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सोमवार, 31 दिसंबर 2007

सन् 1880 के बाद पांचवां सबसे गर्म साल

ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ दुनियाभर के तमाम प्रभावशाली नेताओं की मुहिम के बावजूद वर्ष 2007 पिछले 127 वर्षो में पांचवां सबसे गर्म साल माना जा रहा है. पर्यावरण संबंधी अमेरिकी संस्था नेशनल ओसियानिक एंड एटमोस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार इस वर्ष समुद्र और स्थल सहित पृथ्वी का औसत तापमान 14.44 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है. इस तरह 2007 को 1880 के बाद सर्वाधिक गर्म साल कहा जा सकता है. वैसे, इस संबंध में अंतिम आंकड़े जनवरी में जारी हो सकेंगे.

सोमवार को विज्ञान पत्रिका 'साइंस डेली' में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस साल पूर्वी यूरोप से मध्य एशिया के क्षेत्र सबसे ज्यादा गर्म रहे. शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक 20वीं शताब्दी में पृथ्वी की सतह के तापमान में 0.6 से 0.7 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है. इतना ही नहीं पिछले तीस साल में तापमान में हुई वृद्धि 1900 के बाद से बढ़ी गर्मी की तुलना में तीन गुना ज्यादा दर्ज की गई.

रिपोर्ट के मुताबिक 1997 से 2007 का दशक सबसे गर्म दशक रहा. अब तक के सबसे गर्म आठ सालों में सात 2001 के बाद, जबकि 10 सबसे गर्म साल 1997 के बाद रिकार्ड किए गए. इसका तात्‍पर्य यह भी है कि पिछले एक दशक में ग्‍लोबल वार्मिंग की स्थिति में बहुत ज्‍यादा खराबी हुई है और इस मामले में अब निर्णायक कदम उठाए जाने का समय आ चुका है.

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2007

पेड़-पौधे प्रदूषण रोकने में सहायक

जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीन संशोधित) पेड़-पौधे प्रदूषण रोकने में भी कारगर होते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे पौधों का इस्तेमाल जमीन में मौजूद इंडस्ट्रियल केमिकल और विस्फोटक जैसे प्रदूषक को बाहर निकालने के लिए किया जा सकता है.

खरगोश की जीन से युक्त छह इंच लंबे पॉपुलर के पौधे की जांच में प्रदूषक को बाहर निकलने की क्षमता पाई गई. इसकी जड़ों में केमिकल (ट्राइक्लोरोथिलीन) मिले पानी का इस्तेमाल करने पाया गया कि इसमें अधिकतम 91 फीसदी प्रदूषक तत्व सोखने की क्षमता है. इस केमिकल को जमीन में मौजूद पानी के प्रदूषण का बड़ा कारण माना जाता रहा है. जीएम पौधे ने आम पौधों के मुकाबले इस प्रदूषक को 100 गुणा ज्यादा तेजी से हानिरहित बाय-प्रॉडक्ट में तोड़ने में सफलता पाई.

जैव इंजीनियरिंग से रुका हाइवे पर भूस्खलन

पांच साल पहले तक नेपाल के हाइवे पर भूस्खलन का खतरा रहता था, लेकिन अब लोगों को इस सड़क से गुजरते हुए यह आशंका नहीं सताती. ऐसा मुमकिन हुआ है जैव इंजीनियरिंग के कमाल से. जैव इंजीनियरिंग और सिविल इंजीनियरिंग का मिलाजुला इस्तेमाल करके नेपाल में हाइवे को भूस्खलन से सुरक्षित बनाया गया है. सन् 2004 के बाद से यहां भूस्खलन की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है.

क्‍या किया: काठमांडू से 80 किलोमीटर दूर कृष्णबीर में जब भूस्खलन हुआ करते थे तो पृथ्वी हाइवे पर यात्रा करने वालों की जान पर बन आती थी. यह हाइवे समूचे नेपाल में रसद पहुंचाने के लिए लाइफलाइन का काम करता है. यहां जैव इंजीनियरिंग का उपयोग करते हुए बड़ी संख्या में घास, झाड़ी और पेड़ लगाए गए हैं. छोटे-छोटे बांधों को तैयार किया गया है. इसके अलावा दीवारों और नालों को इस तरह तैयार किया गया है कि पानी के तेज प्रवाह और मलबे से ज्यादा क्षति न हो सके.

कृष्णबीर में जैव इंजीनियरिंग से भूस्खलन से निपटने का अनोखा स्थायी रास्ता खोजा गया है. जैव इंजीनियरिंग कम लागत में भूस्खलन को रोकने के बेहतर उपाय उपलब्ध कराता है. खासकर इसका उपयोग पहाड़ी इलाकों में किया जा सकता है. सार यह कि प्रकृति से मित्रवत् रह कर ही इंसान सुरक्षित रह सकते हैं.

मंगलवार, 25 दिसंबर 2007

मोबाइल, आईपॉड, लैपटॉप, सब पर्यावरण के दुश्‍मन

इलेक्‍ट्रॉनिक गैजेट्स के प्रति लोगों की दीवानगी लगातार बढ़ रही है. इसी के साथ बढ़ रहा है कुदरत पर अत्याचार. लोग नए गैजेट्स की खूबियों से प्रभावित होकर पुराने को छोड़ देते हैं, लेकिन उसका सुरक्षित निपटान नहीं करते. नतीजा होता है पर्यावरण में जहरीली गैसों की मात्रा में वृद्धि. ये गैसें हवा में जहर का काम करती हैं.

सिर्फ ब्रिटेन में हर साल 11 हजार से ज्यादा पुराने सेलफोन मेज की दराज में डाल दिए जाते हैं. यह आंकड़ा क्रिसमस पर और भी बढ़ जाता है. त्यौहार के मौसम में लोग बड़ी संख्या में पुराने को छोड़ नया सेलफोन और लैपटाप खरीद डालते हैं. यह सोचे बिना कि पुराने उपकरणों का निपटारा कैसे किया जाए.

पुराने उपकरणों का सबसे बेहतर इस्तेमाल तो यह होगा कि इन्हें किसी जरूरतमंद को दे दिया जाए या बेच दिया जाए. रीसाइकलिंग एक और बेहतर विकल्प हो सकता है. कंपनियां कई बार पुराने हैंडसेट के बदले नया देने की पेशकश देती हैं. लेकिन ब्रिटेन में लोग अपने हैंडसेट बेचने या किसी को देने के बजाय घर के कोने में फेंकना बेहतर समझते हैं.

एक मोबाइल कंपनी के मैनेजर जान थामसन के मुताबिक समस्या यह है कि लोग अपने मोबाइल फोन हर साल बदल देते हैं. इनमें बहुत कम सेलफोन ही सुरक्षा मानकों के तहत डंप किए जाते हैं. यह वाकई एक खतरनाक चलन है. अनुमान के मुताबिक एक सेलफोन पांच साल तक चल सकता है. फिर भी यूरोप में 10 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता हर साल अपना हैंडसेट बदल देते हैं.

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि यदि मोबाइल फोन, लैपटाप या आईपाड बदलना जरूरी ही हो जाए, तो पुराने को रिसाइकलिंग के लिए दे देना सबसे बेहतर विकल्‍प है. प्रयास यह होना चाहिए कि ई कचरा कम से कम पैदा हो ताकि पर्यावरण को इससे होने वाली क्षति कम रहे. गैजेट्स का इस्‍तेमाल करने वालों को इसके सुरक्षित निपटान का दायित्‍व भी निभाना होगा.

रविवार, 23 दिसंबर 2007

अफ्रीका से 17 साल में 24 हजार जिराफ गायब

अफ्रीकी जिराफ के अस्तित्व पर भारी खतरा मँडरा रहा है और यदि शीघ्र ही इनके संरक्षण के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो इनके विलुप्त होने में देर नहीं लगेगी. अमेरिकी और कीनियाई जीव विज्ञानियों ने एक अध्ययन में कहा कि जिराफ की आबादी पर भारी खतरा मँडरा रहा है.

इंटरनेशनल जिराफ वर्किंग ग्रुप की अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है सोमालिया, इथियोपिया तथा कीनिया में सशस्त्र संघर्ष और शिकार की वजह से जिराफों की संख्या घटकर सिर्फ तीन हजार रह गई है, जबकि 1990 में इनकी संख्या 27 हजार थी. अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी अफ्रीकी जिराफ की संख्या लगभग 100 ही रह गई है और ये नाइजर के एक ही क्षेत्र तक सिमटकर रह गए हैं.

सात महीनों में 29 शेर मरे

भारत के गिरि वन और अन्य वन्य जन्तु अभयारण्यों में पिछले सात महीनों में 29 शेरों की मृत्यु हुई. पिछले दिनों सरकार ने संसद में यह जानकारी दी थी. इन 29 शेरों में से 22 की स्वाभाविक कारणों से, एक की कुएँ में गिरने पर, पाँच की बिजली का करन्ट लगने से तथा एक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हुई.

केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य सरकार ने शेरों की मृत्यु के मामलों की जाँच पड़ताल कराई तथा चार संदिग्ध व्यक्तियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया है. केन्द्र सरकार ने भी शेरों की रक्षा के लिए अनेक कदम उठाए है. इसके बावजूद यह बताने को कोई तैयार नहीं है कि शेरों की आबादी में लगातार गिरावट क्‍यों आ रही है.

पर्यानाद: बात भारत के शेर या अफ्रीकी जिराफ की नहीं है. असल मुद्दा यह है कि सारी दुनिया में वन्‍य जीवों के साथ एक निर्दयी हिंसा जारी है जिसे रोकने के लिए कोई चिंति‍त नहीं है. अध्‍ययन होते जा रहे हैं, रिपोर्ट तैयार हो रही हैं लेकिन असल समस्‍या जस की तस है. यदि इस विनाश के क्रम को नहीं रोका गया तो अंत में इसकी परिणिति मानव जाति के समूल नाश के रूप में होगी.

इस तरह बाली पहुंचा था सारी दुनिया का संदेश

इंडोनेशिया के शहर बाली में क्‍लाइमेट मीटिंग खत्‍म हो गई. क्‍योटो प्रोटोकॉल की जगह लेने के लिए एक नए समझौते के मसविदें पर काम करने की सहमति बन गई है. भविष्‍य बताएगा इसके क्‍या परिणाम आते हैं. पिछले माह 20 नवंबर को पर्यानाद् ने अपने पाठकों को इस मीटिंग के बारे में जानकारी देते हुए सारी दुनिया से उठ रही रीयल एक्‍शन की मांग का हिस्‍सा बनने की अपील की थी. (देखें वीडियो)

यह तो नहीं बता सकता कि कितने लोगों ने पर्यानाद् की अपील पर इस ग्‍लोबल अभियान में हिस्‍सा लिया लेकिन यह जानकारी देने के लिए पर्यानाद् तैयार है कि जिन लोगों ने अभियान में हिस्‍सा लिया उनका संदेश कैसे बाली पहुंचा और उसे किस तरह क्‍लाइमेट मीटिंग में पहुंचाया गया. तो आप भी देखें सारी दुनिया के साथ....

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2007

घट रहे हैं पेंग्विन

ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरों के बीच यह बात सामने आई है कि अंटार्कटिका में पेंग्विन की जनसंख्या घट रही है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड की ताजा रिपोर्ट में यह चिंताजनक खुलासा किया गया है. रिपोर्ट में बताया गया कि अंटार्कटिका पर पाई जाने वाली पेंग्विन की 4 प्रजातियों - चिनस्ट्रैप, इम्पेरर, एडली और जेंटू के बजूद पर खतरा मँडरा रहा है.

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वह जमीन छिनती जा रही है, जो पेंग्विन के बच्चों के बढ़ने के लिए जरूरी है. असल में पेंग्विन सी-आइस (वह बर्फ जो अंटार्कटिका में सबसे कम तापमान के दिनों में समुद्र के पानी से बनती है) अंडे देती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन और जरूरत से ज्यादा मछली मारने की वजह से पेंग्विन के लिए भोजन की कमी भी एक समस्या बन रही है.

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के डायरेक्टर अन्ना रिनॉल्ड्स ने बताया कि अंटार्कटिका, धरती के तापमान में हो रही औसत बढ़ोतरी की तुलना में 5 गुना तेजी से गर्म हो रहा है. 26 साल में बर्फ में 40 फीसदी तक की कमी आई है. इस गिरावट की वजह से 'क्रिल' (बर्फ में रहने वाले झींगे जैसे जीव) की संख्या तेजी से घटी है, जो पेंग्विन का मुख्य भोजन माना जाता है.
चित्र: साभार विकी

गुरुवार, 20 दिसंबर 2007

भारत का विकास प्रदूषण रहित

प्रदूषण रहित विकास तंत्र सीडीएम लागू करने के मामले में भारत विश्व में सबसे प्रमुख देश बनकर उभरा है. इस तंत्र का पर्यावरण प्रदूषण को कम करना है. राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) द्वारा बुधवार को पारित 11वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज में कहा गया है कि इस साल अक्तूबर तक प्रदूषण रहित विकास तंत्र (सीडीएम) कार्यकारी बोर्ड में दर्ज 852 परियोजनाओं में से 294 परियोजनाएं अकेले भारत की हैं'.

तो क्‍या है सीडीएम: सीडीएम क्योटो प्रोटोकाल के तहत एक लचीली व्यवस्था है, जिससे औद्योगिक देश विकासशील देशों में सतत और पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देकर उत्सर्जन में कमी के प्रति अपनी बाध्यता पूरी कर सकें. हालांकि जहां तक कार्बन उत्सर्जन में कमी [सीईआर] का सवाल है भारत का स्थान चीन के बाद दूसरा है.


अमेरिका भी ऊर्जा बचाने की राह पर

ग्लोबल वार्मिग के खतरे के मद्देनजर अमेरिका ने भी ऊर्जा बचाने की राह पकड़ ली है. वहां की प्रतिनिधि सभा में जीवाश्म ईधन की खपत कम करने वाला विधेयक पारित हो गया है. इस विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में कारों में ईधन की खपत कम करने के उपाय बढ़ाने को अनिवार्य किया जाना शामिल है. इसे लागू किए जाने पर दो करोड़ अस्सी लाख कारों को अमेरिकी सड़कों से हटाने के बराबर फायदा होगा.

यह विधेयक राष्ट्रपति जार्ज बुश के हस्ताक्षर के बाद कानून की शक्ल ले लेगा. प्रतिनिधि सभा में विधेयक के पक्ष में 314 और विरोध में 100 मत पड़े. पर्यावरणविदों ने विधेयक का स्वागत किया है. विधेयक के अन्य प्रावधानों में ज्यादा बिजली खपत वाले बल्बों का इस्तेमाल 2012 तक बंद करने और कार इंजनों के लिए अक्षत ईधन खास कर मक्के और लकड़ी के टुकड़ों से बनने वाले एथनाल का उत्पादन छह गुना तक बढ़ाना शामिल है.

मंगलवार, 18 दिसंबर 2007

विशालकाय चूहा और आदमी से बड़ा बिच्‍छू

इंडोनेशिया के सुदूर पूर्वी क्षेत्र में पापुआ प्रांत में खोज के दौरान वैज्ञानिकों ने दो स्तनपायी जीवों का पता लगाया है. इन जीवों में एक विशालकाय चूहा भी है. वैज्ञानिकों के अनुसार पाए गए दोनों जीव नई प्रजाति के है. 'कंजरवेशन इंटरनेशनल' और 'इंडोनेशियन इंस्टीट्यूट आफ सांइस' के वैज्ञानिक समूह ने 2005 के बाद एक बार फिर फूजा पहाड़ियों का भ्रमण किया जिस दौरान उन्हे कई नए पौधे और जानवर मिले.

इस दौरान टीम को दो स्तनपायी जीव भी मिले है जिनमें सबसे छोटे थली धारी जीव 'सरकार्टीटस पिगमी पोसम' के अलावा 'मेलोमिस' विशालकाय चूहा शामिल है. इस चूहे का आकार आमतौर पर पाए जाने वाले चूहे से पांच गुना है. खोज का नेतृत्व करने वाले 'कंजरवेशन इंटरनेशनल' के उपाध्यक्ष ब्रूस बीहल्र के अनुसार, यह अपने आप में सुखद एहसास है कि पृथ्वी पर एक जगह ऐसी भी है जहां वन्यजीव और प्राकृतिक जीव सुरक्षित हैं.


