सोमवार, ३१ दिसम्बर २००७

सन् 1880 के बाद पांचवां सबसे गर्म साल

ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ दुनियाभर के तमाम प्रभावशाली नेताओं की मुहिम के बावजूद वर्ष 2007 पिछले 127 वर्षो में पांचवां सबसे गर्म साल माना जा रहा है. पर्यावरण संबंधी अमेरिकी संस्था नेशनल ओसियानिक एंड एटमोस्फियरिक एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार इस वर्ष समुद्र और स्थल सहित पृथ्वी का औसत तापमान 14.44 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है. इस तरह 2007 को 1880 के बाद सर्वाधिक गर्म साल कहा जा सकता है. वैसे, इस संबंध में अंतिम आंकड़े जनवरी में जारी हो सकेंगे.

सोमवार को विज्ञान पत्रिका 'साइंस डेली' में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस साल पूर्वी यूरोप से मध्य एशिया के क्षेत्र सबसे ज्यादा गर्म रहे. शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक 20वीं शताब्दी में पृथ्वी की सतह के तापमान में 0.6 से 0.7 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है. इतना ही नहीं पिछले तीस साल में तापमान में हुई वृद्धि 1900 के बाद से बढ़ी गर्मी की तुलना में तीन गुना ज्यादा दर्ज की गई.

रिपोर्ट के मुताबिक 1997 से 2007 का दशक सबसे गर्म दशक रहा. अब तक के सबसे गर्म आठ सालों में सात 2001 के बाद, जबकि 10 सबसे गर्म साल 1997 के बाद रिकार्ड किए गए. इसका तात्‍पर्य यह भी है कि पिछले एक दशक में ग्‍लोबल वार्मिंग की स्थिति में बहुत ज्‍यादा खराबी हुई है और इस मामले में अब निर्णायक कदम उठाए जाने का समय आ चुका है.

शुक्रवार, २८ दिसम्बर २००७

पेड़-पौधे प्रदूषण रोकने में सहायक

जेनेटिकली मॉडिफाइड (जीन संशोधित) पेड़-पौधे प्रदूषण रोकने में भी कारगर होते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे पौधों का इस्तेमाल जमीन में मौजूद इंडस्ट्रियल केमिकल और विस्फोटक जैसे प्रदूषक को बाहर निकालने के लिए किया जा सकता है.

खरगोश की जीन से युक्त छह इंच लंबे पॉपुलर के पौधे की जांच में प्रदूषक को बाहर निकलने की क्षमता पाई गई. इसकी जड़ों में केमिकल (ट्राइक्लोरोथिलीन) मिले पानी का इस्तेमाल करने पाया गया कि इसमें अधिकतम 91 फीसदी प्रदूषक तत्व सोखने की क्षमता है. इस केमिकल को जमीन में मौजूद पानी के प्रदूषण का बड़ा कारण माना जाता रहा है. जीएम पौधे ने आम पौधों के मुकाबले इस प्रदूषक को 100 गुणा ज्यादा तेजी से हानिरहित बाय-प्रॉडक्ट में तोड़ने में सफलता पाई.

जैव इंजीनियरिंग से रुका हाइवे पर भूस्खलन

पांच साल पहले तक नेपाल के हाइवे पर भूस्खलन का खतरा रहता था, लेकिन अब लोगों को इस सड़क से गुजरते हुए यह आशंका नहीं सताती. ऐसा मुमकिन हुआ है जैव इंजीनियरिंग के कमाल से. जैव इंजीनियरिंग और सिविल इंजीनियरिंग का मिलाजुला इस्तेमाल करके नेपाल में हाइवे को भूस्खलन से सुरक्षित बनाया गया है. सन् 2004 के बाद से यहां भूस्खलन की कोई बड़ी घटना नहीं हुई है.

क्‍या किया: काठमांडू से 80 किलोमीटर दूर कृष्णबीर में जब भूस्खलन हुआ करते थे तो पृथ्वी हाइवे पर यात्रा करने वालों की जान पर बन आती थी. यह हाइवे समूचे नेपाल में रसद पहुंचाने के लिए लाइफलाइन का काम करता है. यहां जैव इंजीनियरिंग का उपयोग करते हुए बड़ी संख्या में घास, झाड़ी और पेड़ लगाए गए हैं. छोटे-छोटे बांधों को तैयार किया गया है. इसके अलावा दीवारों और नालों को इस तरह तैयार किया गया है कि पानी के तेज प्रवाह और मलबे से ज्यादा क्षति न हो सके.

कृष्णबीर में जैव इंजीनियरिंग से भूस्खलन से निपटने का अनोखा स्थायी रास्ता खोजा गया है. जैव इंजीनियरिंग कम लागत में भूस्खलन को रोकने के बेहतर उपाय उपलब्ध कराता है. खासकर इसका उपयोग पहाड़ी इलाकों में किया जा सकता है. सार यह कि प्रकृति से मित्रवत् रह कर ही इंसान सुरक्षित रह सकते हैं.

