ही फेंकना कितना घातक हो सकता है.
क्या है इन बल्बों में: इसमें पर्यावरण में पारे का कचरा मिलने लगता है. प्रत्येक सीएफएल बल्ब में न्यूरोटॉक्सिक पदार्थ होता है. इसमें करीब 0.5 मिलीग्राम पारा होता है. यह पहले पर्यावरण में मिलता है, फिर पानी में और यह बेहद जहरीला रसायन बनाता है, जिसे मिथाइल मर्करी कहते हैं. यह मानव के लिए बेहद जहरीला है. धीरे-धीरे यह आपके भोजन में मिलने लगता है.
भारत का बिजली उद्योग हर साल करीब 56 टन पारे का इस्तेमाल करता है. यदि पूरी तरह से सीएफएल या ट्यूब की ओर आते हैं तो हो सकता है कि यह उपयोग और बढ़े. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका विकल्प एलईडी हो सकता है, जिनका उपयोग ट्रैफिक सिग्नल में किया जाता है. ये सीएफएल की तुलना में अधिक प्रभावी, सुरक्षित और ज्यादा समय तक चलने वाले हैं. 6 वॉट का एलईडी बल्ब सीएफएल बल्ब की तुलना में 50 हजार घंटे ज्यादा चलता है. इन बल्बों में पारा नहीं होता.
क्या-क्या हो सकता है: जैसे ही ये भोजन के जरिये पेट में प्रवेश करता है, यह आदमी का नर्वस सिस्टम नष्ट कर सकता है. इसके अलावा किडनी और यकृत को भी नुकसान पहुँचा सकता है. स्मृति भ्रंश और जन्मजात रोग भी इससे हो सकते हैं. एक अनुमान के मुताबिक करीब 8 प्रतिशत महिलाओं में इस तरह के रसायन पाए जाते हैं. चूँकि इनके डिस्पोज़ल की कोई व्यवस्था अभी तक देश में नहीं है, इसलिए ये कई लोगों के लिए खतरनाक हो सकता है.
पर्यानाद्: सीएफएल के खतरे से सबसे पहले संपर्क में आते हैं, कचरा बीनने वाले वे गरीब बच्चे जिनकी जिंदगी इसी तरह गुजरती है. उनके लिए ना सही अपने जीवन की खातिर ही, उपभोक्ता वस्तुओं का सोच समझकर इस्तेमाल करें.
मंगलवार, 13 नवंबर 2007
एक गंभीर त्रासदी: काला सागर में तेल
इंसान की गतिविधियां पर्यावरण को सबसे गंभीर क्षति पहुंचा रही हैं. पारिस्थितिकी को मानव सभ्यता के विकास की कितनी गंभीर कीमत चुकानी पड़ रही है, यह इस दुर्घटना से जाना जा सकता है. प्रकृति के कुपित होने के पीछे भी मानव की गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं. कोई डेढ़ दशक पहले कुवैत पर इराकी कब्जे के बाद हुए खाड़ी युद्ध के दौरान इराक ने समुद्र में कच्चा तेल बहा कर पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचाई थी. अब तूफान में दुर्घटनाग्रस्त एक जहाज के डूबने से फिर वही मंजर नजर आ रहे हैं. ऐसी घटनाओं में निरीह वन्य या समुद्री जीवों को किस तरह गंभीर हानि होती है, इसे चित्र में देख कर साफ समझा जा सकता है. पढ़ें हृदय को व्यथित कर देने वाली ऐसी ही एक रिपोर्ट:तूफान के चलते यूक्रेन के काला सागर तट पर एक रूसी तेल टैंकर के पलट जाने से उसमें लदा 1300 टन तेल पानी में फैल गया. पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि इससे पारिस्थितिकी को खतरा पैदा हो सकता है. अजोव सागर से 108 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चली तेज हवाओं के कारण तीन अन्य मालवाहक जहाज भी समुद्र में डूब गए. इनमें से दो जहाजों में गंधक लदा था. इतना ही नहीं, मौसम में आई खराबी के चलते बहुत से अन्य जहाज और 20 नाविक लापता बताए जा रहे हैं.