आदमी से बड़े हुआ करते थे समुद्री बिच्छू

कभी समुद्री बिच्छू मनुष्य से बड़े हुआ करते थे. इनकी लंबाई ढाई मीटर यानी आठ फुट तक हुआ करती थी. ब्रिटेन और जर्मनी के शोधकर्ताओं के हाथ लग गया है इसी तरह के बिच्छू के एक पंजे का जीवाश्म. यह जीवाश्म पश्चिमी जर्मनी के सीमांत कस्बे प्रूएम में खुदाई के दौरान पाया गया है. यह आरथ्रोपाड यानी संधिपाद श्रेणी के जीव का अब तक का सबसे बड़ा जीवाश्म है. ब्रिटिश रायल सोसाइटी के एक जर्नल बायोलाजी लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन में यह बात कही गई है.

पश्चिमी इंग्लैंड की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में पृथ्वी विज्ञान संकाय के सिमोन ब्रैडी के शब्दों में यह सचमुच एक अद्भुत खोज है. सामान्य से बड़े आकार के कनखजूरे, बिच्छू, काक्रोच और कीट-पतंगों के जीवाश्म बरामद किए जाने के बारे में तो हम सब वाकिफ हैं, लेकिन अभी तक किसी रेंगने वाले प्राचीन कालीन जीव का यह शायद सबसे बड़ा जीवाश्म है.

अध्ययन में बताया गया है कि प्रूएम में बरामद पंजा 46 सेंटीमीटर का है. यह पंजा 4600 से 2550 लाख वर्ष पूर्व समुद्री बिच्छू का है जिसे जैकेलोपटेरस रेनानिया कहा जाता है. वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह पंजा जिस बिच्छू का है उसकी लंबाई 2.33 मीटर से 2.5 मीटर के बीच का रहा होगा. यह अब तक के बरामद किसी आरथ्रोपाड के शरीर से कहीं ज्यादा बड़ा है.

सोमवार, 17 दिसंबर 2007

बाली सम्‍मेलन: एक और गंवाया हुआ अवसर

जलवायु परिवर्तन पर बाली सम्मेलन को पलीता लगाने में अमेरिका ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. जैसे तैसे रोडमैप पर सहमति जताई तो अब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश कह रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए विकासशाली देशों को उत्साहित नहीं किया जा रहा है जो चिंता की बात है. यानि कोई न कोई पेंच बनाए बिना अमेरिका को संतुष्टि नहीं मिलने वाली.

यह बात सही है कि सिर्फ़ विकसित देशों के प्रयास से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता और इसमें विकासशील देशों की भागीदारी को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए. इसी मुद्दे को लेकर अमेरिका हठधर्मिता का प्रदर्शन कर रहा है. इसीलिए बाली में अमेरिका के रूख़ की आलोचना हुई. दो दिन पहले यूएनओ ने अमेरिका व अन्‍य विकसित देशों पर सम्‍मेलन को विफल बनाने का आरोप जड़ा था.

इसके बाद काफी प्रयास किए गए और जलवायु परिवर्तन पर सभी पक्षों में एक रोडमैप पर सहमति बनी है जिसके आधार पर ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लए नया समझौता तैयार होगा. रोडमैप के दस्तावेज़ के मुताबिक अगले दो वर्षों में बातचीत के आधार एक नया समझौता तैयार होगा जो 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल की जगह लेगा. क्योटो समझौते की सीमा वर्ष 2012 में ख़त्म हो रही है और इसे अमरीका का समर्थन प्राप्त नहीं है.

कमियां भी हैं: खबरों के अनुसार सम्मेलन में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के दस्तावेज़ पर आरंभिक सहमति तो बन गई लेकिन लक्ष्य तय नहीं हो सके जिसके लिए योरपियन संघ ज़ोर लगा रहा था. समझौते के प्रारुप पत्र से यह भी स्पष्ट नहीं है कि कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने में विकासशील देशों की कितनी भागीदारी होगी.

योरपियन संघ काफ़ी बढ़ चढ़कर कह रहा था कि विकसित देशों को ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना चाहिए और पहले के दस्तावेज़ में उसे प्रमुखता से जगह मिली थी मगर इस दस्तावेज़ में वो हिस्सा महज़ फ़ुटनोट बनकर रह गया है यानी मुख्य दस्तावेज़ के पीछे जोड़ी गई टिप्पणियाँ और आँकड़े. साथ ही वर्ष 2050 तक उत्सर्जन को आधा करने की जो बात थी वो भी इस दस्तावेज़ से बाहर कर दी गई है.

अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि अगर प्रदूषण फैलाने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए कोई बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किया गया तो वह इसे स्वीकार नहीं करेगा. अमेरिका के लिए चिंता का विषय था ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने की अनिवार्य शर्तें, इस बारे में दस्तावेज़ की भाषा अस्पष्ट सी रखी गई दिखती है.

इसमें विकसित देशों से ज़रूरी प्रतिबद्धताओं और क़दमों को राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन देने की बात कही गई है, अमेरिका हमेशा से ही ऐसी भाषा का पक्षधर रहा है. मगर इसमें ये भी कहा गया है कि ये समर्थन अनिवार्य शर्तों के रूप में भी हो सकता है. इस भाषा के साथ अमेरिका में आने वाले नए प्रशासन को वर्ष 2009 के अंत तक वैधानिक रूप से अनिवार्य सीमा तय करने की छूट मिल सकती है.

खबरों के अनुसार जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख ईवो ड बुए नम आँखों के साथ सम्मेलन कक्ष के बाहर जाते दिखे. पर्यावरण से जुड़े संगठनों और अन्य प्रतिनिधियों ने दस्तावेज़ की इस भाषा को कमज़ोर बताते हुए इसे गँवाया हुआ एक अवसर कहा है.

शनिवार, 15 दिसंबर 2007

सवाल यह है कि हम किसे मार रहे हैं?

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में इटावा के पास चंबल नदी में दुर्लभ प्रजाति गेवियेलिस गेंगेटिक्स के सत्रह घड़ियाल मरे हुए पाए गए. घड़ियालों की यह दुर्लभ प्रजाति अब विलुप्त होने की कगार पर है और शासन इनके संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन घड़ियालों की हत्‍या की गई है और इसके लिए वन विभाग के अमले के वो लोग ही जिम्‍मेदार बताए जा रहे हैं जिन्‍हें रक्षा करने का दायित्‍व सौंपा गया.

जान लीजिए कि गेवियेलिस गेंगेटिक्स एक इतनी महत्वपूर्ण प्रजाति के घड़ियाल हैं कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्वेंशन ऑफ नेचर एंड नेचरल हेरिटेज़ (आईयूसीएन) ने इसे क्रिटिकल एंडेजर्ड श्रेणी में रखा है. भारतीय वन्य जीव अधिनियम 1972 में भी इस प्रजाति को अनुसूची प्रथम में रखा गया है.

इसे बचाने के लिए 1979 में चंबल नदी को घड़ियालों के लिए घोषित अभयारण्य बनाया गया. उस समय घड़ियालों की संख्या इतनी कम हो चुकी थी कि घड़ियालों की यह प्रजाति ही समाप्त हो जाती. इसी नदी से प्राप्त घड़ियालों के अंडों को इकट्ठा कर कृत्रिम प्रजनन हेतु लखनऊ स्थित कुकरेल घड़ियाल सेंटर पर ले जाया जाता था, वहां इन्हे दो-तीन साल रखने के पश्चात फिर चंबल में छोड़ दिया जाता था.

वर्ष 1996 तक यह संख्या बढ़कर 1200 तक पहुंच गई किंतु वर्ष 2000 से एक बार फिर घड़ियालों के ऊपर संकट के बादल छाने लगे. कारण यह था कि अभयारण्य में जगह-जगह चोरी छिपे शिकार और उनके प्राकृत वास में बालू खनन का प्रकोप बढ़ता ही गया. पूरे चंबल नदी क्षेत्र में घड़ियालों की प्रजाति पर एक नया संकट दिख रहा है क्‍योंकि यह मानव निर्मित है.

दुर्लभ प्रजाति के जानवरों के प्रति यह क्रूरतापूर्ण व्‍यवहार हमारी किस पाशविक प्रवृत्ति का द्योतक है? जीव हत्‍या का अधिकार किसने हमें दे दिया और वह भी ऐसे जीव जिन्‍हें हम पहले ही खत्‍म होने की कगार पर पहुंचा चुके हैं. सरकार उन्‍हें बचाने का अभियान चला रही है और चंद धन लोलुप अपराधी इन्‍हें मार रहे हैं. यदि इस क्रूरता पर अंकुश नहीं लगा तो एक दिन समूची मानव जाति का ही विनाश हो जाएगा.

बुधवार, 12 दिसंबर 2007

अगले पांच साल में बर्फ नहीं होगी आर्कटिक में

आर्कटिक महासागर वर्ष 2012 में बर्फ रहित हो जाएगा. नासा के एक जलवायु वैज्ञानिक जे ज्वाली ने यह आशंका जताई है. उनका कहना है कि जिस रफ्तार से आर्कटिक महासागर की बर्फ पिघल रही है, उसे देखते हुए इस बात की पूरी आशंका है कि 2012 तक वह बर्फ रहित हो जाएगा.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आंकड़ों के अनुसार ग्रीनलैंड की बर्फीली चादर पिछले आंकड़े की तुलना में करीब 19 अरब टन अधिक पिघल चुकी है. इस साल गर्मी में यहां की बर्फ चार साल पहले मौजूद बर्फ की तुलना में बिल्कुल आधी थी.

पिछले साल वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने आश्चर्य जताते हुए कहा था कि आर्कटिक के बर्फ पिघलने की गति को देखते हुए लगता है कि यह 2040 तक नदारद हो जाएगा. इसी सप्ताह नए आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद ज्वाली ने कहा कि इस गति से तो आर्कटिक महासागर वर्ष 2012 में ही बर्फ रहित हो सकता है.


कल अमेरिका में ये हुआ

अमेरिका के मध्य स्थित ओकलाहोमा शहर में तूफान के चलते में जहाँ सड़कें बर्फ की मोटी चादर के नीचे छिप गई हैं और यातायात व्यवस्था ठप हो गई है, वहीं 6,00,000 घरों और बाजारों की बिजली गुल हो गई है. तूफान के कारण हुए सड़क हादसों में 17 लोगों की मौत हो चुकी है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आने वाले दिनों में भी जबरदस्त बर्फबारी होने और जमा देने वाली ठंड पड़ने की भविष्यवाणी की गई है. ओकलाहोमा और मिसौरी में आपात स्थिति की घोषणा कर दी गई है. इस जबर्दस्‍त तूफान के कारण सड़क हादसों में 15 लोगों की मौत हो चुकी है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि चारों ओर से बर्फ के भार से पेड़ों की टहनियों के चटखकर गिरने की आवाज सुनाई पड़ रही है. राष्ट्रीय मौसम सेवा ने ओकलाहोमा मिसौरी, कनसास और नेब्रास्का में सड़कों पर पोस्टर लगाकर बर्फीला तूफान आने की चेतावनी दी है. राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड को सतर्क कर दिया गया है.

अब पर्यानाद्: यह केवल एक बानगी है. पर्यावरण से छेड़डाड़ और प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने के इससे भी बद्तर परिणाम हमें झेलना होंगे. यह तो महज एक शुरूआत है.

शनिवार, 8 दिसंबर 2007

रेनबो वारियर और लुई पाल्‍मर

जलवायु परिवर्तन के मसले पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में संदेश देने का जो तरीका 'रेनबो वारियर' और स्विट्जलैंड के एक यात्री ने निकाला है उससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. वैश्विक पर्यावरण आंदोलन ग्रीनपीस के ध्वजपोत 'रेनबो वारियर' ने बेनोआ बंदरगाह की गर्म-उनींदी छोटी तरंगों पर इस उम्मीद के साथ डेरा डाला कि संयुक्त राष्ट्र संघ के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के नीति निर्धारकों तक उनका संदेश पहुंच जाएगा.

चालीस डोंगियों से घिरे इस प्रसिद्ध जहाज के किनारे लगने के समय बंदरगाह पर मौजूद संचालक ने वहां प्रवेश करने की अनुमति देने में अच्छा खासा वक्त लगाया, उसने कमोबेश यही रुख जहाज के साथ चल रही मीडियाकर्मियों की नाव के साथ भी अपनाया. जहाज के साथ चल रही डोंगियों को बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई.

'रेनबो वारियर' भारत से इंडोनेशिया पहुंचा है. ग्रीनपीस से जुड़े गेविन एडवर्डस, जो जलवायु परिवर्तन अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं ने बताया कि पिछले महीने की शुरूआत तक यह जहाज गंगा के मुहाने पर था. वहां से गुजरते हुए कोलकाता के नजदीक थर्मल प्लांट के एक 'बायलर' के खिलाफ जहाज पर एक बैनर लगाया गया था. इस अभियान का संदेश पुराने फैशन के बल्बों की जगह सीएफएल के बल्ब लगाने की वकालत करना था. (Ban The Bulb)

वहीं, स्विट्जलैंड के एक यात्री ल्यूसर्न से लुई पाल्मर सौर ऊर्जा से चलने वाली कार के जरिए 50 हजार किलोमीटर की यात्रा कर बाली पहुंचा है. लुई ने इस वर्ष 3 जुलाई को ल्यूसर्न से अपनी यात्रा शुरू की थी. भारत होते हुए अब वह 3 से 14 दिसंबर के बीच बाली में हो रहे जलवायु परिवर्तन के लिए यहां पहुंचा है.

पाल्मर का इस सम्मेलन में भाग ले रहे प्रतिनिधियों को संदेश स्पष्ट है कि हम परंपरागत ईधन की बजाय सौर ऊर्जा का इस्तेमाल भी यातायात के लिए कर सकते है. पाल्मर का इरादा जीवाश्म ईधन के इस्तेमाल के बिना सड़क यातायात के माध्यम से पूरी दुनिया का भ्रमण करना है. फिलहाल इस गाड़ी को उन्होंने बाली इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर के सामने खड़ा किया है. इस सम्मेलन के बाद पाल्मर ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका का भ्रमण करेगे.

पर्यानाद्: जो साथी पिछली पोस्‍ट नहीं पढ़ पाए हैं, वे इसे जरूर पढ़ें.

आप भी आएं पर्यानाद्. पर, स्‍वागत है

बाल किशन जी ने कहा है कि मैं पर्यावरण संरक्षण के उपाय भी बताऊं. घुघूती बासूती ने सबके मिले जुले विचारों वाली पोस्‍ट रखने का सुझाव दिया है. मुझे कोई एतराज नहीं. पर्यानाद् पर आने वाले सभी साथियों से मैं विनम्र अनुरोध करूंगा कि प्रकृति, पर्यावरण, वन्‍य जीव संरक्षण, ग्‍लोबल वार्मिंग या इससे जुड़े किसी भी विषय पर यदि कोई विचार आपके मन में हैं, कोई जानकारी आप बांटना चाहते हैं, तो बेझिझक लाइए आपका स्‍वागत है.

अपने विचार या जानकारी जो भी चाहें, मुझे paryanaad@gmail.com पर भेजें, पर्यानाद् पर आपके नाम से आ जाएगा. कोई बंदिश नहीं, कोई संपादन नहीं (मेरा प्रोफेशन होने के बावजूद उसे अलग रखूंगा, जब तक कि ऐसा करना बेहतरी के लिए जरूरी ना हो, या कोई विवशता ना बन जाए) बस इतनी अपेक्षा रहेगी कि जानकारी सही हो और विचार मौलिक हों.

इधर मेरे मन में भी एक विचार कई दिनों से चल रहा है लेकिन उसे अभी सबके साथ शेयर नहीं करूंगा क्‍योंकि उस सिलसिले को आरंभ करने के लिए यहां कुछ तकनीकी समायोजन करने होंगे. जैसे ही कर लूंगा आपको भी बता दूंगा.

वैसे शुरुआत मीनाक्षी जी ने कर ही दी है. उन्‍होंने एक बहुत ही सुंदर लिंक दिया, मैने देखा तो बस मोहित हो गया. आप सब भी देखें, मुझे यकीन है कि पसंद करेंगे.

