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शुक्रवार, 9 नवंबर 2007

बाघों की घटती जनसंख्‍या

भारत में बाघों की तेजी से घटती जनसंख्या को देखते हुए सरकार कई उपाय करने के प्रयास कर रही है. बहुचर्चित प्रॉजेक्‍ट टाइगर ऐसा ही एक प्रयास है. हाल ही में एक अध्ययन में पाया गया था कि देश में बाघों की संख्या घटकर 1500 से भी कम रह गई है. इसके बाद सरकार ने बाघ संरक्षण बल के गठन की घोषणा कर दी. इस बल में पूर्व सैनिकों को भर्ती कर अभयारण्‍यों की चौकसी का काम सौंपा जाएगा.

भारत में वर्ष 2002 में हुए अंतिम बड़े सर्वेक्षण में बाघों की संख्या 3642 पाई गई थी. वन्यजीव संरक्षण में जुटे कार्यकर्ताओं ने बाघों की संख्या में लगातार हो रही कमी के लिए शिकार और तेजी से फैलते नगरों को जिम्मेदार बताया है. और वो कहते हैं कि प्रशासन को इस संबंध में और कदम उठाने चाहिए.

भारतीय जंगलों में बाघों के संरक्षण के लिए पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने आपात उपायों की सूची जारी की है. इसी के तहत बाघ संरक्षण बल के गठन की घोषणा की गई है. अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस बल में कितने पूर्व सैनिकों की भर्ती की जाएगी.

दो-तिहाई की गिरावट: सरकार ने मई में एक गणना कराई थी, जिसमें पता चला था कि देश के जंगलों में अनुमान से कहीं कम बाघ रह रहे हैं. वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के इस अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि कुछ राज्यों से बाघों की संख्या में पाँच वर्षों में लगभग दो-तिहाई तक की गिरावट आई है. अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट दिसंबर में आएगी.

वन्यजीव विशेषज्ञों ने शिकारियों और बाघ की खाल के अवैध व्यापार को रोकने में असफलता के लिए भारत सरकार की आलोचना की है. बाघों का शिकार उनके शरीर के अंगों को हासिल करने के लिए किया जाता है. बाघ की खाल का वस्त्रों के लिए और हड्डियों की दवाएँ बनाने में इस्तेमाल होता है. चीन में बाघ की खाल की कीमत 12500 डॉलर यानी लगभग पाँच लाख रुपए तक मिल जाती हैं. रिपोर्टो के अनुसार एक शताब्दी पहले भारत में लगभग 40 हजार बाघ थे.
(आधारित) (रिपोर्ट नई‍दुनिया) स्रोत: वेबदुनिया से साभार
चित्र: विकिपीडिया

पृथ्‍वी के साथ अपनी सेहत का भी ध्यान रखें

दीपावली आ गई तो जाहिर सी बात है कि इस वर्ष भी आतिशबाजी होगी, खूब पटाके चलेंगे और चंद घंटों में करोड़ों या कहूं कि अरबों रुपए स्‍वाहा हो जाएंगे. हर साल यही होता है लेकिन क्‍या कभी कोई इस बारे में सोचता है कि इस एक दिन की आतिशबाजी से पर्यावरण को कितना नुकसान होता है ? हमारे देश में आज भी लाखों लोग दो वक्‍त का भरपेट भोजन पाने से वंचित हैं और विडंबना यह है कि हमारे ही देश में करोड़ों बल्कि अरबों रुपए बेवजह फूंक दिए जाते हैं. दीपावली मनाने के इससे बेहतर तरीके हो सकते हैं, बशर्ते मन में इच्‍छा हो. इस बार जरा इन बातों पर भी गौर कर के देखें.

देश भर के अस्पतालों में पिछले कुछ वर्षों से दीवाली के बाद दमा, नाक की एलर्जी, ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों की संख्या कम से कम दोगुनी बढ़ जाती है. जलने, आँख को गंभीर क्षति पहुँचने और कान का पर्दा फटने जैसे हादसे भी बहुत होते हैं. इस स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य और पर्यावरण विशेषज्ञों ने हमेशा की तरह आम जनता को पटाखे नहीं छोड़ने अथवा कम से कम और धीमी आवाज वाले पटाखे छोड़ाने की सलाह दी है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिल्ली में पटाखों के कारण दीवाली के बाद वायु प्रदूषण 6 से 10 गुना और आवाज का स्तर 15 डेसीबल बढ़ जाता है. इसके कारण श्रवण क्षमता प्रभावित होने, कान के पर्दे फटने, दिल के दौरे पड़ने, सिर दर्द, अनिद्रा और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं. पटाखों के कारण वातावरण में हानिकारक गैसों तथा निलंबित कणों का स्तर बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण फेफड़े, गले तथा नाक संबंधी गंभीर समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं. दमा के मरीजों के लिए दीवाली के आसपास का समय न केवल पटाखों के कारण, बल्कि अन्य कारणों से भी मुसीबत भरा होता है.