अधिकारियों ने बताया कि रूस के व्यस्त व्यावसायिक बंदरगाह कावकाज से कुल 40 जल वाहन रवाना हुए थे, जबकि तूफान की वजह से 10 अन्य को बंदरगाह पर ही रोक लिया गया. अधिकारियों ने कहा कि लगभग 300 किलोमीटर पश्चिम में तेज हवाओं ने एक मालवाहक जहाज को डुबो दिया. इस पर 17 नाविक सवार थे जिनमें से दो को बचा लिया गया और 15 अब भी लापता हैं. केर्च स्ट्रेट में डूबे एक अन्य जहाज पर सवार पाँच नाविक भी लापता हैं.
रूसी पर्यावरण समूह एकोजाशचिता के प्रमुख व्लादिमीर स्लिवायक ने कहा कि यह पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा है. तेल फैलने से समुद्र में जो प्रदूषण फैला है, उसकी सफाई करने में लंबा वक्त लगेगा और इसके परिणाम एक साल या इससे भी अधिक समय में सामने आएँगे. रूसी सरकार की पर्यावरण निगरानी एजेंसी के प्रमुख ओलेग मितवोल ने कहा कि यह एक गंभीर पर्यावरण खतरा है और इसके लिए काफी काम किए जाने की जरूरत है.
पर्यानाद्: आखिर इन दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा ? कौन है इन निरीह पक्षियों के जीवन को होने वाले आघात का दोषी?
सोमवार, 12 नवंबर 2007
दस हजार घोड़ों को मारने का आदेश
ब्रिस्बेन के एक अखबार कूरियर मेल ने शनिवार को बताया कि राज्य सरकार ने शूटरों को कहा है कि वे मारने के बाद घोड़ों के शवों को छुपा दें. पर्यावरण मंत्री लिंडी नेल्सन कार ने क्वींसलैंड के प्रमुख पीटर बेटी से कहा कि कुछ समूहों ने जरूर इस बात की आलोचना की थी, लेकिन पर्यावरण की सुरक्षा के लिए यह जरूरी था. अखबार के मुताबिक अभी तक चार हजार जंगली घोड़ों को गोली मारी जा चुकी है. अभी दस हजार घोड़ों को मारे जाने की योजना है.
शूटरों को इन ब्रम्बीज को मारने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है. क्वींसलैंड के सतत विकास मंत्री एंड्रयू मैकनामरा कहते हैं कि मानवीय पक्ष को ध्यान में रखकर घोड़ों को सीने में गोली मारी जाती है ताकि उन्हें दर्द कम हो. हालांकि मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे एक बेहद जंगली और अमानवीय कृत्य करार देते हैं.
पर्यानाद्: सवाल उठता है कि क्या यह अमानवीय कदम इस समस्या का सही समाधान है? क्या घोड़ों को गोली मारने से पहले क्वींसलैंड की सरकार ने इस बात की जांच नहीं कराई कि आखिर क्यों ऐसे हालात निर्मित हो गए? पर्यावरण की रक्षा के नाम पर जीव हत्या को कैसे जायज ठहराया जा सकता है? हैरत की बात है कि ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित और उच्च साक्षरता वाले देश में भी ऐसी बर्बर कार्रवाई का कोई विरोध नहीं किया गया और इतने बड़े पैमाने पर घोड़ों की हत्या का काम जारी है.
धरती का बढ़ता तापमान घटाएंगे
जर्मनी में काइल स्थित लाइबनित्ज इंस्टीट्यूट आफ मैरीन साइंसेज के जीव विज्ञानी उल्फ रिबेसेल ने शोधों का हवाला देते हुए कहा है कि ये जीव लगभग 39 प्रतिशत अधिक कार्बन डाईआक्साइड का अवशोषण कर सकते हैं.
हालांकि शोध में यह भी कहा गया है कि इन की मौत के बाद उनकी कोशिकाओं में मौजूद कार्बन डाईआक्साइड महासागरीय खाद्य सामग्री को प्रभावित कर सकती है. शोध से यह भी पता चला है कि जैव ईधन के इस्तेमाल से पैदा हुई आधे से अधिक कार्बन डाईआक्साइड को सोख कर भविष्य में बढ़ने वाले तापमान को कम किया जा सकता है.
वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित इस शोध में हालांकि यह भी कहा गया है कि इन जीवों की मौत के बाद उनकी कोशिकाओं के विघटन के लिए अधिक आक्सीजन की जरूरत पड़ेगी. इससे अन्य जीवों के लिए आक्सीजन की कमी हो जाएगी. इसमें यह भी कहा गया है कि अधिक कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा वाले ऐसे जीवों को खाने वाले अन्य जीवों की वृद्धि दर और उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी.