बाल किशन जी हालांकि मैं मानता हूं कि कोई जानकारी देने के लिए मैं सही व्‍यक्ति नहीं हूं. अपने आस पास नजरें दौड़ाएं, बहुत कुछ ऐसा दिख जाए‍गा, जिसे रोकने वाला कोई नहीं. आज से यह काम आप कीजिए.

बहरहाल एक छोटा सा तरीका बताता हूं. याद करें आपने अंतिम बार किसी ऐसे पौधे को कब सींचा था, जो आपने नहीं लगाया? आए दिन हम अखबारों में वृक्षारोपण समारोहों के आयोजन के बारे में पढ़ते हैं. क्‍या आप जानते हैं कि 80 प्रतिशत मामलों में ऐसे पौधे कभी वृक्ष नहीं बन पाते क्‍योंकि उनकी देखभाल करने वाला आमतौर पर कोई नहीं होता. ऐसे किसी आयोजन के बाद कुछ पेड़ों को जीवित रखने का संकल्‍प ले लीजिए. (पर उपदेश कुशल बहुतेरे)

एक भूल सुधार: 26 नवंबर को यहां जो पोस्‍ट मैने दी थी, उसके लिए वीडियो का लिंक सागरचंद नाहर जी ने उपलब्‍ध कराया था. नाहर जी का शुक्रिया. उस वक्त मैं उनका उल्‍लेख करना भूल गया था. भूल के लिए माफ करें नाहर जी.

तो आज मीनाक्षी जी के सौजन्‍य से देखें कुछ मन को झंकृत कर देने वाले दृश्‍य, साथ में थोड़ा सा कुछ पढ़ना भी होगा और थोड़ा सा कुछ सुनना भी होगा. नीचे की कड़ी को क्लिक करें, आप पहुचं जाएंगे. हां यदि समय लगे तो जरा धैर्य रखें. यकीन जानें आपको निराशा नहीं होगी. ये रही कड़ी....

Earth Teach Me to Remember....

पुनश्‍च: घुघूती बासूती, उम्‍मीद करता हूं कि आप प्रसन्‍न होंगी लेकिन अब आप भी अपने अनुभव, विचार, जानकारी यहां आकर हमारे साथ बांटें.

शुक्रवार, 7 दिसंबर 2007

चार सौ बाघ निगल गया मध्‍य प्रदेश

बरसों से 'टाइगर स्टेट' के दर्जे पर इतरा रहे मप्र के लिए यह खतरे की घंटी है. नई और वैज्ञानिक विधि से हुई ताजा गणना ने यह राज फाश कर दिया है कि राज्य के जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों में सिर्फ 296 बाघ ही बचे हैं. जबकि कुछ समय पहले तक समूचा महकमा यह दावे करते नहीं अघाता था कि प्रदेश में बाघों की संख्या 7 सौ है. अगर सरकार के दावे तब सही थे तो यह जवाब लाजिमी है कि बाकी 400 बाघों को जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

एक खबर के अनुसार भारतीय वन्य प्राणी संस्थान देहरादून ने हाल में मप्र के बाघों की गणना की अंतिम रिपोर्ट तैयार की है. इसमें संख्या का खुलासा हुआ है. लगभग पाँच महीने पहले संस्थान ने अंतरिम रिपोर्ट में बाघों की अनुमानित संख्या 4 सौ के आसपास बताई थी. लेकिन अंतिम निष्कर्ष यह उभरा कि राज्य के खुले एवं संरक्षित क्षेत्रों में महज 296 बाघ बचे हैं. यदि शावकों को भी जोड़ लिया जाए तो यह गिनती 346 तक पहुँच रही है.

खास बात यह है कि बाघों की गणना का तरीका अब बदल गया है. वन्य प्राणी संस्थान ने वैज्ञानिक विधि अपनाते हुए बाघों का जंगल में रहवास क्षेत्र, उनका विचरण क्षेत्र, पगमार्क आदि के आधार पर गिनती का तरीका अपनाया है. इसके पहले राज्य के वनकर्मी बाघों के पगमार्क के आधार पर ही गिनती किया करते थे. ताजा रिपोर्ट से साफ है कि राज्य में बाघों की संख्या में काफी कमी आ गई है. खुले वन क्षेत्रों में तो इनकी संख्या में चिंताजनक गिरावट है. जबकि नेशनल पार्क व टाइगर रिजर्व में यह संख्या संभली हुई तो है, लेकिन पिछले दावों की तुलना में काफी कम है.

अब मप्र के पाँच टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 232 है और खुले क्षेत्रों में महज 64 बाघ हैं. कई टाइगर रिजर्व में तो बाघों के नजर ही नहीं आने की बातें भी सामने आती रही हैं. मप्र में कुल 5 टाइगर रिजर्व हैं, जबकि 25 अभयारण्य और 9 नेशनल पार्क हैं. उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद मप्र में वर्ष 2003 में बाघों की संख्या 711 बताई गई थी. इसके बाद वर्ष 05 व 06 में गणना की विधि को वैज्ञानिक आधार दे दिया गया.

नतीजतन जो संख्या सामने आई वह चौंकाने वाली रही. यदि यही हाल रहा तो आने वाले वक्तमें मप्र के माथे से टाइगर स्टेट का तमगा हट भी सकता है. वैसे राज्य के अधिकारी अभी यह कहकर अपने आप को दिलासा दे रहे हैं कि पूरे देश में ही 911 बाघ बचे हैं और इनमे से साढ़े तीन सौ मप्र में हैं लिहाजा तमगा छिनने का सवाल ही नहीं. यही सोच शायद बाघों के प्रति पर्याप्त समर्पण में बाधक बन रही है. वैसे इस संख्या ने राज्य के जंगलों में शिकार माफिया के सक्रिय होने तथा जंगल महकमे के लाचार और लापरवाह होने की तरफ भी उँगली उठाई है.

जानकारों का मानना है कि हालातों को तत्काल बस में नहीं किया गया तो स्थिति और बिगड़ भी सकती है. इधर सूत्र बताते हैं कि राज्य शासन शीघ्र ही वन विभाग के वरिष्ठ अफसरों को तलब कर जंगलों व संरक्षित वन क्षेत्रों की स्थिति पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है. बाघ की कुल नौ उप प्रजातियाँ ज्ञात हैं, जिनमें से पाँच फिलहाल मौजूद हैं. भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार में बंगाल या रॉयल बंगाल टाइगर पाया जाता है.

जानवरों में बाघ सबसे वजनदार कैट प्रजाति का है. साइबेरियन टाइगर में अब तक सबसे वजनदार बाघ 384 किग्रा का दर्ज है. नर बंगाल टाइगर का वजन 227 किलो तक होता है जबकि मादा का 141 किलो. बाघ कभी भी समूह में शिकार नहीं करता. यह अकेले शिकार करना पसंद करता है. इसकी दौ़ड़ने की गति 49 से 65 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है. बाघ पाँच मीटर यानी करीब 16 फुट की ऊँचाई तक कूद सकता है और 9 से 10 मीटर दूरी से शिकार पर छलाँग लगा सकता है.

गुरुवार, 6 दिसंबर 2007

तुम्‍हारी दास्‍तां तक ना होगी दास्‍तानों में

बाली में संयुक्त राष्ट्र के एक सम्मेलन में युवा कार्यकर्ताओं ने वहां आए प्रतिनिधियों को चेताया कि अगर जल्द ही जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो उन्हे अपना अस्तित्व बचाने के लिए एक आपातकालीन किट की आवश्यकता पड़ सकती है.

'बाली इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर' में जब 187 देशों के 10 हजार प्रतिनिधि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए चर्चा कर रहे थे तो अचानक स्वंयसेवी संगठनों के सदस्य यहां आ पहुंचे. उन्होंने प्रतिनिधियों को आपातकालीन किट के बारे में जानकारी दी और कहा कि लोगों को क्यों इसकी जरूरत पड़ सकती है.

उन्होंने बताया कि इस किट में मलेरिया से बचाव के लिए दवाईयां है क्योंकि जलवायु परिवर्तन से सहसा कई तरह की बीमारियों का खतरा उत्पन्न हो सकता है. स्वयंसेवकों के अनुसार समुद्र का पानी लगातार बढ़ता जा रहा है और तटीय इलाकों में खतरा पैदा हो रहा है. इस वजह से लाईफ बेल्ट की आवश्यकता हो सकती है.

मूल समस्‍याओं की उपेक्षा से क्षुब्‍ध स्‍वयंसेवकों ने कहा कि पूरी दुनिया का तापमान इतना अधिक हो जाएगा कि इसके लिए हाथ से चलने वाला एक पंखा होना जरूरी होगा. उन्‍होंने बताया पिघलते हिमनदों की वजह से जलापूर्ति प्रभावित होगी और पानी को साफ करने के लिए जल शोधक दावइयों की आवश्यकता हो सकती है.

स्‍वयंसेवकों का कहना है कि कृषि भूमि के बंजर होने से खाद्य समस्या हो सकती है. इससे निपटने के लिए लोगों के पास पर्याप्त राशन होना चाहिए. बदलती जलवायु का प्रभाव शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र पर भी पड़ता है. इससे मुकाबले के लिए विटामिन की गोलियां भी होनी चाहिएं. जलवायु परिवर्तन की वजह से लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ सकता है इसलिए उनके पास हर समय एक बस का टिकट होना चाहिए.

इसे भी देखें : ग्‍लोबल वार्मिंग से चिंतित लोगों का प्रदर्शन

ग्लोबल वार्मिग से चिंतित लोगों का प्रदर्शन

इंडोनेशिया के प्रशांत द्वीपों में रहने वाले लोगों ने ग्लोबल वार्मिग के कारण डूबते अपने घरों की ओर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है. वे पूछ रहे है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर से उनके घरों को कौन बचाएगा? जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर यहां हो रहे सम्मेलन में दुनिया भर के 187 देशों के 10000 से ज्यादा प्रतिनिधि भाग ले रहे है.

ग्लोबल वार्मिग के खतरे से निपटने के लिए संमेलन में तय की जा रहीं नीतियों को जल्द से जल्द लागू किए जाने की मांग करते हुए टोंगा, किरीबती, बाउगेनविले और टॉरेस द्वीपों के लोगों ने अपने पारंपरिक गानों, नृत्य और चित्रों के माध्यम से खुद पर ग्लोबल वार्मिग के प्रभावों को दर्शाया.

पारंपरिक गाने के रूप में अपनी पीड़ा और भय का इजहार करते हुए वे कह रहे है कि अब मछली पकड़ना बहुत मुश्किल हो गया है और पेड़ लगातार गिर रहे है. समुद्र हमारे पास आता जा रहा है और हमारी जमीन को निगल रहा है. बाउगेनविले के कार्टरेट्स द्वीप से इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने आर्ई उरसुला राकोवा ने कहा कि अगर पश्चिमि देश हमें अपने यहां बसाने की पेशकश करते हैं तो उनके साथ मिल कर हमारी संस्कृति नष्ट हो जाएगी. हम नहीं चाहते कि हमारे साथ ऐसा हो.

बुधवार, 5 दिसंबर 2007

खतरे में है अफ्रीका की सबसे बड़ी झील

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी झील का अस्तित्व खतरे में है. विक्टोरिया झील के निरीक्षण के बाद विशेषज्ञों ने यह राय दी है. झील का उपयोग कारों और ट्रकों की सफाई के लिए किया जा रहा है. इससे झील का पानी और प्रदूषित हो गया है. झील में जलकुंभियों की भरमार है, जिससे मछलियां भी कम होती जा रही है.

पर्यावरण वैज्ञानिकों और विक्टोरिया झील के किनारे रहने वाले लोगों का मानना है कि यदि जल्द इस झील को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो झील को पूरी तरह से खत्म होने से नहीं रोका जा सकता है. विक्टोरिया झील के पास के एक गांव के पर्यावरण वैज्ञानिक एरिक ओडाडा ने कहा कि यह झील पहले भी तीन बार सूख चुकी है, लेकिन इस बार यह खतरा मनुष्य द्वारा पैदा की गई स्थितियों के कारण अधिक चिंताजनक बन गया है.

आसपास के गांवों में जंगल की कटाई और झील में मिलने वाली दर्जनों नदियों के कारण उत्पन्न गाद से झील को काफी नुकसान हो रहा है. पिछले सौ सालों में जलस्तर 120 मीटर से घटकर 40 मीटर रह गया है. 15 वर्षो से झील के सहारे मछली का कारोबार करने वाले ज्योफ्री ओब्योर ने कहा कि यदि यह सब जारी रहा तो झील पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर रहने वाले लाखों लोगों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी.

मंगलवार, 4 दिसंबर 2007

मानव के सर्वश्रेष्‍ठ होने का भ्रम

लंबे समय से यह धारणा चली आ रही थी कि चीजों को ग्रहण करने और उसे जानने समझने के मामले में मानव सभी प्राणियों से आगे है. हाल के एक अनुसंधान में यह तथ्य उभर कर आया है कि नन्हे चिंपैंजी याद्दाश्त के मामले में हमें आसानी से पछाड़ सकते हैं. मजे की बात यह है कि अदना से दिखने वाले इन चिंपैंजी की याद्दाश्त का मामला सिर्फ पेड़-पौधों या जंगलों से जुड़ा हुआ नहीं है. वे ज्ञान के क्षेत्र में और गिनती याद रखने तक में भी मनुष्यों से आगे हैं.

जापानी वैज्ञानिकों ने अपने एक अध्ययन में पाया कि गिनती याद करने और उन्हें दोहराने के मामले में नन्हे चिंपैंजियों में वयस्क मानवों से कहीं ज्यादा और विलक्षण गुण होता है. क्योटो यूनिवर्सिटी के तेत्सूरो मात्सुजावा ने जापानी वैज्ञानिकों के इस ऐतिहासिक अध्ययन के निष्कर्षो के महत्व को रेखांकित किया है. उनका कहना है कि अब भी बहुत सारे लोग और अनेक जीव वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव तमाम बोधात्मक क्रियाओं में चिंपैंजी से आगे हैं.

इस अनुसंधान के निष्कर्ष करेंट बायोलोजी में प्रकाशित किए गए हैं. निष्कषों में कहा गया है कि कोई इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता है कि चिंपैंजी पांच साल की उम्र में नन्हे चिंपैंजी याद्दाश्त के परीक्षण में आदमियों से अच्छा प्रदर्शन करेंगे. अनुसंधान में कहा गया है कि यहां हमने पहली बार प्रदर्शित किया है कि समान प्रक्रिया अपनाते हुए समान उपकरण से परीक्षण करने पर नन्हे चिंपैंजी में संख्यात्मक याद्दाश्त वयस्क मानव से ज्यादा होती है. उनमें विलक्षण कार्यकारी स्मृति क्षमता होती है.

मातृत्व से गुजर चुकी मादा चिंपैंजियों में अय पहली चिंपैंजी थी जिसने उचित अंकों से वास्तविक जीवन की वस्तुओं को लेबल करने के लिए अरबी अंकों का इस्तेमाल करना सीखा था. इस बार संपन्न नए परीक्षण में चिंपैंजियों या मानवों को टच-स्क्रीन की मदद से एक से ले कर नौ तक विभिन्न अंकों को पेश किया गया. इसके बाद इन अंकों को खाली वर्गो से बदल दिया गया. परीक्षण में हिस्सा ले रहे मानवों और चिंपैंजियों को यह याद रखना था कि अंक किन स्थलों पर आए थे. उन्हें उन वर्गो को उचित क्रम में छूना था.

अध्ययन में पाया गया कि नन्हे चिंपैंजी एक निगाह में अनेक अंक याद रख सकते हैं. उनकी ग्राह्य शक्ति इतनी पैनी है कि अगर उन अंकों को 210 मिली सेकेंड के लिए फ्लैश किया जाता है तो भी उन्हें याद रहता है. उनके प्रदर्शन में कोई परिवर्तन नहीं आता है. उल्लेखनीय है कि हमें मोटे तौर पर अपनी पलकें झपकाने में करीब 105 मिलीसेकेंड का समय लगता है. अनुसंधानकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि 210 मिलीसेकेंड इतना पर्याप्त समय नहीं है जिसमें मानव दृष्टि स्क्रीन का चक्कर लगाए.