मंगलवार, २५ दिसम्बर २००७

मोबाइल, आईपॉड, लैपटॉप, सब पर्यावरण के दुश्‍मन

इलेक्‍ट्रॉनिक गैजेट्स के प्रति लोगों की दीवानगी लगातार बढ़ रही है. इसी के साथ बढ़ रहा है कुदरत पर अत्याचार. लोग नए गैजेट्स की खूबियों से प्रभावित होकर पुराने को छोड़ देते हैं, लेकिन उसका सुरक्षित निपटान नहीं करते. नतीजा होता है पर्यावरण में जहरीली गैसों की मात्रा में वृद्धि. ये गैसें हवा में जहर का काम करती हैं.

सिर्फ ब्रिटेन में हर साल 11 हजार से ज्यादा पुराने सेलफोन मेज की दराज में डाल दिए जाते हैं. यह आंकड़ा क्रिसमस पर और भी बढ़ जाता है. त्यौहार के मौसम में लोग बड़ी संख्या में पुराने को छोड़ नया सेलफोन और लैपटाप खरीद डालते हैं. यह सोचे बिना कि पुराने उपकरणों का निपटारा कैसे किया जाए.

पुराने उपकरणों का सबसे बेहतर इस्तेमाल तो यह होगा कि इन्हें किसी जरूरतमंद को दे दिया जाए या बेच दिया जाए. रीसाइकलिंग एक और बेहतर विकल्प हो सकता है. कंपनियां कई बार पुराने हैंडसेट के बदले नया देने की पेशकश देती हैं. लेकिन ब्रिटेन में लोग अपने हैंडसेट बेचने या किसी को देने के बजाय घर के कोने में फेंकना बेहतर समझते हैं.

एक मोबाइल कंपनी के मैनेजर जान थामसन के मुताबिक समस्या यह है कि लोग अपने मोबाइल फोन हर साल बदल देते हैं. इनमें बहुत कम सेलफोन ही सुरक्षा मानकों के तहत डंप किए जाते हैं. यह वाकई एक खतरनाक चलन है. अनुमान के मुताबिक एक सेलफोन पांच साल तक चल सकता है. फिर भी यूरोप में 10 करोड़ से ज्यादा उपभोक्ता हर साल अपना हैंडसेट बदल देते हैं.

विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि यदि मोबाइल फोन, लैपटाप या आईपाड बदलना जरूरी ही हो जाए, तो पुराने को रिसाइकलिंग के लिए दे देना सबसे बेहतर विकल्‍प है. प्रयास यह होना चाहिए कि ई कचरा कम से कम पैदा हो ताकि पर्यावरण को इससे होने वाली क्षति कम रहे. गैजेट्स का इस्‍तेमाल करने वालों को इसके सुरक्षित निपटान का दायित्‍व भी निभाना होगा.

रविवार, २३ दिसम्बर २००७

अफ्रीका से 17 साल में 24 हजार जिराफ गायब

अफ्रीकी जिराफ के अस्तित्व पर भारी खतरा मँडरा रहा है और यदि शीघ्र ही इनके संरक्षण के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो इनके विलुप्त होने में देर नहीं लगेगी. अमेरिकी और कीनियाई जीव विज्ञानियों ने एक अध्ययन में कहा कि जिराफ की आबादी पर भारी खतरा मँडरा रहा है.

इंटरनेशनल जिराफ वर्किंग ग्रुप की अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है सोमालिया, इथियोपिया तथा कीनिया में सशस्त्र संघर्ष और शिकार की वजह से जिराफों की संख्या घटकर सिर्फ तीन हजार रह गई है, जबकि 1990 में इनकी संख्या 27 हजार थी. अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी अफ्रीकी जिराफ की संख्या लगभग 100 ही रह गई है और ये नाइजर के एक ही क्षेत्र तक सिमटकर रह गए हैं.

सात महीनों में 29 शेर मरे

भारत के गिरि वन और अन्य वन्य जन्तु अभयारण्यों में पिछले सात महीनों में 29 शेरों की मृत्यु हुई. पिछले दिनों सरकार ने संसद में यह जानकारी दी थी. इन 29 शेरों में से 22 की स्वाभाविक कारणों से, एक की कुएँ में गिरने पर, पाँच की बिजली का करन्ट लगने से तथा एक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हुई.

केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य सरकार ने शेरों की मृत्यु के मामलों की जाँच पड़ताल कराई तथा चार संदिग्ध व्यक्तियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया है. केन्द्र सरकार ने भी शेरों की रक्षा के लिए अनेक कदम उठाए है. इसके बावजूद यह बताने को कोई तैयार नहीं है कि शेरों की आबादी में लगातार गिरावट क्‍यों आ रही है.