प्लैंकटन के बारे में और अधिक जानकारी के लिए यहां पढ़ें.
कार का धुआं भी ला सकता है हार्ट अटैक
एडिनबरा विश्वविद्यालय के अनुसंधान दल के प्रमुख डाक्टर एंड्रयू लकिंग के हवाले से डेली मेल में कहा गया है कि अध्ययन से पता चलता है कि थोड़े समय के लिए भी डीजल जनित धुएं के संपर्क में आने पर उस व्यक्ति के रक्त में थक्के जमने लगते हैं. इससे रक्त वाहिनियों में अवरोध आ सकता है जिसके फलस्वरूप हृदयाघात हो सकता है. डाक्टर लकिंग और उनके ब्रिटिश तथा स्वीडिश सहयोगियों ने लोगों के एक समूह पर डीजल जनित धुएं के असर का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है.
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि व्यस्ततम इलाकों से दूर जाकर व्यायाम करने से हृदयाघात का खतरा घटाया जा सकता है क्योंकि ऐसे इलाकों में वायु प्रदूषण की आशंका कम होती है. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन की वित्तीय सहायता से किए गए इस अध्ययन की रिपोर्ट ब्रिटेन के एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है.
पिछली सदी में 39 हजार बाघ विलुप्त
बाघों की संख्या में निरंतर हो रहे ह्रास की वजह से ही 1970 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय पशु के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन इसके बावजूद शिकारी अपने इरादों में लगातार कामयाब हो रहे हैं. हाल ही में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा कराई गई गणना से खुलासा हुआ है कि मात्र पिछले छह साल में ही भारत में बाघों की 50 फीसदी संख्या कम हो चुकी है.
बाघों के जीवन पर आसन्न खतरे के चलते ही 1972 में पहली बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पास कराया था. इसके बाद बाघ को संरक्षित प्रजातियों की सूची में डाल दिया गया. वर्ष 1972 में ही पहली बार बाघों की आधिकारिक गणना कराई गई थी जिसमें इनकी संख्या मात्र 1827 निकली. वर्ष 2001 में बाघों की संख्या में इजाफा नजर आया और उनकी आबादी 3642 बताई गई लेकिन छह साल के बाद जब इस वर्ष इनकी गणना हुई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.
राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने 2007 की गणना में इनकी संख्या सिर्फ 1300 से 1500 के बीच बताई है. हाल ही की गणना से पता चला है कि अकेले मध्य प्रदेश में 65 प्रतिशत बाघ धरती से विलुप्त हो गए हैं. छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान में क्रमश: 100-100 से भी कम बाघ बचे हैं.
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ की गिनती का काम उनके पंजों के निशान के आधार पर किया जाता है, लेकिन कई बार बाघ एक ही जगह से बार-बार गुजरते हैं जिससे उनके पंजों की संख्या बढ़ जाती है. इस कारण हो सकता है कि इनकी संख्या वर्तमान आंकड़े से और भी कम हो.
रविवार, 11 नवंबर 2007
संगठन की शक्ति
जानवरों में कितनी एकता है यह इस वीडियो को देख कर सहज ही समझा जा सकता है. मुझे पसंद आया, आप भी देखें. यह वीडियो मैने श्री नितिन व्यास के चिट्ठे 'पहला पन्ना' पर देखा. उन्होंने ही इसका लिंक उपलब्ध कराया, जिसके लिए मैं उनका आभारी हूं. वीडियो की लंबाई अधिक होने के कारण डाउनलोड होने में कुछ समय लग सकता है, कृपया धैर्य रखें.
अपनी दीपावली, उनका कुकुर तिहार
नेपाल में त्यौहार मनाया जा रहा है तिहार, जो कि भारत में हिंदुओं के दीपावली के त्यौहार के समान है. नेपाल में इस त्यौहार के दूसरे दिन कुत्तों को विशेष सम्मान दिया जाता है. इस दिन को 'कुकुर पूजा' या 'कुकुर तिहार' कहा जाता है.इस दिन कुत्तों को फूलों की माला पहनाई जाती है, आशीवार्द का प्रतीक तिलक लगाया जाता है और उन्हें त्यौहारों के खाने के साथ मिठाइयाँ भी खिलाई जाती. हिंदु धर्मग्रंथ महाभारत के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर की स्वर्ग की यात्रा में उनके कुत्ते ने उनका साथ दिया था.