अध्ययन में पाया गया कि कुल मिला कर तीन नन्हे चिंपैंजियों का प्रदर्शन अपनी मांओं से बेहतर है. तीनों नन्हे चिंपैंजी प्रदर्शन के मामले में वयस्क मानवों से भी बाजी मार ले गए. वयस्क मानवों का प्रदर्शन तीनों ही चिंपैंजियों से खराब था. वे रिस्पांस देने में ज्यादा सुस्त रहे. मात्सुजवा ने मानव के मुकाबले चिंपैंजियों के बेहतर प्रदर्शन की जटिल गुत्थी सुलझाने के प्रयास के तहत कहा कि चिंपैंजियों में किसी जटिल दृश्य या पैटर्न की विस्तृत एवं सटीक छवि को याद रखने की विशेष क्षमता होती है. उन्होंने कहा कि इस तरह की फोटोग्राफिक याददाश्त मानव के कुछ सामान्य बच्चों में भी होती है. फिर उम्र के साथ घटती जाती है.

सोमवार, 3 दिसंबर 2007

तो आपका जन्‍म किस मौसम में हुआ?

वैज्ञानिकों को आपने शायद ही कभी ऐसी बातें करते सुना हो, लेकिन ये सच है कि सितारों से नहीं बल्कि इस बात से आपका व्यक्तित्व और स्वास्थ्य तय होता है कि आप किस मौसम में पैदा हुए हैं. संडे टेलीग्राफ ने अपनी रिपोर्ट में यूरोप के एक शोधकर्ता दल की रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें पाया गया है कि भाग्य का पहिया सितारों से नहीं घूमता बल्कि यह जालिम मौसम का कमाल होता है, जो लोगों के व्यक्तित्व के विभिन्न पहुलओं को संचालित करता है.

शोध के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में मई महीने में पैदा होने वाली महिलाएँ अधिक मनोवेगी व्यवहार करती हैं जबकि जिनका जन्म नवंबर में होता है वे अधिक बहिर्मुखी होती हैं. इसी प्रकार वसंत ऋतु में पैदा होने वाले पुरुष सर्दियों में पैदा हुए पुरुषों के मुकाबले अधिक दृढ़ विचारों के होते हैं. रिपोर्ट कहती है कि पतझड़ में पैदा होने वाले लोग शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय होते हैं और फुटबॉल जैसे खेल में कमाल दिखाते हैं जबकि वसंत ऋतु में पैदा होने वालों का रुझान शतरंज जैसे खेलों की ओर अधिक होता है. सितंबर और दिसंबर के बीच पैदा होने वाले लोग मानसिक रूप से अधिक आतंकित रहते हैं जबकि इस बात के ठोस सबूत हैं कि जाती सर्दी और आते वसंत में पैदा हुए लोग शिजोफ्रेनिया के अधिक शिकार होते हैं.

हार्टफोर्डशायर यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर रिचर्ड वाइजमैन के हवाले से दैनिक ने लिखा है यह एकदम से कुछ वैसा ही है जैसा आप मौसम के तापमान के संबंध में उम्मीद लगाते हैं. मौसम संबंधी कई सारे प्रभाव दोनों गोलार्द्ध में उलटे हो जाते हैं. एक अन्य शोधकर्ता तथा एबरदीन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन ईगल कहते हैं किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को परिभाषित करने में मुख्य दोष आहार तथा पोषण में मौसमी उतार-चढ़ाव तथा सर्दियों में होने वाले संक्रमण का होता है. यहाँ आनुवंशिक तथा अन्य पर्यावरणीय कारण भी भूमिका अदा करते हैं. इसलिए मौसम की पैदाइश एक सहायक कारक है.

लोगों का भविष्य बताने वाले हालाँकि इन चीजों को नहीं मानते और वे इसी तथ्य से प्रभावित हैं कि किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तित्व सितारों से प्रभावित होता है. इसके तर्क में वे उन लाखों लोगों का उदाहरण देते हैं जो रोजाना अपना भविष्यफल देखते हैं. लेकिन शोधकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि इन प्रभावों के पीछे कुछ मूलभूत जैविकीय कारण जिम्मेदार हैं न कि सितारों या ग्रहों की गति.

स्वीडन की यूमेया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जयंती छोटाई के अनुसार गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला के शरीर द्वारा पैदा किए गए संवेदनशील हार्मोन्स का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चा किस मौसम में पैदा हुआ है और यही स्तर गर्भावस्था के समय से ही शिशु के व्यक्तित्व को आकार देना शुरू कर देता है.

प्रोफेसर छोटाई कहती हैं कि तापमान, संक्रमण, रौशनी, जीवनशैली में परिवर्तन तथा पोषण ये सभी चीजें मौसम पर निर्भर करती हैं और इसी से ऐसा समझा जाता है कि हार्मोन्स प्रभावित होते हैं. ये विभिन्नता हमारी सौर प्रणाली में आने वाले मौसमी बदलाव से समझी जा सकती हैं. उदाहरण के लिए सर्दियों में सूरज की रोशनी कम रहती है और तापमान में गिरावट आती है. ऐसे मौसम में विषाणुओं का संक्रमण अधिक फैलता है.

रविवार, 2 दिसंबर 2007

आइए फिर याद करें भोपाल गैस त्रासदी

तेईस साल गुजर गए. मानव इतिहास की सबसे क्रूरतम् औद्योगिक दुर्घटना यानि भोपाल गैस त्रासदी को याद करने का समय एक बार फिर आ चुका है. कुछ रस्‍मी विरोध प्रदर्शन होंगे, कुछ आंसू बहाए जाएंगे और फिर जिंदगी आगे बढ़ जाएगी. लेकिन उन हजारों लोगों का जीवन उस काली रात के बाद हमेशा के लिए बदल चुका है जिनके अपने इस त्रासदी की भेट चढे थे. दुर्भाग्‍य यह है कि आज भी हजारों लोग ऐसे हैं जो गैस के दुष्‍प्रभावों के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं.

आंकड़ों की बात करने का अब कोई औचित्‍य नहीं है. लेकिन आइए आज फिर देखते हैं मौत के उस खेल से जुड़े कुछ वीभत्‍स आंकड़े. ग्रीनपीस के आंकड़े कहते हैं करीब 8 हजार लोग तभी मारे गए थे. उसके बाद से अब तक करीब 25 हजार से ज्‍यादा मौतें हो चुकी हैं. हर माह 10 से 15 लोग आज भी गैस के दुष्‍प्रभावों से उपजी विकृतियों का शिकार होकर मौत के मुंह में चले जाते हैं. करीब 5 लाख लोग गैस के दुष्‍प्रभावों का शिकार किसी न किसी रूप में हुए थे. करीब 1.5 लाख बच्‍चे गैस से प्रभावित माता पिता की संतानों के रूप में जन्‍म लेने के बाद स्‍थाई यप से स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं का सामना कर रहे हैं.

गैस पीडितों को मुआवजा बंट गया, वारैन एंडरसन आज भी स्‍वतंत्र घूम रहा है और भोपाल इस जघन्‍य त्रासदी की रुला देने वाली दु:स्‍मृतियों को बोझ अपने सीने पर ढोने को वि‍वश है. लेकिन सबसे अहम् सवाल यह है कि हमने इस त्रासदी से क्‍या सीखा? क्‍या हमने ऐसी दुर्घटना फिर कभी ना हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रयास किए ? जवाब बहुत खराब है..... नहीं.

औद्योगिकीकरण की अंधी रफ्तार अब और तेज हो चुकी है और यह गारंटी कोई नहीं दे सकता कि ऐसा फिर नहीं होगा. यूनियन कार्बाइड की बंद पड़ी उस मानवभक्षी फैक्‍ट्री के खंडहरों में अब भी जहरीले रसायन पड़े हैं, जिन्‍हें हटाने को लेकर यदा कदा आवाज उठती है लेकिन राजनीति शुरू हो जाती है और कुछ नहीं हो पाता.

यदि हम ऐसी घटनाओं से सबक नहीं सीख सकते तो कुछ भी हमारी चेतना को जाग्रत करने में सक्षम नहीं है. पर्यावरण का विनाश अंतत: मानवीय जीवन के विनाश का कारण साबित होगा. भोपाल की जगह कोई और शहर होगा, यूनियन कार्बाइड की जगह कोई और कंपनी होगी लेकिन मरेंगे वहां भी इंसान ही. बस उनके नाम बदल जाएंगे. प्रकृति का आर्तनाद् सुनिए, यह पर्यानाद् है.... अपने बच्‍चों की खातिर, अपनी खातिर पर्यावरण का विनाश रोकिए.

शनिवार, 1 दिसंबर 2007

शायद उसकी जान नहीं बच पाई

यह सच्ची घटना कल शुक्रवार 30 नवंबर की शाम को हुई. मैं और मेरा एक मित्र अपने अपने दोपहिया वाहनों पर सवार हो‍कर कहीं जा रहे थे. शहर के बीचों-बीच एक बेहद व्‍यस्‍त मार्ग पर हमेशा की तरह भयंकर ट्रैफिक जाम लगा देख कर मूड ऑफ हो गया. वाहनों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा था और उस नीम अंधेरे में अंडर ब्रिज के ठीक पहले सारा ट्रैफिक थम सा गया था. धीरे-धीरे अपने छोटे से दो पहिये को लुढ़काते हुए जब मैं ट्रैफिक जाम के बीच पहुंचा तो माजरा देख कर दिल को बड़ी चोट पहुंची.

वह सड़क के बीचों-बीच अधमरी सी हालत में पड़ा था. वाहन चालक बड़बड़ा रहे थे लेकिन कोई उसकी सहायता के बारे में कुछ नहीं सोच रहा था. सब एक दूसरे को कोसते हुए किसी भी तरह उसके अगल-बगल से आगे निकलने की कोशिश में लगे थे. मै किसी तरह अपना वाहन लेकर उसके पास पहंचा और सबसे पहला काम मैने अपने दोपहिए को उसके सामने आड़ा खड़ा कर एक तरफ का ट्रैफिक रोकने का किया. इस बीच मेरा दोस्‍त अपने वाहन पर आगे निकल गया.

हालत बड़ी विकट थी. मैं उसके पास पहंचा और झुक कर देखने का प्रयास किया कि वह जीवित था या नहीं .... धीरे से हाथ लगा कर उसे छुआ तो उसके शरीर में हल्‍की सी जुंबिश हुई. अचानक लोगों का जमावड़ा इकट्ठा होने लगा. एक सज्‍जन बोले, मर गया है.... दूसरे बोले कमर टूट गई है... मैं सोच रहा था कि क्‍या करूं ? जहां जाने के लिए निकला था, वहां पहुंचना भी जरूरी था. लेकिन में उसे सड़क पर इस तरह छोड़ कर भी नहीं जा सकता था.

ट्रैफिक बुरी तरह जाम हो चुका था और पब्लिक मुझसे कुछ करने की उम्‍मीद कर रही थी. यह सब कुछ केवल दो या तीन मिनट के अंदर हो गया... मैंने सोचा कि अब उसे उठाना ही होगा. पिछले हिस्‍से को धीरे से पकड़ा, उठाया ... सड़क पार की बगल में गहरे नाले के किनारे बने बगीचे की बाड़ के अंदर हाथ डाल कर उसे धीरे से छोड़ दिया. ट्रैफिक चल पड़ा किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा और मैं भी अपना वाहन उठा कर आगे बढ़ गया.

लेकिन मेरा मन अब भी मुझे कचोट रहा है. मुझे नहीं मालुम कि वह जीवित बचा या नहीं, मुझे उस समय जो सही लगा मैने कर दिया. लेकिन मन बार-बार कह रहा है कि मुझे उसकी सुरक्षा के लिए कुछ और भी करना चाहिए था जो कि मैने नहीं किया. यह आत्‍मग्‍लानि का बोध मुझ पर हावी होता जा रहा है और नहीं जानता कि मैं इससे कैसे उबरूंगा.

मैं आपसे जानना चाहता हूं कि ऐसे हालात में यदि आप होते तो क्‍या करते ? जो मैने किया क्‍या वह सही था ? या मुझे कुछ और भी करना चाहिए था ? अवश्‍य बताएं कि मैने जो किया वह सही था या गलत ? यदि उसकी मौत हो गई तो क्‍या मैं भी उसके लिए जिम्‍मेदार माना जाउंगा ?

शायद आप जानना चाहते हैं कि वह कौन था ? वह करीब पांच फीट लंबा एक सर्प था.

शुक्रवार, 30 नवंबर 2007

गंदगी से लाखों गरीब लोग मरते हैं हर साल

संयुक्त राष्ट्र संघ 2008 को अंतरराष्ट्रीय स्वच्छता वर्ष घोषित करने जा रहा है और इसके पीछे उसका मकसद दुनिया को यह बताना है कि विश्व के 2.6 अरब लोग पानी, सफाई और शौच सुविधाओं के अभाव में कितनी दिक्कतें उठा रहे है.

यूएनओ की एक रिपोर्ट में बताया गया है, प्रतिवर्ष गंदगी के चलते 15 लाख बच्चे मर जाते हैं क्योंकि उनके पास साफ पानी, साफ-सफाई और शौचालय की सुविधा नहीं होती. महिलाओं और लड़कियों को इसकी मार अधिक झेलनी पड़ती है क्योंकि उन्हे मुंह अंधेरे उठ कर घर से बाहर शौच के लिए जाना पड़ता है.

संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून और नीदरलैंड के प्रिंस विलियम एलेक्जेंडर यूएन मुख्यालय में 2008 को अंतर्राष्ट्रीय स्वच्छता वर्ष के रूप में मनाए जाने की घोषणा करेंगे ताकि अंतरराष्ट्रीय एजेंडे में इसे भी प्रमुखता से शामिल किया जा सके. प्रिंस एलेक्जेंडर संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पानी एवं स्वच्छता को लेकर गठित किए गए सलाहकार मंडल के अध्यक्ष हैं.

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के कार्यकारी निदेशक आन वेनेमन ने कहा कि विद्यालयों में साफ पानी, स्वच्छ शौचालय और हाथ धोने की समुचित व्यवस्था होने से लड़कियां ठीक से पढ़ पाती है. जिन 2.6 अरब लोगों को ये दिक्कतें झेलनी पड़ती है, उनमें 98 करोड़ बच्चे है.

संयुक्त राष्ट्र ने इन लोगों के लिए स्थितियां बेहतर करने की मुहिम में 10 अरब डालर खर्च करने की बात कही है ताकि 2015 तक इस समस्या से जूझने वालों की संख्या आधी हो जाए. भारत में परिस्थितियां अनुमान से कहीं बदतर हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में हालात आज भी उन्नीसवीं सदी जैसे ही बने हुए हैं.

गुरुवार, 29 नवंबर 2007

देश का सबसे प्रदूषित शहर कौन सा?

क्‍या आपके पास है इसकी जानकारी? कहीं आपका शहर सबसे प्रदूषित तो नहीं? आमतौर पर लोग दिल्‍ली को सबसे प्रदूषित मानते हैं क्‍योंकि प्रदूषण के मामले में दिल्ली काफी बदनाम है, लेकिन असलियत कुछ और ही है. दिल्ली नहीं बल्कि पंजाब का लुधियाना शहर देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है. दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित 146 देशों में भारत का 101वाँ स्थान है.

पर्यावरण और वन राज्यमंत्री नमोनारायण मीणा ने लोकसभा में एक सदस्‍य के सवाल के लिखित जवाब में यह जानकारी हाल ही में दी है. उन्होंने बताया कि न केवल लुधियाना देश का सर्वाधिक प्रदूषित शहर है, बल्कि पहले दस सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में पंजाब के कई शहर शामिल हैं. इस सूची में दिल्ली का 16वाँ, कोलकाता का 39वाँ तथा मुंबई का 45वाँ स्थान है.

उन्होंने बताया कि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के तहत 339 स्थानों पर परिवेशी वायु गुणवत्ता की निगरानी कर रहा है. शहरों की रैंकिंग प्राय: प्रदूषण के स्तर के आधार पर की जाती है. 2005 में एनवायरमेंटल सस्टेनेबिलिटी इंडेक्स पर एक अध्ययन किया गया जिसमें पूर्व के और मौजूदा प्रदूषण स्तरों सहित विभिन्न आँकड़े एकत्र किए गए. इसमें भारत का 146 देशों में 101वाँ स्थान है.

