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Saturday, December 8, 2007

आप भी आएं पर्यानाद्. पर, स्‍वागत है

बाल किशन जी ने कहा है कि मैं पर्यावरण संरक्षण के उपाय भी बताऊं. घुघूती बासूती ने सबके मिले जुले विचारों वाली पोस्‍ट रखने का सुझाव दिया है. मुझे कोई एतराज नहीं. पर्यानाद् पर आने वाले सभी साथियों से मैं विनम्र अनुरोध करूंगा कि प्रकृति, पर्यावरण, वन्‍य जीव संरक्षण, ग्‍लोबल वार्मिंग या इससे जुड़े किसी भी विषय पर यदि कोई विचार आपके मन में हैं, कोई जानकारी आप बांटना चाहते हैं, तो बेझिझक लाइए आपका स्‍वागत है.

अपने विचार या जानकारी जो भी चाहें, मुझे paryanaad@gmail.com पर भेजें, पर्यानाद् पर आपके नाम से आ जाएगा. कोई बंदिश नहीं, कोई संपादन नहीं (मेरा प्रोफेशन होने के बावजूद उसे अलग रखूंगा, जब तक कि ऐसा करना बेहतरी के लिए जरूरी ना हो, या कोई विवशता ना बन जाए) बस इतनी अपेक्षा रहेगी कि जानकारी सही हो और विचार मौलिक हों.

इधर मेरे मन में भी एक विचार कई दिनों से चल रहा है लेकिन उसे अभी सबके साथ शेयर नहीं करूंगा क्‍योंकि उस सिलसिले को आरंभ करने के लिए यहां कुछ तकनीकी समायोजन करने होंगे. जैसे ही कर लूंगा आपको भी बता दूंगा.

वैसे शुरुआत मीनाक्षी जी ने कर ही दी है. उन्‍होंने एक बहुत ही सुंदर लिंक दिया, मैने देखा तो बस मोहित हो गया. आप सब भी देखें, मुझे यकीन है कि पसंद करेंगे.

बाल किशन जी हालांकि मैं मानता हूं कि कोई जानकारी देने के लिए मैं सही व्‍यक्ति नहीं हूं. अपने आस पास नजरें दौड़ाएं, बहुत कुछ ऐसा दिख जाए‍गा, जिसे रोकने वाला कोई नहीं. आज से यह काम आप कीजिए.

बहरहाल एक छोटा सा तरीका बताता हूं. याद करें आपने अंतिम बार किसी ऐसे पौधे को कब सींचा था, जो आपने नहीं लगाया? आए दिन हम अखबारों में वृक्षारोपण समारोहों के आयोजन के बारे में पढ़ते हैं. क्‍या आप जानते हैं कि 80 प्रतिशत मामलों में ऐसे पौधे कभी वृक्ष नहीं बन पाते क्‍योंकि उनकी देखभाल करने वाला आमतौर पर कोई नहीं होता. ऐसे किसी आयोजन के बाद कुछ पेड़ों को जीवित रखने का संकल्‍प ले लीजिए. (पर उपदेश कुशल बहुतेरे)

एक भूल सुधार: 26 नवंबर को यहां जो पोस्‍ट मैने दी थी, उसके लिए वीडियो का लिंक सागरचंद नाहर जी ने उपलब्‍ध कराया था. नाहर जी का शुक्रिया. उस वक्त मैं उनका उल्‍लेख करना भूल गया था. भूल के लिए माफ करें नाहर जी.

तो आज मीनाक्षी जी के सौजन्‍य से देखें कुछ मन को झंकृत कर देने वाले दृश्‍य, साथ में थोड़ा सा कुछ पढ़ना भी होगा और थोड़ा सा कुछ सुनना भी होगा. नीचे की कड़ी को क्लिक करें, आप पहुचं जाएंगे. हां यदि समय लगे तो जरा धैर्य रखें. यकीन जानें आपको निराशा नहीं होगी. ये रही कड़ी....

Earth Teach Me to Remember....

पुनश्‍च: घुघूती बासूती, उम्‍मीद करता हूं कि आप प्रसन्‍न होंगी लेकिन अब आप भी अपने अनुभव, विचार, जानकारी यहां आकर हमारे साथ बांटें.

4 comments :

मीनाक्षी said...

बहुत अच्छा काम कर रहे हैं... सच है कि हम अपने आसपास ही बहुत कुछ कर सकते हैं. स्कूल में आजमाया हुआ उपाय है कि बच्चों को अपनी जेबखर्ची से ताज़ा पौधे के गमले के लिए एक या दो रियाल निकालना बहुत अच्छा लगता था..प्रकृति से प्रेम होते ही बच्चे उसे बचाने का प्रयास करना सीख जाते हैं.

बाल किशन said...

धन्यवाद. मैं अपने स्तर पर छोटे-छोटे ही सही पर ईमानदार प्रयास आरंभ करूँगा.

Sanjeet Tripathi said...

साधुवाद, बहुत बढ़िया!!

हममें से हर अपने स्तर पर ही छोटी छोटी कोशिश करें तो कुछ तो बदलाव आएगा!!

पूनम मिश्रा said...

अपने स्तर पर छोटे ही सही पर हमारे द्वारा किये गए हर कार्य से पर्यावरण सुरक्षा में योगदान होगा. यहाँ पर सुझाव बाँटने से हमें भी क्या किया जा सकता है इसकी प्रेरणा मिलेगी.बधाई

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