पुलिस के प्रशिक्षण स्कूल में 51 कुत्ते हैं जिन्हें इस त्यौहार पर सम्मान दिया जाता है. राहत और बचाव कार्यों के अलावा अपराधियों को पकड़ने, विस्फोटकों और नशीले पदार्थों का पता लगाने और गश्त लगाने में इन कुत्तों की अहम भूमिका होती है. पड़ोस के अन्य कुत्तों की भी इस दिन किस्मत चमक सकती है.
प्रशिक्षण स्कूल के कुत्तों में से बहुत से पिल्ले हैं. इनमें से कुछ का जन्म परिसर में ही हुआ है और कुछ बाहर से हैं. काठमांडू के बहुत से आवारा कुत्तों को भी इस दिन मालाएँ पहनाई जाती हैं. लेकिन वर्ष के बाकी समय इनके साथ आमतौर पर अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता. बहुत से कुत्तों को कूड़े से भोजन तलाशना पड़ता है.
कहते हैं कि हर कुत्ते का एक दिन आता है. कुत्तों के प्रशिक्षण स्कूल में माना जाता है कि जैसी निकटता कुत्ते और आदमी में होती है वैसी किसी और जानवर की नहीं होती.
काश कि जानवरों के साथ हमेशा मानवतापूर्ण व्यवहार होता !!!
शुक्रवार, 9 नवंबर 2007
बाघों की घटती जनसंख्या
भारत में बाघों की तेजी से घटती जनसंख्या को देखते हुए सरकार कई उपाय करने के प्रयास कर रही है. बहुचर्चित प्रॉजेक्ट टाइगर ऐसा ही एक प्रयास है. हाल ही में एक अध्ययन में पाया गया था कि देश में बाघों की संख्या घटकर 1500 से भी कम रह गई है. इसके बाद सरकार ने बाघ संरक्षण बल के गठन की घोषणा कर दी. इस बल में पूर्व सैनिकों को भर्ती कर अभयारण्यों की चौकसी का काम सौंपा जाएगा.भारत में वर्ष 2002 में हुए अंतिम बड़े सर्वेक्षण में बाघों की संख्या 3642 पाई गई थी. वन्यजीव संरक्षण में जुटे कार्यकर्ताओं ने बाघों की संख्या में लगातार हो रही कमी के लिए शिकार और तेजी से फैलते नगरों को जिम्मेदार बताया है. और वो कहते हैं कि प्रशासन को इस संबंध में और कदम उठाने चाहिए.
भारतीय जंगलों में बाघों के संरक्षण के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने आपात उपायों की सूची जारी की है. इसी के तहत बाघ संरक्षण बल के गठन की घोषणा की गई है. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस बल में कितने पूर्व सैनिकों की भर्ती की जाएगी.
दो-तिहाई की गिरावट: सरकार ने मई में एक गणना कराई थी, जिसमें पता चला था कि देश के जंगलों में अनुमान से कहीं कम बाघ रह रहे हैं. वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के इस अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि कुछ राज्यों से बाघों की संख्या में पाँच वर्षों में लगभग दो-तिहाई तक की गिरावट आई है. अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट दिसंबर में आएगी.
वन्यजीव विशेषज्ञों ने शिकारियों और बाघ की खाल के अवैध व्यापार को रोकने में असफलता के लिए भारत सरकार की आलोचना की है. बाघों का शिकार उनके शरीर के अंगों को हासिल करने के लिए किया जाता है. बाघ की खाल का वस्त्रों के लिए और हड्डियों की दवाएँ बनाने में इस्तेमाल होता है. चीन में बाघ की खाल की कीमत 12500 डॉलर यानी लगभग पाँच लाख रुपए तक मिल जाती हैं. रिपोर्टो के अनुसार एक शताब्दी पहले भारत में लगभग 40 हजार बाघ थे.
पृथ्वी के साथ अपनी सेहत का भी ध्यान रखें
देश भर के अस्पतालों में पिछले कुछ वर्षों से दीवाली के बाद दमा, नाक की एलर्जी, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों की संख्या कम से कम दोगुनी बढ़ जाती है. जलने, आँख को गंभीर क्षति पहुँचने और कान का पर्दा फटने जैसे हादसे भी बहुत होते हैं. इस स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य और पर्यावरण विशेषज्ञों ने हमेशा की तरह आम जनता को पटाखे नहीं छोड़ने अथवा कम से कम और धीमी आवाज वाले पटाखे छोड़ाने की सलाह दी है.