पिछले डेढ़ सौ सालों में छठा सबसे गर्म वर्ष

पिछले 150 सालों में वर्ष 2007 छठा सबसे गर्म वर्ष रहा हालाँकि संतोषजनक बात यह रही कि यह साल उतना अधिक गर्म नहीं रहा, जितनी कि इसके शुरू होने के पहले आशंका जताई गई थी. ब्रिटेन के ईस्ट ऐंजिला विश्वविद्यालय में मौसम अनुसंधान केन्द्र के प्रमुख फिल जोंस का कहना है कि यह बीते साल के लगभग बराबर ही गर्म रहा और इस आधार पर इसे छठवाँ सर्वाधिक गरम वर्ष कहा जा सकता है. यह केन्द्र विश्व मौसम संगठन को भी मौसम संबंधी आँकड़े उपलब्ध कराता है.

केन्द्र की ओर से इसकी शोध रिपोर्ट के आधार पर कहा गया था कि 1860 में तापमान की गणना शुरू होने के बाद लगभग 150 सालों में वर्ष 2007 सर्वाधिक गर्म रहेगा. जबकि इस साल के मध्य तक ही यह बात गलत साबित होना शुरू हो गई थी. जानकारों का मानना है कि इस आशंका को जाहिर करने के बाद पर्यावरण के प्रति दुनिया भर में चलाई गई मुहिम इस मामूली से सुधार का कारण हो सकती है.

बैक्टीरिया लड़ेगा ग्लोबल वार्मिग से

वैज्ञानिकों ने एक ऐसा बैक्टीरिया खोज निकाला है, जो ग्लोबल वार्मिग से लड़ने में काफी मददगार साबित होगा. न्यूजीलैंड के वैज्ञानिकों ने यह कारनामा कर दिखाया है. इन वैज्ञानिकों ने एक ऐसे बैक्टीरिया की खोज की है जो हानिकारक मीथेन गैस का भक्षण कर वातावरण का स्वच्छ करने में मदद करता है.

स्थानीय मीडिया के अनुसार सूक्ष्म जीव विज्ञानी डा. मैथ्यू स्टोट की टीम ने रोटूआ इलाके में हेल गेट नामक जगह पर इस बैक्टीरिया की खोज की है. हेल गेट की मिट्टी लवण, अम्लीय पदार्थो और मिथेन गैस से प्रभावित थी लेकिन ये बैक्टीरिया पृथ्वी के भीतर मौजूद मीथेन का भक्षण कर लेते थे और इस प्रकार यह गैस मिट्टी के अंदर ही स्वत: समाप्त होती रहती थी.

अपनी इस खोज के बारे में डा. स्टोट का कहना है कि ये बैक्टीरिया वातावरण में मीथेन गैस की मात्रा को काबू में करने के काम में काफी उपयोगी साबित हो सकते हैं. मीथेन गैस को ग्लोबल वार्मिग के लिए प्रमुख उत्तरदायी गैस के रूप में माना जाता है. अब वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इन बैक्टीरिया की मदद से मिथेन गैस के उत्सर्जन की समस्या से बेहतर तरीके से निपटा जा सकता है.

फिलहाल तो डा. स्टोट की टीम इस बैक्टीरिया के बड़े पैमाने पर प्रजनन के काम में लगी है. वह विभिन्न जीव विज्ञानियों के सहयोग से इनको प्रयोगशाला में पैदा करने की तकनीकी ईजाद करने के मिशन में जुटे हुए हैं. उनका लक्ष्‍य यह है कि बड़े पैमाने पर बैक्‍टीरिया का प्रजनन कर मीथेन की मात्रा समाप्‍त करने में इसका इस्‍तेमाल किया जा सके.

बुधवार, 28 नवंबर 2007

तो डूब जाएंगे कोलकाता जैसे शहर

निकट भविष्य में समुद्र के जलस्तर कई मीटर बढ़ने से कोलकाता, ढाका और शंघाई जैसे कई एशियाई शहरों को खतरा होगा. इस भावी संकट से निपटने के लिए सभी देशों की सरकारों को फौरन प्रयास करने होंगे. 1961 से 1993 तक समुद्र का जल स्तर 1.8 मिलीमीटर सालाना की दर से बढ़ रहा था लेकिन पिछले चौदह वर्ष से इसकी रफ्तार 3.1 मिलीमीटर प्रति वर्ष हो गई है.

इस खतरनाक वृद्धि की वजह उत्तरी ध्रुव पर बर्फ की चादर का लगातार पतला होना है. इससे कोलकाता, ढाका और शंघाई जैसे तटीय नगरों को सबसे ज्‍यादा मुश्किलें होंगी. इसी कारण यह सदी खत्म होते-होते मछलियों की बीस से तीस फीसदी प्रजातियां खत्म हो सकती हैं. बढ़ते तापमान का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा.

विशेषज्ञों का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक ग्लोबल जीडीपी तीन प्रतिशत तक कम हो सकती है. लेकिन इससे भी बड़ा नुकसान कृषि और वनस्पतियों का होना है. अफ्रीका की कई फसलों के लिए पानी की उपलब्धता आज से आधी होगी जबकि एशिया के तटीय नगरों में जहां डूब वाले क्षेत्र बढ़ेंगे, वहीं पीने का पानी बहुत कम मिलेगा.

इन हालात से निपटने के लिए पर्यावरण क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित संस्था 'इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज' के अध्यक्ष डा. आर के पचौरी ने कुछ उपाय सुझाए हैं. उनका कहना है कि आगामी तीन दिसंबर से बाली में होने वाले विश्व पर्यावरण सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र महासचिव और पूर्व अमेरिकी उप राष्ट्रपति अल गोर के मौजूद रहने से इन मुद्दों की गंभीरता बढ़ेगी. तकनीकी तौर पर पर्यावरण के मौजूदा खतरों से निपटने में हम सक्षम हैं लेकिन कोशिश फौरन करनी होगी.

डॉ पचौरी साधारण दिखने वाले उपायों पर जोर देते हैं. बकौल डा. पचौरी सार्वजनिक परिवहन के साधनों में वृद्धि सड़कों पर वाहनों की तादाद कम करेगी. लोगों को खुद भी रोज-रोज वाहन निकालने से बचना होगा. मकानों का नक्शा ऐसा बनाना होगा जिससे एसी की जरूरत कम हो. उनका मत था कि पर्यावरण के खतरों से आम आदमी को जागरूक करके ही लड़ा जा सकता है.

जलवायु परिवर्तन से निपटने को मदद मांगी

भारत जैसे विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन को सहने योग्य बुनियादी ढांचे के निर्माण की जरूरत पर जोर देते हुए यूएनडीपी की रिपोर्ट में इन परिवर्तनों के घातक परिणामों से निपटने के उपायों पर खर्च के लिए विकसित देशों से आगामी दस वर्ष में 86 अरब डालर की राशि देने की सिफारिश की गई है. यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट 2007-08 में यह भी चेतावनी दी गई है कि दुनिया में जलवायु में हो रहे परिवर्तनों से गरीबों की स्थिति में सुधार की दिशा में भारत की कोशिशों को धक्का लग सकता है.

फाइटिंग क्लाइमेट चेंज ह्यूमन सोलिडरिटी इन ए डिवाइडेड व‌र्ल्ड शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में विकासशील देशों से आह्वान किया गया है वे जलवायु परिवर्तनों को सहने योग्य बुनियादी ढांचे सर्वाधिक खतरे का सामना कर रहे लोगों को अधिक सामाजिक सुरक्षा, सामुदायिक क्षमता का निर्माण तथा आपदा नियंत्रण को मजबूत बनाने के लिए अधिक प्रयास करें.

जलवायु परिवर्तनों को सहने के लिए होने वाले उपायों के वित्तपोषण के लिए रिपोर्ट में सिफारिश की है कि विकसित देश 86 अरब डालर की राशि अब से वर्ष 2016 तक विकासशील देशों को दें. रिपोर्ट जारी करते हुए योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दुनिया के सभी भागों पर पड़ेगा, खासकर दक्षिण एशिया पर अधिक. इन परिवर्तनों के चलते मलेरिया जैसी बीमारियां बढ़ेगी वहीं हिमालय के हिमनद तथा मानसून पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.

अहलूवालिया ने कहा कि इसलिए भारत को अकेले नहीं बल्कि सभी देशों को मिलकर इन परिवर्तनों को कम करने और इनके प्रभावों को सहने के लिए सामूहिक उपाय करने चाहिए. भारत में विकास कार्यो पर जलवायु परिवर्तनों के प्रभाव की चर्चा करते हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की स्थानीय प्रतिनिधि मैक्सीन ओलसान ने कहा कि भारत में लोगों के स्वास्थ्य शिक्षा और समृद्धि को सुधारने की दिशा में धीमी प्रगति हुई है. लेकिन अब भी काफी लोग विकास की दौड़ में पिछड़ रहे हैं.

ओलसान का मानना है कि अगर इन कमियों के होते हुए जलवायु परिवर्तन का खतरा भी आए तो असमानता बढ़ेगी. ओलसान ने कहा कि अगर देश को समग्र विकास की महत्वाकांक्षा को हकीकत में तब्दील करना है तो गरीब लोगों की क्षमता इन परिवर्तनों के सहने योग्य बनानी होगी.

मंगलवार, 27 नवंबर 2007

ग्‍लोबल वार्मिंग: कपड़े उतार कर विरोध

ठंड लगने पर आप क्‍या करते हैं? कपड़े पहनते हैं...! एक ग्‍लेशियर निर्वस्‍त्र होने लगे तो आप क्‍या करेंगे? स्विट्जरलैंड में पिछले दिनों 600 लोगों ने पिघलते हुए एक ग्‍लेशियर के लिए कड़कड़ाती ठंड में अपने कपड़े उतार कर ग्‍लोबल वार्मिंग के खिलाफ अनूठे तरीके से विरोध जताया क्‍योंकि ग्‍लेशियर पर चढ़ी बर्फ की मोटी चादर उसके वस्‍त्र हैं और ग्‍लोबल वार्मिंग के कारण ग्‍लेशियर पिघलने से ग्‍लेशियर भी निर्वस्‍त्र हो रहे हैं. स्विट्जरलैंड का Aletsch Glacier सिर्फ एक साल में 115 मीटर पिघल गया. यह समस्‍या सारी दुनिया में है. इससे संबंधित समाचार यहां है.

चेतावनी : कृपया ध्‍यान दें, इस वीडियो में न्‍यूडिटी है लेकिन अश्‍लील नहीं है. यह बच्‍चों के देखने के लिए नहीं है.

दिल मजबूत है तो देखें: जीव हिंसा के दृश्‍य

सारी दुनिया में जीवों के साथ हिंसा जारी है. जापान ह्वेल का शिकार करता है तो कैनेडा में सील के नन्‍हें बच्‍चों को बेरहमी से पीटकर मार दिया जाता है. इस वीडियो रिपोर्ट में सील के शिकार के कुछ ऐसे द्श्‍य हैं जो आपको विचलित कर सकते हैं. अत: दिल मजबूत हो तो ही देखें .....

शिकार की तलाश



वीडियो रिपोर्ट: एचएसयूएस

सोमवार, 26 नवंबर 2007

पर्यावरण अनुकूल उत्‍पादों का बाजार बन रहा है अब

इको फ्रेंडली या पर्यावरण अनुकूल सामान की मांग भी बन रही है और उत्‍पादक इसमें रुचि लेने लगे हैं, जो कि एक अच्‍छी बात है. लेखन सामग्री बनाने वाली लग्जर ने कहा है कि वह नोएडा संयंत्र में जनवरी से पर्यावरण अनुकूल उत्पाद बनाने का काम शुरू करेगी. कंपनी ने बताया कि उसने अपनी निर्यात आय को बढ़ाने के लिए उक्त कदम उठाया है. कंपनी का मानना है कि वर्ष 2010 तक निर्यात से उसकी आय बढ़कर 100 करोड़ रुपये हो जाएगी.

लग्जर इंटरनेशनल का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग बढ़ रही है. वहां यह नया विचार है. हम तेजी से बढ़ रहे इस प्रचलन को भुनाना चाहते हैं. कंपनी ने बताया कि लग्जर की 75 देशों में पहुंच है और ब्रांड 125 देशों में पंजीकृत है. पिछले वित्त वर्ष में लग्जर ने 10 प्रतिशत बढ़ोतरी के साथ 58 करोड़ रुपये की लागत वाले लेखन उपकरणों का निर्यात किया था.

कंपनी अपने उत्पादों को खुदरा स्टोरों जैसे वाल-मार्ट, आफिस-मार्ट को भी बिक्री के लिए बेचती है. गौरतलब है कि लग्जर लाइटिंग इंस्ट्रूमेंट ने नोएडा में पिछले साल 100 फीसदी निर्यात संबंधित विनिर्माण इकाई स्थापित की थी. कंपनी ने बताया कि उक्त इकाई. 25000 वर्ग फुट क्षेत्र में फैली है और इसकी विनिर्माण क्षमता लगभग 20 लाख लेखन उपकरणों की है. कंपनी ने पर्यावरण अनुकूल उत्पादों को कंपनी की अनुसंधान एवं विकास दल से विकसित किया है. इन उत्पादों को रीसाइकिल्ड सामग्री से तैयार किया जाएगा.

पर्यानाद्: यह किसी कंपनी के प्रचार के लिए लिखा गया पोस्‍ट नहीं है. यह महज एक समाचार है. मेरा उद्देश्‍य सिर्फ यह बताना है कि अब पर्यावरण की चिंता समाज में एक स्‍थाई व्‍यवहार के रूप में स्‍थापित हो रही है. क्‍या ही बेहतर हो कि जब खरीददारी करें तो अन्‍य चीजों के साथ एक बार यह जानने का प्रयास भी करें कि आपके द्वारा खरीदा जाने वाला उत्‍पाद पर्यावरण अनुकूल है या उसे क्षति पहुंचाने वाला है्. इतना सोचने में तो कोई बुराई नहीं है.

नहीं रोकेगा जापान व्हेल का शिकार

हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद से जापान स्‍वयं को शांति का पक्षधर बताता रहा है लेकिन जीवों के प्रति उनके क्रूरता भरे इस रवैये को क्‍या कहा जाएगा ? जापान हर साल हजारों व्‍हेल मछलियों का शिकार कर लेता है. वन्‍य जीवों की रक्षा के लिए काम करने वाले संगठन इसका विरोध करते हैं लेकिन जापान पर इसका कोई असर नहीं होता. तमाम विरोध के बावजूद वे इसे बदस्‍तूर जारी रखे हैं.

एक बार फिर भारी विरोध के बावजूद जापान ने व्हेल के शिकार अभियान को जारी रखने की मंशा जताते हुए कहा है कि सुरक्षा कारणों से इसकी तिथि बाद में बताई जाएगी, जबकि व्हेल बचाने के हिमायती कार्यकर्ताओं के मुताबिक सरकार अंतरराष्ट्रीय टकराव से बचने के लिए अभियान में विलंब कर रही है, ना कि इसलिए कि व्‍हेलों की हत्‍या को लेकर उसके रवैये में कोई बदलाव आ गया है.

जापान ने अपने इस सालाना अभियान के तहत अंर्टाकटिक महासागर में एक हजार से ज्यादा व्हेल मारने की योजना बनाई है. इस योजना के चलते काफी समय से जापान के साथ आस्ट्रेलिया एवं न्यूजीलैंड का तनाव चल रहा है. जापान ने पहली बार हंपबैक व्हेलों को पकड़ने की योजना बनाई है, जिसको लेकर पर्यावरणविदों में गुस्सा है. इस प्रजाति की व्हेल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय मानी जाती है और शिकारियों के बीच काफी लोकप्रिय है.

जापान के मत्स्य विभाग ने कहा है कि इसके पोत अभियान पर रवाना होंगे, लेकिन तारीख की घोषणा सुरक्षा कारणों से अभियान के केवल कुछ वक्त पहले की जाएगी. व्हेल शिकार विभाग के एक अधिकारी ने कहा कि हमने जो दिन तय किया है, उसी दिन रवाना होंगे.

जापानी पोत व्हेल के शिकार के लिए आमतौर पर नवंबर में रवाना होते हैं. उधर, ग्रीनपीस संगठन ने आरोप लगाया है कि राजनीतिक कारणों के चलते शिकार अभियान को टाला गया. ग्रीनपीस के एस्परान्या के नेता कार्ली थामस ने कहा कि व्हेल का शिकार जापान एवं अमेरिका जैसे व्हेल संरक्षण समर्थक देशों के बीच राजनयिक तनाव का कारण है. एस्परान्या व्हेल के शिकारियों पर नजर रखने की कोशिश करेगी.