तेज आवाज करने वाले पटाखे सामान्य पटाखों से अधिक खतरनाक हैं क्योंकि इनसे कान के पर्दे फटने, रक्तचाप बढ़ने और दिल के दौरे पड़ने की घटनाएँ बढ़ जाती हैं. बच्चों, गर्भवती महिलाओं, दिल तथा साँस के मरीजों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पिछले वर्ष पटाखों की जाँच से पाया कि तेज आवाज वाले करीब 90 प्रश पटाखे आवाज के मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं. बोर्ड ने ऐसे पटाखों पर पाबंदी लगाने का सुझाव दिया है. आतिशबाजी और तेज पटाखों के कारण आँखों को भी गंभीर क्षति पहुँचने का खतरा बहुत अधिक होता है. पटाखों से निकलने वाली चिंगारियों एवं आग से आँखों की कार्निया जल सकती है, जिससे स्थायी तौर पर अंधापन आ सकता है.

तो क्‍या आप नहीं चाहते कि ऐसा कोई हादसा नहीं हो ? छोटी मोटी फुलझड़ी या रोशनी करने वाली आतिशबाजी तक तो ठीक है लेकिन कृपया अपने आसपास रहने वाले मरीजों, कमजोर दिल वाले लोगों और सबसे बढ़ कर खुद अपने स्‍वास्‍थ्‍य और सुरक्षा के लिए अनावश्‍यक आतिशबाजी और धन की बर्बादी को इस बार रोकें. दीपावली मनाने के इससे बेहतर कई तरीके हो सकते हैं.

अपने नजदीक के किसी अनाथालय में जाकर छोटे छोटे बच्‍चों को मिठाई खिलाएं. हो सके तो उन्‍हें वस्‍त्र आदि भेंट करें. यकीन मानिए उनके चेहरों पर आने वाली खुशी की झलक और उल्‍लास के शोर से आपको जो आनंद मिलेगा वह किसी भी आतिशबाजी के शोर से नहीं मिल सकता.

दीपावली आप सभी को मंगलमय हो.

मंगलवार, 6 नवंबर 2007

ऑनलाइन अभियान में भाग लें

विश्व वन्‍यजीव कोष भारत में शेरों को बचाने के लिए एक ऑनलाइन हस्‍ताक्षर अभियान चला रहा है. सिर्फ अपना नैतिक समर्थन देने के लिए आपको केवल 2 मिनट का समय खर्च करना होगा. अपना अमूल्‍य समर्थन देने के लिए नीचे दी गई कड़ी पर क्लिक करें,बेहद आसान है. यह जालस्‍थल पूर्णत: सुरक्षित है.


विश्व वन्‍यजीव कोष का हस्‍ताक्षर अभियान- हाय, आय एम द इंडियन टायगर एंड आय नीड योर अर्जेंट सपोर्ट

जलवायु परि‍वर्तन पर डॉक्‍यूमेंट्री पुरस्‍कृत

भारत में जलवायु परिवर्तन से जुड़े कई पहलुओं पर केंद्रित बीबीसी हिंदी सेवा की एक रेडियो डॉक्युमेंट्री को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है. एशिया पैसिफ़िक ब्रॉडकास्टिंग यूनियन की ओर से प्रति वर्ष दुनिया भर में ब्रॉडकास्टिंग के क्षेत्र में हो रहे सर्वश्रेष्ठ कामों को पुरस्कृत किया जाता है. इसी क्रम में इसबार बीबीसी हिंदी सेवा की रेडियो डॉक्युमेंट्री, 'चढ़ता पारा, बढ़ता संकट' को रेडियो डॉक्युमेंट्री वर्ग का पुरस्कार दिया गया है.

पर्यानाद के पाठकों को बीबीसी के इस प्रयास से अवगत कराने के लिए मैं सीधा लिंक दे रहा हूं. इस समाचार को पढ़ने के लिए सीधे बीबीसी हिंदी जालस्‍थल के उस पन्ने पर पहुंचिए, जहां यह जानकारी उपलब्‍ध है.

बीबीसी ऑनलाइन के वि‍शेष पन्ने की कड़ी बाजू की पट्टिका में उपलब्‍ध करा दी है. इस पेज पर जलवायु परिवर्तन से संबंधित बेहद उपयोगी और ज्ञानवर्द्धक जानकारी उपलब्‍ध है.

शिवकांत जी, मुकेश शर्मा जी और स्‍वाति चौहान को बहुत बहुत बधाई.