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिल्ली में पटाखों के कारण दीवाली के बाद वायु प्रदूषण 6 से 10 गुना और आवाज का स्तर 15 डेसीबल बढ़ जाता है. इसके कारण श्रवण क्षमता प्रभावित होने, कान के पर्दे फटने, दिल के दौरे पड़ने, सिर दर्द, अनिद्रा और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. पटाखों के कारण वातावरण में हानिकारक गैसों तथा निलंबित कणों का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण फेफड़े, गले तथा नाक संबंधी गंभीर समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं. दमा के मरीजों के लिए दीवाली के आसपास का समय न केवल पटाखों के कारण, बल्कि अन्य कारणों से भी मुसीबत भरा होता है.
तेज आवाज करने वाले पटाखे सामान्य पटाखों से अधिक खतरनाक हैं क्योंकि इनसे कान के पर्दे फटने, रक्तचाप बढ़ने और दिल के दौरे पड़ने की घटनाएँ बढ़ जाती हैं. बच्चों, गर्भवती महिलाओं, दिल तथा साँस के मरीजों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पिछले वर्ष पटाखों की जाँच से पाया कि तेज आवाज वाले करीब 90 प्रश पटाखे आवाज के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं. बोर्ड ने ऐसे पटाखों पर पाबंदी लगाने का सुझाव दिया है. आतिशबाजी और तेज पटाखों के कारण आँखों को भी गंभीर क्षति पहुँचने का खतरा बहुत अधिक होता है. पटाखों से निकलने वाली चिंगारियों एवं आग से आँखों की कार्निया जल सकती है, जिससे स्थायी तौर पर अंधापन आ सकता है.
तो क्या आप नहीं चाहते कि ऐसा कोई हादसा नहीं हो ? छोटी मोटी फुलझड़ी या रोशनी करने वाली आतिशबाजी तक तो ठीक है लेकिन कृपया अपने आसपास रहने वाले मरीजों, कमजोर दिल वाले लोगों और सबसे बढ़ कर खुद अपने स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अनावश्यक आतिशबाजी और धन की बर्बादी को इस बार रोकें. दीपावली मनाने के इससे बेहतर कई तरीके हो सकते हैं.
अपने नजदीक के किसी अनाथालय में जाकर छोटे छोटे बच्चों को मिठाई खिलाएं. हो सके तो उन्हें वस्त्र आदि भेंट करें. यकीन मानिए उनके चेहरों पर आने वाली खुशी की झलक और उल्लास के शोर से आपको जो आनंद मिलेगा वह किसी भी आतिशबाजी के शोर से नहीं मिल सकता.
दीपावली आप सभी को मंगलमय हो.
मंगलवार, 6 नवंबर 2007
ऑनलाइन अभियान में भाग लें
विश्व वन्यजीव कोष का हस्ताक्षर अभियान- हाय, आय एम द इंडियन टायगर एंड आय नीड योर अर्जेंट सपोर्ट
जलवायु परिवर्तन पर डॉक्यूमेंट्री पुरस्कृत
पर्यानाद के पाठकों को बीबीसी के इस प्रयास से अवगत कराने के लिए मैं सीधा लिंक दे रहा हूं. इस समाचार को पढ़ने के लिए सीधे बीबीसी हिंदी जालस्थल के उस पन्ने पर पहुंचिए, जहां यह जानकारी उपलब्ध है.
बीबीसी ऑनलाइन के विशेष पन्ने की कड़ी बाजू की पट्टिका में उपलब्ध करा दी है. इस पेज पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित बेहद उपयोगी और ज्ञानवर्द्धक जानकारी उपलब्ध है.
शिवकांत जी, मुकेश शर्मा जी और स्वाति चौहान को बहुत बहुत बधाई.