रविवार, 25 नवंबर 2007

प्राकृतिक आपदाओं में चार गुना वृद्धि

जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनियाभर में बाढ़ और सूखे की आपदाओं में बढ़ोत्तरी हुई है. अंतरराष्ट्रीय राहत संस्था ऑक्सफ़ैम के अनुसार पिछले 20 सालों के दौरान मौसम संबंधी आपदाओं की संख्या में लगभग चार गुना तक बढ़ोत्तरी हुई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि आबादी में बढ़ोत्तरी के कारण लाखों की संख्या में लोग बाढ़ और तूफ़ान और चक्रवात के कारण प्रभावित हो रहे हैं. जलवायु परिवर्तन और मौसम में आ रहे बदलावों की वजह से बाढ़ या सूखा जैसी आपदाओं का सबसे प्रमुख कारण तापमान में बढ़ोत्तरी यानी ग्लोबल वार्मिंग को बताया गया है.

ऐजेसी के आंकड़े के अनुसार अब हर साल औसतन 500 आपदाएँ घटित होती हैं जबकि 20 साल पहले यानी 1980 के आसपास इनकी संख्या 120 हुआ करती थी. इसी तरह पिछले बीस सालों के दौरान बाढ़ की विभीषिकाओं में लगभग छह गुना बढ़त देखी गई है. ऑक्सफ़ैम के अनुसार इसी साल के दौरान सिर्फ़ एशिया महाद्वीप में ही बाढ़ से लगभग 25 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं.

छोटी आपदाओं की चिंता: ऑक्सफ़ैम ने कहा है कि आमतौर पर बड़ी प्राकृतिक आपदाओं पर ही सरकारों का ध्यान होता है, जबकि मौसम की गड़बड़ी के कारण छोटी और मध्यम दर्ज़े की आपदाओं को नज़रअंदाज़ करना ख़तरनाक साबित हो रहा है. ऐजेंसी ने चिंता जताते हुए कहा है कि ऐसी छोटी घटनाओं से प्रभावितों की संख्या ज्यादा होती है लेकिन इन्ही तक अंतरराष्ट्रीय सहायता या राहत सबसे कम पहुँच पाती है.

ऑक्सफ़ैम से जुड़े जॉन मैकग्राथ का कहना है,"आबादी में बढ़ोत्तरी के कारण लोग अब जंगलों और पहाड़ों की तरफ़ विस्थापित होने को मजबूर हैं जबकि ऐसे क्षेत्र ही आपदाओं के मामले में सबसे ख़तरनाक साबित होते हैं." ऐजेंसी के अनुसार राहत और सहायता उपलब्ध कराने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भविष्य में मौसम संबंधी घटनाओं से निपटने के लिए कमर कस लेनी चाहिए.
बीबीसी से साभार

शनिवार, 24 नवंबर 2007

तितली की प्रजाति का नाम 40 हजार डॉलर में

अमेरिका में एक व्यक्ति ने 40,800 डालर की बोली लगाकर तितली की एक नई प्रजाति का नाम अपने परिजन के नाम पर रखने का अधिकार प्राप्त किया है. इस व्यक्ति द्वारा चुकाए गए धन का उपयोग इस क्षेत्र में अनुसंधान जारी रखने के लिए किया जाएगा.

फ्लोरिडा विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ताओं ने मैक्सिको के सोनोरान रेगिस्तान में उल्लू प्रजाति की एक तितली की खोज की और उसे नामित करने के अधिकरों को नीलाम करने का फैसला किया. तितली की इस नई प्रजाति का वैज्ञानिक नाम ओप्सीफेन्स ब्लाइथेकिट्जमिलेरे है लेकिन बोली लगने के बाद इसे मिनर्वा नाम दिया गया है. तितली की प्रजाति का यह नाम ओहियो की मार्गरी मिनर्वा ब्लीथ किट्जमिलर की याद में रखा गया है.

फ्लोरिडा म्यूजियम डेवेलपमेंट के निदेशक बेवेरली सेन्सबैक के अनुसार मार्गरी को मिनर्वा और बैंगो के नाम से जाना जाता था. वह एक बेहद अच्छी इंसान थीं और उनके पोते-पोतियां तितली की इस खूबसूरत प्रजाति को उनका नाम देकर उनका सम्मान करना चाहते थे. तितलियों की मिनर्वा प्रजाति की खोज महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रजाति हाल ही में खोजी गई प्रजातियों में सबसे रंगीन और बड़ी है.

विरोध के स्‍वर


इंडोनेशिया के शहर बाली में अगले माह होने वाली संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की क्‍लाइमेट मीटिंग के पहले ही विरोध के स्‍वर उठने लगे हैं. किसानों की वेशभूषा में प्रदर्शन करते स्‍वयंसेवी संगठन के सदस्‍य.

शुक्रवार, 23 नवंबर 2007

स्‍वच्‍छ पर्यावरण के लिए चलाएंगे साइकिल

अमेरिकी शहरों में भीड़-भाड़ को कम करने और पर्यावरण को स्वच्छ करने के इरादे से साइकिल योजना शुरू किए जाने पर विचार किया जा रहा है. हाल के वर्षो में इस प्रकार की योजना योरप में भी शुरू की गई है. अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन संभवत: देश का पहला शहर होगा जहां सबसे पहले साइकिल योजना शुरू की जाएगी. इसके लिए लोगों से मामूली शुल्क लिए जाएंगे.

इस योजना को अमल में लाने के लिए क्लीयर चैनल आउटडोर के साथ एक समझौता किया गया है. सैन फ्रांसिस्को पहले ही क्लीयर चैनल के साथ इस संबंध में एक समझौता कर चुका है. इसके अलावा न्यूयार्क, शिकागो, पोर्टलैंड, ओरेगन में भी इस योजना पर अध्ययन किया जा रहा है. साइकिल कार्यक्रम योजना के सलाहकार पाउल डेमाओ ने कहा कि अमेरिकी लोगों में साइकिल को लेकर खासी रुचि है. साइकिल कार्यक्रम के लिए 2008 बड़ा वर्ष होने जा रहा है.

डेमाओ ने कहा कि वेलिब कार्यक्रम जुलाई में पेरिस में शुरू किया गया था. वेलिब दो शब्दों से बना है. जहां वेलो का मतलब है बाइक वहीं लिबर्टे का आशय आजादी से है. उन्होंने कहा कि इस योजना को खासी लोकप्रियता मिली है.

अमेरिका में राजधानी परिवहन विभाग में पैदल यात्री और साइकिल मामलों के संयोजक जिम सेबास्टियन ने कहा कि वाशिंगटन में साइकिल योजन पर पिछले कई सालों से अध्ययन किया जा रहा है. सेबास्टियन के अनुसार योजना के पहले चरण के तहत वाशिंगटन के 10 स्थानों पर 120 साइकिलों को रखा जाएगा. साइकिल उपयोग की लागत और सदस्यता के बारे में बाद में घोषणा की जाएगी. इस योजना को अगले वर्ष मार्च या अप्रैल में अमल में लाया जा सकता है.

गुरुवार, 22 नवंबर 2007

ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रिकार्ड स्तर के करीब

विश्व के औद्योगिक व विकसित देशों में खतरनाक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है और यह रिकार्ड स्तर पर पहुंचने के करीब है. यह बढ़ोतरी कई विकसित देशों के क्योटो प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर करने के बावजूद हो रही है. अखबार 'आस्ट्रेलियन' में छपी रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रिकार्ड तोड़ने के करीब है.

यह रिपोर्ट ऐसे समय जारी हुई है जब इन गैसों के उत्सर्जन पर लगाम कसने के लिए दुनिया के 41 औद्योगिक व विकासशील देश क्योटो की जगह नई वैश्विक संधि पर चर्चा करने के लिए बैठक करने जा रहे हैं. मौसम में आ रहे बदलाव पर जारी संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन 1990-2000 के बीच में घटा, लेकिन यह 2000-2005 के बीच 2.6 प्रतिशत की दर से बढ़ गया.

यूएन कंवेंशन आन क्लाइमेट चेंज की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि क्याटो प्रोटोकाल पर हस्ताक्षर करने वाले औद्योगिक देशों ने 2012 तक इन गैसों के उत्सर्जन में पांच फीसदी की कमी लाने पर सहमति व्यक्त की है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के मामले में अमेरिका टाप पर है.

जलवायु परिवर्तन पर शीघ्र करनी होगी कार्रवाई: भारत एवं पूर्वी एशिया शिखर वार्ता (ईएएस) में भाग ले रहे अन्य नेताओं ने जलवायु के विपरीत प्रभाव पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने इस मुद्दे पर तत्काल अकेले और सामूहिक कदम उठाने तथा ऊर्जा के नवीकरणयोग्य एवं वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग कर सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया.

शिखर वार्ता में भाग ले रहे सोलह सदस्यों ने एक स्वर में कहा कि वह वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को स्थिर रखने के साझा लक्ष्य को हासिल करने के लिए प्रतिबद्ध है. शिखर वार्ता की समाप्ति पर जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा और पर्यावरण पर सिंगापुर घोषणा जारी की गई. इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सहित आसियान के 10 सदस्य देशों और जापान, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया चीन व दक्षिण कोरिया के नेताओं के दस्तखत हैं.

सिंगापुर घोषणा में जलवायु बदलावों पर चल रही विश्वव्यापी बहस में भारत तथा अन्य देशों के योगदान की सराहना की गई है. नेताओं ने माना कि तेज विकास ने सतत विकास और गरीबी निवारण में योगदान दिया है लेकिन इसने अधिक ऊर्जा उपभोग की समस्या तथा क्षेत्रीय एवं वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा चिंताओं से निपटने संबंधी नयी चुनौतियां पेश की हैं.

तो दुनिया का सबसे छोटा भालू खो जाएगा?

दक्षिण-पूर्वी एशिया के जंगलों में गैरकानूनी शिकार और पेड़ों के कटने की वजह से दुनिया के सबसे छोटे भालू के सामने विलुप्त होने खतरा पैदा हो गया है. ‘सन बेअर’ के नाम से पहचाने जाने वाले इस भालू का निवास स्थान भारत से इंडोनेशिया तक फैला हुआ है और इसे विश्व संरक्षण संघ द्वारा ‘असुरक्षित’ घोषित किया गया है.

जिनेवा स्थित एक समूह (आईयूसीएन) के एक भालू विशेषज्ञ रॉब स्टीनमिट्ज का कहना है, “हमारा अनुमान है कि सन बेअर की संख्या में पिछले 30 सालों में 30 प्रतिशत की गिरावट आई है और यह गिरावट इसी दर से जारी है.” आईयूसीएन भालू विशेषज्ञ समूह के सह अध्यक्ष डेव गारशेलिस का कहना है कि आंकड़ों के अनुसार फिलहाल केवल 10,000 से कुछ ज्यादा भालू ही बचे हैं.

करीब 90 से 130 पाउंड तक के वजन वाले इस भालू का शिकार इसके कड़वे हरे पित्त को हासिल करने के लिए किया जाता है. कई सालों से चीनी चिकित्सकों द्वारा इस पित्त का इस्तेमाल आंखों, जिगर और अन्य अंगों की बीमारियों के इलाज में किया जाता रहा है. भालू के पंजों को भी स्वादिष्ट भोजन के रूप में खाया जाता है. स्टीनमिट्ज का कहना है कि भालुओं के निवासस्थान यानी जंगलों को भी पेड़ काटने वालों से खतरा पहुंच रहा है.

गारशेलिस का कहना है कि थाईलैंड ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने जंगल काटने और शिकार करने के खिलाफ कड़े कानून अपनाए हैं ताकि सन बेअर की संख्या सामान्य बनी रहे. आईयूसीएन का कहना है कि भालुओं की आठ में से छह प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं.

आईयूसीएन के अनुसार जिन अन्य भालुओं की प्रजाति विलुप्ति के कगार पर हैं वे हैं एशियाई काला भालू, भारतीय उपमहाद्वीप का स्लथ भालू, दक्षिण अमेरिका का एंडियन भालू और पोलर भालू. भूरा भालू और अमेरिकी काले भालू को फिलहाल कम खतरा है. लेकिन जल्‍द ही ये भी विलुप्‍त होने के कगार पर पहुंच सकते हैं.

अमेरिकी काले भालुओं की संख्या कनाडा, अमेरिका और मेक्सिको में मिलाकर 90,000 तक है जो कि भालुओं की सभी प्रजातियों की संख्या की तुलना में दोगुनी है. भूरा भालू भी अमेरिका और यूरोप में सुरक्षित है. लेकिन दक्षिण एशिया जैसे पाकिस्तान, भारत और नेपाल आदि में इन भालुओं की संख्या काफी कम है.

गारशेलिस के मुताबिक चीन के संरक्षण प्रयासों के बावजूद 3,000 से भी कम संख्या में बचे ‘जायंट पांडा’ की प्रजाति भी विलुप्ति की कगार पर है. ऑस्ट्रेलिया के कोआला भालु, जो भले ही भालू न होकर शिशु धानी प्राणी है, पर भी विलुप्ति का खतरा मंडरा रहा है.

तापमान की मार महिलाओं पर ज्यादा

विकास एवं पर्यावरण समूहों द्वारा एशिया में तापमान परिवर्तन के प्रभावों पर कराए गए एक संयुक्त अध्ययन में कहा गया है कि तापमान परिवर्तन से पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक प्रभावित होंगी. अप इन स्मोक-एशिया एंड पैसीफिक नामक इस अध्ययन में कहा गया है कि एशिया में समुदाय एवं सामाजिक कार्यों में महिलाओं की भूमिका की अनदेखी की जाती रही है. महिला प्रधान परिवारों को तापमान परिवर्तन की चुनौतियों का अधिक सामना करना पड़ेगा.

अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी ‘एक्शनएड’ के रमन मेहता, जो इस अध्ययन में शामिल थे, ने एक उदाहरण देकर इसकी व्याख्या की है. उन्होंने कहा, उदाहरण के लिए जब मैं इस साल बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में बाढ़ राहत अभियान में शामिल था, मैंने देखा कि वहां प्रतिकूल हालात में पुरुषों की तुलना में महिलाएं अधिक शिकार हुईं.

मेहता ने कहा इसके कई कारण हैं. आर्थिक दबाव के तहत महिलाएं हर कार्य करती हैं. कभी-कभी उनके पतियों द्वारा उन पर यह आरोप लगा कर उन्हें छोड़ दिया जाता है कि वे परपुरुषगामी हैं. ऐसी चुनौतियों से वे अकेले ही लड़ती हैं. मेहता ने कहा कि तापमान परिवर्तन से बाढ़ एवं सूखा की समस्या तो पैदा होगी ही, साथ ही महिलाओं को खाना पकाने के लिए ईंधन का संग्रह करना कठिन हो जाएगा.

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई महिलाओं, खासकर ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को अधिक मुश्किलों का सामना करना होगा. वे पहले से ही ईंधन, चारा एवं पानी की व्यवस्था करने के लिए लम्बी दूरी तय करती हैं. तापमान परिवर्तन से पर्यावरण और वन क्षेत्र को हुए नुकसान से महिलाओं पर भार बढ़ेगा.

मंगलवार, 20 नवंबर 2007

क्‍लाइमेट एक्‍शन का हिस्‍सा बनें

अगले महीने इंडोनेशिया के बाली शहर में संयुक्त राष्‍ट्र संघ जलवायु परिवर्तन पर एक अंतरराष्‍ट्रीय बैठक का आयोजन करने जा रहा है. पिछले काफी समय से यह सिलसिला जारी है. लगातार बैठकें चल रही हैं लेकिन आज तक समस्‍या का कोई सर्वसम्‍मत हल नहीं मिल पाया. नतीजा किसी नए स्‍थान पर एक और बैठक के आयोजन के रूप में सामने आता है.

इस ड्रामे से किसका भला हो रहा है, कहा नहीं जा सकता लेकिन दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस समस्‍या पर महज औपचारिक बैठकों के इस सिलसिले का विरोध कर रहे है. वे ठोस कार्रवाई यानि रीयल क्‍लाइमेट एक्‍शन की मांग कर रहे हैं. वास्‍तव में तो हमें भी इनमें से एक होना चाहिए क्‍योंकि इन लोगों को हमारे समर्थन की जरूरत है.

