बाघों की घटती संख्या पर चिंता
थाईलैंड में हाल ही में तेरह एशियाई देशों की एक बैठक में बाघों की लगातार घटती संख्या पर बेहद दुख जताया गया है। बैठक के दौरान संकल्प लिया कि 2022 तक बाघों की संख्या दुगुनी हो जानी चाहिए।
सोमवार, 1 फ़रवरी 2010
अब तो अपने बाघों को बचाएं
पिछली शताब्दी के आरंभ में बाघों की आबादी करीब 40 हजार थी। अब उनमें से केवल 1411 भारत में बाकी बचे हैं। पिछले वर्ष भारत में 86 बाघों की जान गई। भारत में करीब 37 बाघ अभयारण्य हैं लेकिन इनमें से करीब 17 अब अपनी बाघों की आबादी को पूरी तरह खो चुकी हैं या खोने की कगार पर हैं।
शुक्रवार, 5 जून 2009
उन्होंने पर्यावरण को बचा लिया
उन्हें यह भ्रम है कि पेड़ लगाए जाते हैं और मैं कोई पर्यावरण बचाओ आंदोलन चलाने वाला व्यक्ति हूं। अक्सर कहा जाता है "वृक्षारोपण कार्यक्रम" ....
मुझे लगता है कि यह पौधरोपण कार्यक्रम है। पौधा लगाया जाता है न कि पेड़।
खैर... मैंने विनम्रता से मना कर दिया कि मैं उनके "पेड़ लगाने" के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकता क्योंकि वे गांरटी नहीं दे पाए कि लगाए गए पौधों की रक्षा की जाएगी और वे पेड़ बनेंगे। मैं अपने लगाए पौधों को पेड़ बनाने के लिए उनकी रक्षा भी करता हूं।
मैंने उनसे पूछा कि वो इस बारे में क्या कर रहे हैं? तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। उल्टे उन्होंने एक सवाल पूछा, मेरे अकेले के करने से क्या होगा?
पांच जून एक भद्दा मजाक बन चुका है। 37 साल से इस दिन कितने झूठ बोले जाते हैं दिखावे किए जाते हैं लेकिन सच्चाई बहुत कड़वी है। मैं कुछ भयावह से आंकड़े पेश कर सकता हूं पर कोई फायदा नहीं है। सब जानते हैं।
उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं क्या कर रहा हूं ... बताने की बाध्यता नहीं थी लेकिन मैंने उन्हें बताया कि बस इतना कर रहा हूं ...
और यह सब मैं किसी पर्यावरण आंदोलन को चलाने के लिए नहीं करता बल्िक इसलिए कर रहा हूं क्यों कि यह मेरी जिम्मेदारी है। इतना तो करना ही पड़ेगा... पर्यावरण के लिए नहीं अपनी खातिर।
उन्होंने आज पेड़ लगाए हैं, कल अखबार में उनका फोटो छपेगा।
यानि पर्यावरण को उन्होंने बचा लिया।
मुझे लगता है कि यह पौधरोपण कार्यक्रम है। पौधा लगाया जाता है न कि पेड़।
खैर... मैंने विनम्रता से मना कर दिया कि मैं उनके "पेड़ लगाने" के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकता क्योंकि वे गांरटी नहीं दे पाए कि लगाए गए पौधों की रक्षा की जाएगी और वे पेड़ बनेंगे। मैं अपने लगाए पौधों को पेड़ बनाने के लिए उनकी रक्षा भी करता हूं।
मैंने उनसे पूछा कि वो इस बारे में क्या कर रहे हैं? तो उनके पास कोई जवाब नहीं था। उल्टे उन्होंने एक सवाल पूछा, मेरे अकेले के करने से क्या होगा?
पांच जून एक भद्दा मजाक बन चुका है। 37 साल से इस दिन कितने झूठ बोले जाते हैं दिखावे किए जाते हैं लेकिन सच्चाई बहुत कड़वी है। मैं कुछ भयावह से आंकड़े पेश कर सकता हूं पर कोई फायदा नहीं है। सब जानते हैं।
उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं क्या कर रहा हूं ... बताने की बाध्यता नहीं थी लेकिन मैंने उन्हें बताया कि बस इतना कर रहा हूं ...
- पॉलीथिन बैग्स का इस्तेमाल आमतौर पर नहीं करता।
- ब्रश और शेव करते वक्त वाश बेसिन का नल चालू नहीं रखता।
- कमरे से बाहर जाते समय बिजली का लट्टू और पंखे को चालू नहीं छोड़ता।
- अपने दोपहिया वाहन की नियमित जांच करवा कर उसे प्रदूषणमुक्त रखने का प्रयास करता हूं।
- आज तक जितने पौधे लगाए उन्हें जीवित रखने की जिम्मेदारी भी निभाता हूं।
और यह सब मैं किसी पर्यावरण आंदोलन को चलाने के लिए नहीं करता बल्िक इसलिए कर रहा हूं क्यों कि यह मेरी जिम्मेदारी है। इतना तो करना ही पड़ेगा... पर्यावरण के लिए नहीं अपनी खातिर।
उन्होंने आज पेड़ लगाए हैं, कल अखबार में उनका फोटो छपेगा।
यानि पर्यावरण को उन्होंने बचा लिया।
शनिवार, 20 सितंबर 2008
प्रवासी जल पक्षियों की प्रजातियां खत्म होने के करीब
मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ और उनके बेहिसाब दोहन का सिलसिला जारी है। बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के रूप में इसके नतीजे हम भुगत भी रहे हैं। इंसानों की गलतियों का खामियाजा अब पशु-पक्षियों को भी भुगतना पड़ रहा है।अफ्रीका और यूरेशिया में भ्रमण करने वाले प्रवासी जल पक्षियों की जनसंख्या में 40 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्लेमिंगो, क्रेन और राजहंस सरीखे पक्षियों की जनसंख्या में कमी का मुख्य कारण इनके आवास का दोहन बताया गया है।
शुक्रवार, 12 सितंबर 2008
एक टी-शर्ट की धुलाई और पर्यावरण
पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाले तत्वो में ग्रीन हाउस गैसों का स्थान सबसे अव्वल है। आम घरों में इस्तेमाल होने वाली वाशिंग मशीन और रेफ्रिजरेटर भी इसके उत्सर्जन में अपना पूरा योगदान देते हैं। लेकिन इन वस्तुओं पर हमारी निर्भरता इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि इनके बिना जीवन की कोई कल्पना भी नहीं करना चाहता. पर्यावरण की रक्षा करने और ग्रीन हाउस गैसों के उत्पादन में कटौती करने की वकालत करने वाले लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ऐसी जीवन शैली विकसित की जानी चाहिए जिससे पर्यावरण को हानि कम से कम पहुंचे।
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