विस्तार से पूरा समाचार यहां पढ़ें
रविवार, 4 नवंबर 2007
जंगल के राजा की दुर्दशा
पढ़ना शायद किसी को अच्छा नहीं लगेगा.लेकिन इस कटु सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि अब पृथ्वी पर इस शाही जीव का अस्तित्व सचमुच खतरे में है. हमें क्या करना चाहिए ? शायद शेर और बाघों पर कहानियां लिखनी चाहिए, उनकी विविध तस्वीरें जमा कर लेनी चाहिए क्योंकि जल्द ही वे पूरी तरह लुपत हो जाएंगे. फिर हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए इन तस्वीरों की जरूरत पढ़ेगी कि ''देखो बच्चो, यह था जंगल का राजा, जो कभी इस ग्रह पर रहता था. फिर हमने इसका शिकार कर लिया और अब यह समाप्त हो चुका है''. कल्पना कीजिए कि एक दिन अंतिम बाघ का शिकार होगा और पृथ्वी के जंगलों से वहां के राजा का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. कैसे होंगे बिना राजा के जंगल..... ?
दुनिया भर से बाघों की तीन प्रजातियां लुप्त
दुनियाभर में जंगल के राजा कहे जाने वाले बाघों और शेरों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. गुजरात के गिर अभयारण्य में जहाँ हाल ही में ग्रामीणों द्वारा बिजली के करंट से की गई पाँच शेरों की हत्या ने वन्यजीव प्रेमियों को सकते में डाल दिया है, वहीं इंडोनेशिया में विपरीत परिस्थितियों के चलते पिछली सदी में बाघ की तीन उप प्रजातियों का पूरी तरह से नामोनिशान मिट गया है.
विश्व वन्यजीव कोष (WWF) शेरों और बाघों की निरंतर घट रही संख्या से परेशान हैं और उसने प्रकृति के इन जाँबाज प्राणियों की रक्षा के लिए अधिक से अधिक कदम उठाने का आह्वान किया है. WWF की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक पिछली सदी बाघों के लिए खतरनाक रही और वही परिस्थितियाँ अब भी जारी है. संगठन का कहना है कि पिछली सदी में इंडोनेशिया में बाघों की बाली कैस्पेन और जावा तीन उप प्रजातियाँ पूरी तरह विलुप्त हो गईं. WWF के अनुसार वन्यजीवों को खतरे के मामले में लगभग पूरी ही दुनिया में हालात एक जैसे हैं और दक्षिणी चीनी बाघ प्रजाति भी तेजी से विलुप्त होने की ओर बढ़ रही है.
संगठन का कहना है कि सरकारी और गैर सरकारी संरक्षण प्रयासों के बावजूद विपरीत परिस्थितियाँ निरीह प्राणियों की जान लेने में लगी हैं. बाघों और शेरों की जान कई बार अभयारण्यों में बाढ़ का पानी भर जाने से चली जाती है तो कई बार सुरक्षित स्थानों की ओर भागने के प्रयास में वे या तो वाहनों के पहियों से कुचले जाते हैं या फिर घात लगाकर बैठे शिकारियों का निशाना बन जाते हैं.
गुजरात के गिर अभयारण्य में हाल के वर्षों में 33 शेरों की जान जा चुकी है. इनमें से कुछ प्राकृतिक कारणों से मारे गए, तो कुछ को ग्रामीणों या शिकारियों ने मार डाला. हाल ही में एक ग्रामीण परिवार ने गिर अभयारण्य के पाँच शेरों को बिजली के करंट से मार डाला. इस परिवार ने अपने खेतों के इर्द-गिर्द लगाए गए तारों में बिजली का करंट छोड़ रखा था. अक्टूबर के महीने में असम के ओरांग नेशनल पार्क में ग्रामीणों ने जहर देकर दो बाघों को मार डाला. भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (WTI) के अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीणों ने वन्यजीवों द्वारा अपने पशुओं पर होने वाले हमलों का बदला लेने के लिए संभवत: ऐसा किया.
पार्क के संरक्षित क्षेत्र के नजदीक रहने वाले ग्रामीणों ने एक भैंस के शव पर जहर छिड़ककर कर उसे जंगल में फेंक दिया. भैंस का माँस खाकर दो बाघों की मौत हो गई. एक बाघ का शव दो अक्टूबर को भाबापुर गाँव के नजदीक पार्क के क्षेत्र में मिला, जबकि दूसरे बाघ का शव इसी क्षेत्र में चार अक्टूबर को मिला. बाघों और शेरों की संख्या में निरंतर आ रही गिरावट विश्वभर के वन्यजीव प्रेमियों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है.
मेरा सवाल: क्या कुछ समय बाद बाघ और शेर सिर्फ तस्वीरों में ही देखने को मिलेंगे?