यह सही समय है कुछ कर दिखाने का. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दुनिया के किस हिस्‍से में हैं. यदि आप बाली में होने वाली बैठक में भाग लेने वाले लोगों को कोई संदेश देना चाहते हैं तो आपके पास अवसर है. पर्यानाद् आपको वह रास्‍ता बता रहा है जो आपको बिना किसी मशक्‍कत के इस लक्ष्‍य तक पहुंचा देगा. बस एक मैसेज भेजिए. बैठक के दौरान बाली में आपका संदेश आकाश में लहराती सैकड़ों पारंपरिक इंडोनेशियाई पतंगों में से एक पर दिख सकता है.

जलवायु परिवर्तन से किसी एक व्‍यक्ति या स्‍थान या देश विशेष का नुकसान नहीं होगा. यह एक वैश्विक समस्‍या है और इसकी चपेट में पूरी मानव प्रजाति आएगी. या यूं कहा जाए कि आ चुकी है तो बेहतर होगा. इसलिए यह हम सभी की लड़ाई है. ग्रीनपीस की पहल पर सोलर जेनरेशन नामक ग्रुप ने इस लड़ाई को लड़ने का बीड़ा उठाया है.

दुनिया भर के लोग बाली बैठक के पहले संदेश भेज कर संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की अगुवाई में भाग लेने वाले प्रतिनिधियों पर दबाव बना रहे हैं कि वे कोई ठोस कार्रवाई करें. इस दबाव को बढ़ाने के लिए एक संदेश आप भी भेज सकते हैं. और कुछ नहीं कर सकें तो क्‍या हुआ, क्‍लाइमेट एक्‍शन की ग्‍लोबल मांग का समर्थन कर उसका हिस्‍सा तो बन ही सकते हैं.

संदेश भेजने के लिए यहां क्लिक करें

सोलर जेनरेशन के बारे में और जानें

सोमवार, 19 नवंबर 2007

लाखों रोजगार लीलेगा जलवायु परिवर्तन

पृथ्वी पर हो रहे जलवायु परिवर्तन के कारण रोजगार के लाखों अवसर खत्म हो सकते हैं. संयुक्त राष्ट्र की जलवायु एवं मौसम विज्ञान एजेंसियों के प्रमुखों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनियाभर में मछली पालन क्षेत्र और पर्यटन उद्योग को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है तथा लाखों की तादाद में लोग बेरोजगार हो सकते हैं.

हालाँकि ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभावों से निपटने के लिए बड़ी संख्या में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होने की भी संभावना व्यक्त की गई है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के कार्यकारी निदेशक अचीम स्टेनर का कहना है कि पर्यावरण प्रौद्योगिकी क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होंगे, ताकि ग्लोबल वार्मिंग के अवसर को कम किया जा सके.

उन्होंने कहा कि अमेरिका में पर्यावरण क्षेत्र में रोजगार वृद्धि हो रही है तथा जर्मनी में 2020 तक पर्यावरण क्षेत्र ऑटो मोबाइल्स क्षेत्र में आगे निकल जाएगा. ग्लोबल वार्मिंग के परिणामस्वरूप समुद्र के जल स्तर में अस्वाभाविक वृद्धि तथा मौसम चक्र में परिवर्तन से निपटने के उपायों की अपरिहार्यता नवीन व्यावसायिक पद्धतियों की खोज का कारण बन रही है. तापमान में वृद्धि से तेज समुद्री तूफान, सूखा, बाढ़ आदि के कारण करोड़ों लोगों को विस्थापन की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है.

विश्व मौसम विज्ञान संगठन के महासचिव मिशेल जेरौड का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग से 70 प्रतिशत व्यवसाय के तौर-तरीकों पर प्रभावी असर पड़ना तय है. उन्होंने कार्बन डाई आक्साइड उत्सर्जन रोकने के उपायों पर तत्काल ध्यान दिए जाने की जरूरत व्यक्त की. जेरौड का कहना है कि विश्वस्तर पर कई बड़े परिवर्तनों पर विचार किया जा रहा है, जो उतना ही असरदार होगा जितनी औद्योगिकी क्रांति हुई थी.

पर्यानाद्: ऐसे न जाने कितने और खतरे हैं जिन्‍हें एक न एक दिन हमें सामना करना ही पड़ेगा. क्‍या हम इनसे निपटने में सक्षम हैं.

रविवार, 18 नवंबर 2007

ओह! तो अब ताजमहल नहीं रहेगा.....

अभी ज्‍यादह दिन पुरानी बात नहीं है जब एक देशव्‍यापी पागलपन के चलते भारतवासियों ने एसएमएस और ई-मेल भेज भेज कर ताजमहल को दुनिया के सात अजूबों में सरे फेहरिस्‍त बनाया था. लेकिन उसके बाद क्‍या? किसी को चिंता है कि ताज महल के साथ अब क्‍या हो रहा है? किसी को चिंता है कि मोहब्‍बत की यह सबसे खूबसूरत यादगार एक ऐसे विनाश के कगार पर खड़ी है, जहां उसके अस्तित्‍व पर गंभीर संकट उठ खड़ा हुआ है? अब कहां है वह कंपनी जिसने करोड़ों हिंदुस्‍तानियों के एसएमएस से अरबों रुपए बनाए?

ताज महल के अस्तित्‍व पर मंडरा रहे खतरे को लेकर दैनिक जागरण में एक समाचार प्रकाशित हुआ है. इस समाचार के मुताबिक उत्तर भारत में गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी यमुना जिसके किनारे बने ताजमहल की खूबसूरती और बढ़ जाती थी, आज इतनी प्रदूषित हो चुकी है कि न सिर्फ आगरा शहर बल्कि दुनिया के सात अजूबों में शुमार ताज को भी इससे खतरा पैदा हो गया है. वास्तुविदों और संरक्षणविदों ने इस नदी की दुर्दशा पर चिंता जताते हुए दावा किया है कि इससे ताज की नींव को नुकसान हो सकता है.

समाचार के मुताबिक मुगल वास्तुकला के जाने माने इतिहासकार प्रो. आर नाथ ने बताया कि यमुना सिमट कर एक नाला बन गई है. इसमें औद्योगिक अवशिष्ट से लेकर हर तरह की गंदगी बहाई जा रही है. इससे न केवल इंसानों के लिए खतरा पैदा हो गया है बल्कि ताजमहल को भी नुकसान हो रहा है. उन्होंने कहा कि यदि यहां की मौलिक पारिस्थितिकी को बहाल नहीं किया गया, तो किसी दिन यह पूरा स्मारक जमीन में समा जाएगा या इसकी मीनारे खतरनाक रूप से झुक जाएंगी. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एस. साहा का कहना है कि यमुना किसी भी लिहाज से नदी नहीं रह गई है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले सप्ताह ही तीन अलग अलग जगहों पर मरी हुई हजारों मछलियां नदी में पानी की सतह पर दिखाई दे रही थीं. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों को तैलीय परत और औद्योगिक व रासायनिक अवशेष नदी में मिले थे. ब्रजमंडल विरासत संरक्षण समिति के सुरेद्र शर्मा का कहना है कि यह ठीक है कि यमुना से हमारी धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई है लेकिन वर्तमान में इसकी हालत को देखते हुए इसे मौत की नदी कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी.

पर्यानाद्: तो साहेबान तैयार हैं मोहब्‍बत के इस स्‍मारक को जमींदोज होते देखने के लिए? अपनी सांस्‍कृतिक और प्राकृतिक विरासत को इस तरह नष्‍ट करने का दुस्‍साहस दुनिया में शायद हम भारतीयों के अलावा और कोई नही कर सकता. क्‍या कहीं कोई है जो इसे रोक सके? आगरावासी सुन रहे हैं क्‍या?

मोटापे से ग्‍लोबल वार्मिंग का क्‍या संबंध?

ऐशो आराम से भरी जिंदगी जीने के लिए मशहूर अमेरिकियों में बढ़ता मोटापा अब एक बड़ी समस्‍या का रूप ले चुका है और अमेरिकी स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञ इससे परेशान हैं. बढ़ते मोटापे की समस्‍या के कारण कई अन्‍य बीमारियां भी फैल रही हैं. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह महानगरीय जीवनशैली को माना जा रहा है, जिसमें रोजमर्रा की आपाधापी तो है लेकिन व्‍यायाम करने और चुस्‍त दुरुस्‍त बने रहने का कोई स्‍थान नहीं है. अमेरिकी समाज अब एक बीमार समाज बनने के खतरे से भी जूझने वाला है.

इससे चिंति‍त होकर अमेरिका में सेंटर्स फॉर डिसीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते मोटापे के खिलाफ एक मुहिम चलाने का फैसला किया है. इस मुहिम के तहत लोगों में पैदल चलने, नियमित व्यायाम करने और मांसाहार के बदले शाकाहार अपनाने की पैरवी की जाएगी. विश्व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन यानि डब्लूएचओ की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग से पर्यावरण में आए बदलावों के चलते विश्व में सन् 2000 में 1.6 लाख लोगों की मौत हो गई थी.

अमेरिकी स्‍वास्‍थ्‍य विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि 10 से 74 साल की उम्र के सभी अमेरिकी रोजाना आधा घंटा पैदल चलना शुरू कर दें तो वे साल भर में करीब साढ़े छह करोड़ टन ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती कर सकते हैं. इतना ही नहीं, इससे हर साल 6.5 करोड़ गैलन पेट्रोल की बचत होगी और अमेरिकियों के शरीर से तीन करोड़ टन चर्बी निकल जाएगी. कहिए कैसा लगा यह जान कर? सच्‍चाई यह है कि मोटापा सारी दुनिया में एक ऐसी बीमारी का रूप ले चुका है जो बिना किसी शोर शराबे के फैलती जा रही है.

आप पूछ सकते हैं कि मोटापे और ग्‍लोबल वार्मिंग के बीच क्‍या संबंध है? संबंध है और काफी सीधा सा है. मोटापा बढ़ने की सबसे बड़ी वजह अनियंत्रित खान-पान के अलावा यह है कि हमने पैदल चलना छोड़ दिया. आधा किमी दूर भी जाना हो तो अपनी टांगों को कष्‍ट देने की जगह वाहन की चाबी घुमाते हैं. नतीजा अनावश्‍यक प्रदूषण के रूप में सामने आ रहा है, दिन रात धुआं उगलते वाहन ग्‍लोबल वार्मिंग की सबसे बड़ी वजहों में से एक है.

भारत को ही लें, कृपया यह न कहें कि यहां तो लाखों लोग भूखे पेट सोते हैं. यह कड़वा सच मैं भी जानता हूं लेकिन मोटापा हमारे यहां भी एक समस्‍या है. इसे देखने के लिए हम अपनी-अपनी कमर का नाप भी ले सकते हैं. सच्‍चाई कहीं से आयात करने की जरूरत नहीं है. बहरहाल मेरा कहना है इससे बचने के लिए कोई बहुत बड़ा हिमालय पर्वत उठाने जैसा काम भी नहीं करना है. बस अपनी जीवन शैली में जरा सा सुधार करना होगा. शुरुआत में इसे कुछ इस तरह किया जा सकता है.

मान लीजिए कि आप घर के पास स्थित बाजार में शॉपिंग के लिए जा रहे हैं, तो अपनी कार या मोटर साइकल स्टार्ट करने के बजाए पैदल जाएं. इससे पर्यावरण प्रदूषण तो कम होगा ही, साथ ही साथ मोटापा भी नियंत्रित रहेगा. पैदल चल कर आप जो थोड़ा बहुत पसीना बहाएंगे वह आपकी अतिरिक्‍त कैलॉरीज़ की मात्रा को कम करने में मददगार होगा. तो कैसा है यह छोटा सा उपाय? सोच कर देखें!! धरती के लिए न सही अपने लिए ही कीजिए.

शनिवार, 17 नवंबर 2007

राजनेता भी अब जान जाएंगे

दुनिया के कई देशों की सरकारों की समिति (आईपीसीसी) राजनीतिज्ञों को चेतावनी देने जा रही है कि जलवायु परिवर्तन का असर अचानक दिख सकता है और यह दूरगामी होने के साथ-साथ अपरिवर्तनीय भी हो सकता है. समिति की इस रिपोर्ट में कहा जाएगा कि लाखों लोग तापमान में होने वाली वृद्धि से प्रभावित होंगे और कोई एक तिहाई प्रजातियाँ इसके कारण नष्ट हो जाएँगीं. यह जानकारी बीबीसी की एक खबर में दी गई है.

खबर के मुताबिक आईपीसीसी की रिपोर्ट को अंतिम रुप दे दिया गया है और संभावना है कि स्पेन में चल रहे सम्मेलन में आज इसे स्वीकार कर लिया जाएगा. यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून आज जारी करने वाले हैं. ख़बरें हैं कि इस रिपोर्ट को अंतिम रुप देने के लिए गर्मागर्म बहसें हुई हैं लेकिन अमेरिका का ज़ोर था कि इसकी भाषा को संतुलित रखा जाए. नोबेल शांति पुरस्कार से पुरस्कृत संस्था आईपीसीसी की यह अंतिम रिपोर्ट उन तीन रिपोर्टों के महत्वपूर्ण बिंदुओं को भी समेटेगी जिन्हें आईपीसीसी पहले ही जारी कर चुकी है.

कड़ी चेतावनी: इस अंतिम रिपोर्ट में जिन बिंदुओं पर ज़ोर रहेगा उनमें एक तो यह है कि जलवायु परिवर्तन का असर साफ़ दिखाई दे रहा है, दूसरा इसके पीछे मानव गतिविधियों से उत्सर्जित होने वाली ग्रीनहाउस गैसों का हाथ है और तीसरा यह कि जलवायु परिवर्तन को तर्कसंगत खर्च करके रोका जा सकता है.

जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के निदेशक हैंस वेरोल्मे ने कहा है कि इस रिपोर्ट के बाद कोई भी राजनीतिज्ञ यह नहीं कह सकेगा कि वह नहीं जानता कि जलवायु परिवर्तन क्या है और इसके बारे में उसे क्या करना है. इससे पहले जो रिपोर्ट प्रकाशित की गई थीं, उसकी तुलना में इस रिपोर्ट की भाषा थोड़ी कड़ी है और इसमें साफ़ कहा गया है कि परिवर्तन आकस्मिक और अपरिवर्तनीय होगा.

वेरोल्मे का कहना है, जलवायु परिवर्तन हो रहा है, इसका असर हमारी ज़िंदगी पर हो रहा है और हमारी अर्थव्यवस्था पर हो रहा है और हमें इससे निपटने के लिए कुछ करना होगा. माना जा रहा है कि आईपीसीसी के शोध और उसकी रिपोर्ट अगले महीने इंडोनेशिया में होने वाले नीति-निर्धारकों के सम्मेलन में काम आने वाली है. इस सम्मेलन के बाद जलवायु परिवर्तन पर नया अंतरराष्ट्रीय समझौता होने की संभावना है.

शुक्रवार, 16 नवंबर 2007

आप भी कुछ कर दिखाएं, ये रहा मौका

अगले माह इंडोनेशिया के बाली शहर में 3 से 14 दिसंबर तक UN Climate Meeting का आयोजन होना है. हमारे देश के राजनेता भी इसमें भाग लेंगे. इन Meetings में आम तौर पर क्‍या होता है, सभी जानते हैं. लेकिन हम यदि चाहें तो इस जड़ता को तोड़ सकते हैं. अपनी आवाज बुलंद करना होगी. यह हमारी पृथ्‍वी को बचाने का प्रश्‍न है राजनीति का मुद्दा नहीं.

अपने आप से ईमानदारी से एक प्रश्‍न पूछिए कि आज तक पर्यावरण को बचाने के लिए क्‍या सचमुच मैने कोई ठोस पहल की ? उत्तर किसी को मत बताइए, स्‍वयं जान लीजिए और कुछ कर दिखाने का संकल्‍प कीजिए. फिलहाल आप क्‍या कर सकते हैं इसका एक छोटा सा नमूना पेश्‍ा है. शीघ्र ही एक विस्‍तृत जानकारी वाला लेख भी प्रस्‍तुत करूंगा.

पुनश्‍च: पिछला लेख 'क्‍या आप भी खरीदते हैं सीएफएल' आप सभी को बेहद पसंद आया, और आपकी प्रतिक्रियाओं से मुझे बेहद संतुष्टि मिली. सभी को मेरा धन्‍यवाद.