विस्‍तार से पूरा समाचार यहां पढ़ें

रविवार, 4 नवंबर 2007

जंगल के राजा की दुर्दशा

दिल दुखा देने वाला यह समाचार पढ़ना शायद किसी को अच्‍छा नहीं लगेगा.
लेकिन इस कटु सच्‍चाई को नकारा नहीं जा सकता कि अब पृथ्‍वी पर इस शाही जीव का अस्तित्‍व सचमुच खतरे में है. हमें क्‍या करना चाहिए ? शायद शेर और बाघों पर कहानियां लिखनी चाहिए, उनकी विविध तस्‍वीरें जमा कर लेनी चाहिए क्‍योंकि जल्‍द ही वे पूरी तरह लुपत हो जाएंगे. फिर हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए इन तस्‍वीरों की जरूरत पढ़ेगी कि ''देखो बच्‍चो, यह था जंगल का राजा, जो कभी इस ग्रह पर रहता था. फिर हमने इसका शिकार कर लिया और अब यह समाप्‍त हो चुका है''. कल्‍पना कीजिए कि एक दिन अंतिम बाघ का शिकार होगा और पृथ्‍वी के जंगलों से वहां के राजा का अस्तित्‍व समाप्‍त हो जाएगा. कैसे होंगे बिना राजा के जंगल..... ?

दुनिया भर से बाघों की तीन प्रजातियां लुप्‍त

दुनियाभर में जंगल के राजा कहे जाने वाले बाघों और शेरों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. गुजरात के गिर अभयारण्य में जहाँ हाल ही में ग्रामीणों द्वारा बिजली के करंट से की गई पाँच शेरों की हत्या ने वन्यजीव प्रेमियों को सकते में डाल दिया है, वहीं इंडोनेशिया में विपरीत परिस्थितियों के चलते पिछली सदी में बाघ की तीन उप प्रजातियों का पूरी तरह से नामोनिशान मिट गया है.

विश्व वन्यजीव कोष (WWF) शेरों और बाघों की निरंतर घट रही संख्या से परेशान हैं और उसने प्रकृति के इन जाँबाज प्राणियों की रक्षा के लिए अधिक से अधिक कदम उठाने का आह्वान किया है. WWF की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक पिछली सदी बाघों के लिए खतरनाक रही और वही परिस्थितियाँ अब भी जारी है. संगठन का कहना है कि पिछली सदी में इंडोनेशिया में बाघों की बाली कैस्पेन और जावा तीन उप प्रजातियाँ पूरी तरह विलुप्त हो गईं. WWF के अनुसार वन्यजीवों को खतरे के मामले में लगभग पूरी ही दुनिया में हालात एक जैसे हैं और दक्षिणी चीनी बाघ प्रजाति भी तेजी से विलुप्त होने की ओर बढ़ रही है.

संगठन का कहना है कि सरकारी और गैर सरकारी संरक्षण प्रयासों के बावजूद विपरीत परिस्थितियाँ निरीह प्राणियों की जान लेने में लगी हैं. बाघों और शेरों की जान कई बार अभयारण्यों में बाढ़ का पानी भर जाने से चली जाती है तो कई बार सुरक्षित स्थानों की ओर भागने के प्रयास में वे या तो वाहनों के पहियों से कुचले जाते हैं या फिर घात लगाकर बैठे शिकारियों का निशाना बन जाते हैं.

गुजरात के गिर अभयारण्य में हाल के वर्षों में 33 शेरों की जान जा चुकी है. इनमें से कुछ प्राकृतिक कारणों से मारे गए, तो कुछ को ग्रामीणों या शिकारियों ने मार डाला. हाल ही में एक ग्रामीण परिवार ने गिर अभयारण्य के पाँच शेरों को बिजली के करंट से मार डाला. इस परिवार ने अपने खेतों के इर्द-गिर्द लगाए गए तारों में बिजली का करंट छोड़ रखा था. अक्टूबर के महीने में असम के ओरांग नेशनल पार्क में ग्रामीणों ने जहर देकर दो बाघों को मार डाला. भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (WTI) के अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीणों ने वन्यजीवों द्वारा अपने पशुओं पर होने वाले हमलों का बदला लेने के लिए संभवत: ऐसा किया.

पार्क के संरक्षित क्षेत्र के नजदीक रहने वाले ग्रामीणों ने एक भैंस के शव पर जहर छिड़ककर कर उसे जंगल में फेंक दिया. भैंस का माँस खाकर दो बाघों की मौत हो गई. एक बाघ का शव दो अक्टूबर को भाबापुर गाँव के नजदीक पार्क के क्षेत्र में मिला, जबकि दूसरे बाघ का शव इसी क्षेत्र में चार अक्टूबर को मिला. बाघों और शेरों की संख्या में निरंतर आ रही गिरावट विश्वभर के वन्यजीव प्रेमियों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है.

मेरा सवाल: क्‍या कुछ समय बाद बाघ और शेर सिर्फ तस्‍वीरों में ही देखने को मिलेंगे?