देखिए क्या कर सकते हैं आप?



यदि आप भी कुछ करना चाहते हैं, तो इस अभियान में शामिल हों. यदि सक्रिय कार्यकर्ता बनना चाहते हैं तो ग्रीनपीस से जुड़ें. सायबर एक्टिविस्‍ट बनने के लिए यहां क्लिक करें.

गुरुवार, 15 नवंबर 2007

क्‍या आप भी सीएफएल खरीदते हैं?

शायद ऐसा आप के साथ भी हुआ होगा कि बिजली का बल्ब खरीदते समय एक दिन आपको लगा कि बिजली की बचत के लिए सीएफएल खरीदना चाहिए. फिर आप खरीद लेते हैं, पर बहुत जल्दी आपको समझ आता है कि सामान्य बल्ब के मुकाबले सीएफएल खरीदने में शायद कुछ गलती हो गई. बिजली की बचत करने का ख्‍याल आने पर जेब से इतने पैसे ढीले करवा दिए और संतुष्टि भी नहीं मिली. यही नहीं सीएफएल खराब होने पर उसे फेंकने में भी आपको अंदेशा होने लगा कि कहां फेंकें.

यही हालत हर उस व्यक्ति की है, जो कम बिजली खपत के लिए सीएफएल बल्ब की ओर आकर्षित हुआ. दरअसल होता ये है कि वोल्टेज का उतार-चढ़ाव ये बल्ब सहन नहीं कर पाते और इस वजह से जल्दी-जल्दी फ्यूज हो जाते हैं. अब कमरे में उजाला करने के लिए ज्यादा पैसा तो दो ही, साथ ही ज्यादा समय तक नहीं चलने का नुकसान भी उठाओ. तिस पर भी इसके डिस्पोज़ल में परेशानी आती है. जो पढ़े लिखे और समझदार हैं वो जानते हें कि इस तरह के बल्ब को यूँ ही फेंकना कितना घातक हो सकता है.

क्या है इन बल्बों में: इसमें पर्यावरण में पारे का कचरा मिलने लगता है. प्रत्येक सीएफएल बल्ब में न्यूरोटॉक्सिक पदार्थ होता है. इसमें करीब 0.5 मिलीग्राम पारा होता है. यह पहले पर्यावरण में मिलता है, फिर पानी में और यह बेहद जहरीला रसायन बनाता है, जिसे मिथाइल मर्करी कहते हैं. यह मानव के लिए बेहद जहरीला है. धीरे-धीरे यह आपके भोजन में मिलने लगता है.

भारत का बिजली उद्योग हर साल करीब 56 टन पारे का इस्तेमाल करता है. यदि पूरी तरह से सीएफएल या ट्यूब की ओर आते हैं तो हो सकता है कि यह उपयोग और बढ़े. विशेषज्ञों का कहना है कि इसका विकल्प एलईडी हो सकता है, जिनका उपयोग ट्रैफिक सिग्नल में किया जाता है. ये सीएफएल की तुलना में अधिक प्रभावी, सुरक्षित और ज्यादा समय तक चलने वाले हैं. 6 वॉट का एलईडी बल्ब सीएफएल बल्ब की तुलना में 50 हजार घंटे ज्यादा चलता है. इन बल्बों में पारा नहीं होता.

क्या-क्या हो सकता है: जैसे ही ये भोजन के जरिये पेट में प्रवेश करता है, यह आदमी का नर्वस सिस्टम नष्ट कर सकता है. इसके अलावा किडनी और यकृत को भी नुकसान पहुँचा सकता है. स्मृति भ्रंश और जन्मजात रोग भी इससे हो सकते हैं. एक अनुमान के मुताबिक करीब 8 प्रतिशत महिलाओं में इस तरह के रसायन पाए जाते हैं. चूँकि इनके डिस्पोज़ल की कोई व्यवस्था अभी तक देश में नहीं है, इसलिए ये कई लोगों के लिए खतरनाक हो सकता है.

पर्यानाद्: सीएफएल के खतरे से सबसे पहले संपर्क में आते हैं, कचरा बीनने वाले वे गरीब बच्‍चे जिनकी जिंदगी इसी तरह गुजरती है. उनके लिए ना सही अपने जीवन की खातिर ही, उपभोक्‍ता वस्‍तुओं का सोच समझकर इस्‍तेमाल करें.

मंगलवार, 13 नवंबर 2007

एक गंभीर त्रासदी: काला सागर में तेल

इंसान की गतिविधियां पर्यावरण को सबसे गंभीर क्षति पहुंचा रही हैं. पारिस्थितिकी को मानव सभ्‍यता के विकास की कितनी गंभीर कीमत चुकानी पड़ रही है, यह इस दुर्घटना से जाना जा सकता है. प्रकृति के कुपित होने के पीछे भी मानव की गतिविधियां ही जिम्‍मेदार हैं. कोई डेढ़ दशक पहले कुवैत पर इराकी कब्‍जे के बाद हुए खाड़ी युद्ध के दौरान इराक ने समुद्र में कच्‍चा तेल बहा कर पर्यावरण को गंभीर क्षति पहुंचाई थी. अब तूफान में दुर्घटनाग्रस्‍त एक जहाज के डूबने से फिर वही मंजर नजर आ रहे हैं. ऐसी घटनाओं में निरीह वन्‍य या समुद्री जीवों को किस तरह गंभीर हानि होती है, इसे चित्र में देख कर साफ समझा जा सकता है. पढ़ें हृदय को व्‍यथित कर देने वाली ऐसी ही एक रिपोर्ट:

तूफान के चलते यूक्रेन के काला सागर तट पर एक रूसी तेल टैंकर के पलट जाने से उसमें लदा 1300 टन तेल पानी में फैल गया. पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि इससे पारिस्थितिकी को खतरा पैदा हो सकता है. अजोव सागर से 108 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से चली तेज हवाओं के कारण तीन अन्य मालवाहक जहाज भी समुद्र में डूब गए. इनमें से दो जहाजों में गंधक लदा था. इतना ही नहीं, मौसम में आई खराबी के चलते बहुत से अन्य जहाज और 20 नाविक लापता बताए जा रहे हैं.

अधिकारियों ने बताया कि रूस के व्यस्त व्यावसायिक बंदरगाह कावकाज से कुल 40 जल वाहन रवाना हुए थे, जबकि तूफान की वजह से 10 अन्य को बंदरगाह पर ही रोक लिया गया. अधिकारियों ने कहा कि लगभग 300 किलोमीटर पश्चिम में तेज हवाओं ने एक मालवाहक जहाज को डुबो दिया. इस पर 17 नाविक सवार थे जिनमें से दो को बचा लिया गया और 15 अब भी लापता हैं. केर्च स्ट्रेट में डूबे एक अन्य जहाज पर सवार पाँच नाविक भी लापता हैं.

रूसी पर्यावरण समूह एकोजाशचिता के प्रमुख व्लादिमीर स्लिवायक ने कहा कि यह पारिस्थितिकी के लिए गंभीर खतरा है. तेल फैलने से समुद्र में जो प्रदूषण फैला है, उसकी सफाई करने में लंबा वक्त लगेगा और इसके परिणाम एक साल या इससे भी अधिक समय में सामने आएँगे. रूसी सरकार की पर्यावरण निगरानी एजेंसी के प्रमुख ओलेग मितवोल ने कहा कि यह एक गंभीर पर्यावरण खतरा है और इसके लिए काफी काम किए जाने की जरूरत है.

पर्यानाद्: आखिर इन दुर्घटनाओं की जिम्‍मेदारी कौन लेगा ? कौन है इन निरीह पक्षियों के जीवन को होने वाले आघात का दोषी?

सोमवार, 12 नवंबर 2007

दस हजार घोड़ों को मारने का आदेश

कभी-कभी प्रकृति की सुंदर चीजों से प्रकृति का ही नुकसान हो जाता है, जैसा कि आस्ट्रेलिया में घोड़ों से हो रहा है. इसी के मद्देनजर उत्तरी आस्ट्रेलिया के एक राज्य क्वींसलैंड ने दस हजार घोड़ों को गोली मारने का आदेश दिया है. इन घोड़ों को ब्रम्बीज कहा जाता है. इसका कारण उनके द्वारा राष्ट्रीय उद्यान के आवासीय जीव-जंतुओं और वनस्पति का नुकसान होना बताया गया है.

ब्रिस्बेन के एक अखबार कूरियर मेल ने शनिवार को बताया कि राज्य सरकार ने शूटरों को कहा है कि वे मारने के बाद घोड़ों के शवों को छुपा दें. पर्यावरण मंत्री लिंडी नेल्सन कार ने क्वींसलैंड के प्रमुख पीटर बेटी से कहा कि कुछ समूहों ने जरूर इस बात की आलोचना की थी, लेकिन पर्यावरण की सुरक्षा के लिए यह जरूरी था. अखबार के मुताबिक अभी तक चार हजार जंगली घोड़ों को गोली मारी जा चुकी है. अभी दस हजार घोड़ों को मारे जाने की योजना है.

शूटरों को इन ब्रम्बीज को मारने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है. क्वींसलैंड के सतत विकास मंत्री एंड्रयू मैकनामरा कहते हैं कि मानवीय पक्ष को ध्यान में रखकर घोड़ों को सीने में गोली मारी जाती है ताकि उन्हें दर्द कम हो. हालांकि मानवाधिकार कार्यकर्ता इसे एक बेहद जंगली और अमानवीय कृत्य करार देते हैं.

पर्यानाद्: सवाल उठता है कि क्‍या यह अमानवीय कदम इस समस्‍या का सही समाधान है? क्‍या घोड़ों को गोली मारने से पहले क्‍वींसलैंड की सरकार ने इस बात की जांच नहीं कराई कि आखिर क्‍यों ऐसे हालात निर्मित हो गए? पर्यावरण की रक्षा के नाम पर जीव हत्‍या को कैसे जायज ठहराया जा सकता है? हैरत की बात है कि ऑस्‍ट्रेलिया जैसे विकसित और उच्‍च साक्षरता वाले देश में भी ऐसी बर्बर कार्रवाई का कोई विरोध नहीं किया गया और इतने बड़े पैमाने पर घोड़ों की हत्‍या का काम जारी है.

धरती का बढ़ता तापमान घटाएंगे

ग्‍लोबल वार्मिंग पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है. एक नए सर्वे से यह जानकारी मिलती है कि महासागरों में पानी की सतह पर तैरने वाले छोटे-छोटे प्लवक जीव प्लैंकटन कार्बन डाईआक्साइड की भारी मात्रा सोख कर विश्व के बढ़ते तापमान (ग्लोबल वार्मिग) को कम कर सकते हैं.

जर्मनी में काइल स्थित लाइबनित्ज इंस्टीट्यूट आफ मैरीन साइंसेज के जीव विज्ञानी उल्फ रिबेसेल ने शोधों का हवाला देते हुए कहा है कि ये जीव लगभग 39 प्रतिशत अधिक कार्बन डाईआक्साइड का अवशोषण कर सकते हैं.

हालांकि शोध में यह भी कहा गया है कि इन की मौत के बाद उनकी कोशिकाओं में मौजूद कार्बन डाईआक्साइड महासागरीय खाद्य सामग्री को प्रभावित कर सकती है. शोध से यह भी पता चला है कि जैव ईधन के इस्तेमाल से पैदा हुई आधे से अधिक कार्बन डाईआक्साइड को सोख कर भविष्य में बढ़ने वाले तापमान को कम किया जा सकता है.

वैज्ञानिक पत्रिका नेचर में प्रकाशित इस शोध में हालांकि यह भी कहा गया है कि इन जीवों की मौत के बाद उनकी कोशिकाओं के विघटन के लिए अधिक आक्सीजन की जरूरत पड़ेगी. इससे अन्य जीवों के लिए आक्सीजन की कमी हो जाएगी. इसमें यह भी कहा गया है कि अधिक कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा वाले ऐसे जीवों को खाने वाले अन्य जीवों की वृद्धि दर और उत्पादन क्षमता प्रभावित होगी.
चित्र: wikipedia.org से साभार

प्‍लैंकटन के बारे में और अधिक जानकारी के लिए यहां पढ़ें.

कार का धुआं भी ला सकता है हार्ट अटैक

ज्यादातर लोग मानते हैं कि वायु प्रदूषण के कारण सांस लेने में तकलीफ होती है और फेफड़े क्षतिग्रस्त हो सकते हैं. एक ताजा अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि वायु प्रदूषण हृदय को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है. लंदन के डेली मेल अखबार में रविवार को प्रकाशित खबर के मुताबिक यूरोप के अनुसंधानकर्ताओं ने एक अध्ययन में पाया कि ईधन के धुएं की दूषित वायु रक्त प्रवाह में बाधा पहुंचाती है. इससे हृदयाघात (हार्ट अटैक) की आशंका बढ़ जाती है.

एडिनबरा विश्वविद्यालय के अनुसंधान दल के प्रमुख डाक्टर एंड्रयू लकिंग के हवाले से डेली मेल में कहा गया है कि अध्ययन से पता चलता है कि थोड़े समय के लिए भी डीजल जनित धुएं के संपर्क में आने पर उस व्यक्ति के रक्त में थक्के जमने लगते हैं. इससे रक्त वाहिनियों में अवरोध आ सकता है जिसके फलस्वरूप हृदयाघात हो सकता है. डाक्टर लकिंग और उनके ब्रिटिश तथा स्वीडिश सहयोगियों ने लोगों के एक समूह पर डीजल जनित धुएं के असर का अध्ययन करने के बाद यह निष्कर्ष निकाला है.

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि व्यस्ततम इलाकों से दूर जाकर व्यायाम करने से हृदयाघात का खतरा घटाया जा सकता है क्योंकि ऐसे इलाकों में वायु प्रदूषण की आशंका कम होती है. ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन की वित्तीय सहायता से किए गए इस अध्ययन की रिपोर्ट ब्रिटेन के एक मेडिकल जर्नल में प्रकाशित हुई है.

पिछली सदी में 39 हजार बाघ विलुप्त

पूरी दुनिया में बाघों के अस्तित्व पर संकट मंडराया हुआ है. पिछली सदी में इंडोनेशिया में बाघ की तीन उप प्रजातियों का पूरी तरह सफाया हो गया है. भारतीय उपमहाद्वीप में भी 20वीं सदी में 39 हजार बाघ विलुप्त हो गए. वर्तमान सदी में भी यह संकट लगातार बना हुआ है और देश का राष्ट्रीय पशु अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है. एक अनुमान के मुताबिक पिछली सदी में भारतीय उपमहाद्वीप से 39 हजार बाघ गायब हो गए.

बाघों की संख्या में निरंतर हो रहे ह्रास की वजह से ही 1970 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय पशु के शिकार पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था, लेकिन इसके बावजूद शिकारी अपने इरादों में लगातार कामयाब हो रहे हैं. हाल ही में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा कराई गई गणना से खुलासा हुआ है कि मात्र पिछले छह साल में ही भारत में बाघों की 50 फीसदी संख्या कम हो चुकी है.

बाघों के जीवन पर आसन्न खतरे के चलते ही 1972 में पहली बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम पास कराया था. इसके बाद बाघ को संरक्षित प्रजातियों की सूची में डाल दिया गया. वर्ष 1972 में ही पहली बार बाघों की आधिकारिक गणना कराई गई थी जिसमें इनकी संख्या मात्र 1827 निकली. वर्ष 2001 में बाघों की संख्या में इजाफा नजर आया और उनकी आबादी 3642 बताई गई लेकिन छह साल के बाद जब इस वर्ष इनकी गणना हुई तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने 2007 की गणना में इनकी संख्या सिर्फ 1300 से 1500 के बीच बताई है. हाल ही की गणना से पता चला है कि अकेले मध्य प्रदेश में 65 प्रतिशत बाघ धरती से विलुप्त हो गए हैं. छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और राजस्थान में क्रमश: 100-100 से भी कम बाघ बचे हैं.

वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि बाघ की गिनती का काम उनके पंजों के निशान के आधार पर किया जाता है, लेकिन कई बार बाघ एक ही जगह से बार-बार गुजरते हैं जिससे उनके पंजों की संख्या बढ़ जाती है. इस कारण हो सकता है कि इनकी संख्या वर्तमान आंकड़े से और भी कम हो.