पर्यानाद: बात भारत के शेर या अफ्रीकी जिराफ की नहीं है. असल मुद्दा यह है कि सारी दुनिया में वन्‍य जीवों के साथ एक निर्दयी हिंसा जारी है जिसे रोकने के लिए कोई चिंति‍त नहीं है. अध्‍ययन होते जा रहे हैं, रिपोर्ट तैयार हो रही हैं लेकिन असल समस्‍या जस की तस है. यदि इस विनाश के क्रम को नहीं रोका गया तो अंत में इसकी परिणिति मानव जाति के समूल नाश के रूप में होगी.

शनिवार, २२ दिसम्बर २००७

इस तरह बाली पहुंचा था सारी दुनिया का संदेश

इंडोनेशिया के शहर बाली में क्‍लाइमेट मीटिंग खत्‍म हो गई. क्‍योटो प्रोटोकॉल की जगह लेने के लिए एक नए समझौते के मसविदें पर काम करने की सहमति बन गई है. भविष्‍य बताएगा इसके क्‍या परिणाम आते हैं. पिछले माह 20 नवंबर को पर्यानाद् ने अपने पाठकों को इस मीटिंग के बारे में जानकारी देते हुए सारी दुनिया से उठ रही रीयल एक्‍शन की मांग का हिस्‍सा बनने की अपील की थी. (देखें वीडियो)

यह तो नहीं बता सकता कि कितने लोगों ने पर्यानाद् की अपील पर इस ग्‍लोबल अभियान में हिस्‍सा लिया लेकिन यह जानकारी देने के लिए पर्यानाद् तैयार है कि जिन लोगों ने अभियान में हिस्‍सा लिया उनका संदेश कैसे बाली पहुंचा और उसे किस तरह क्‍लाइमेट मीटिंग में पहुंचाया गया. तो आप भी देखें सारी दुनिया के साथ....

शुक्रवार, २१ दिसम्बर २००७

घट रहे हैं पेंग्विन

ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते खतरों के बीच यह बात सामने आई है कि अंटार्कटिका में पेंग्विन की जनसंख्या घट रही है. वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड की ताजा रिपोर्ट में यह चिंताजनक खुलासा किया गया है. रिपोर्ट में बताया गया कि अंटार्कटिका पर पाई जाने वाली पेंग्विन की 4 प्रजातियों - चिनस्ट्रैप, इम्पेरर, एडली और जेंटू के बजूद पर खतरा मँडरा रहा है.

ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वह जमीन छिनती जा रही है, जो पेंग्विन के बच्चों के बढ़ने के लिए जरूरी है. असल में पेंग्विन सी-आइस (वह बर्फ जो अंटार्कटिका में सबसे कम तापमान के दिनों में समुद्र के पानी से बनती है) अंडे देती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन और जरूरत से ज्यादा मछली मारने की वजह से पेंग्विन के लिए भोजन की कमी भी एक समस्या बन रही है.

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड के अंतरराष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्यक्रम के डायरेक्टर अन्ना रिनॉल्ड्स ने बताया कि अंटार्कटिका, धरती के तापमान में हो रही औसत बढ़ोतरी की तुलना में 5 गुना तेजी से गर्म हो रहा है. 26 साल में बर्फ में 40 फीसदी तक की कमी आई है. इस गिरावट की वजह से 'क्रिल' (बर्फ में रहने वाले झींगे जैसे जीव) की संख्या तेजी से घटी है, जो पेंग्विन का मुख्य भोजन माना जाता है.

चित्र: साभार विकी

गुरुवार, २० दिसम्बर २००७

भारत का विकास प्रदूषण रहित

प्रदूषण रहित विकास तंत्र सीडीएम लागू करने के मामले में भारत विश्व में सबसे प्रमुख देश बनकर उभरा है. इस तंत्र का पर्यावरण प्रदूषण को कम करना है. राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) द्वारा बुधवार को पारित 11वीं पंचवर्षीय योजना के दस्तावेज में कहा गया है कि इस साल अक्तूबर तक प्रदूषण रहित विकास तंत्र (सीडीएम) कार्यकारी बोर्ड में दर्ज 852 परियोजनाओं में से 294 परियोजनाएं अकेले भारत की हैं'.

तो क्‍या है सीडीएम: सीडीएम क्योटो प्रोटोकाल के तहत एक लचीली व्यवस्था है, जिससे औद्योगिक देश विकासशील देशों में सतत और पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देकर उत्सर्जन में कमी के प्रति अपनी बाध्यता पूरी कर सकें. हालांकि जहां तक कार्बन उत्सर्जन में कमी [सीईआर] का सवाल है भारत का स्थान चीन के बाद दूसरा है.



अमेरिका भी ऊर्जा बचाने की राह पर

ग्लोबल वार्मिग के खतरे के मद्देनजर अमेरिका ने भी ऊर्जा बचाने की राह पकड़ ली है. वहां की प्रतिनिधि सभा में जीवाश्म ईधन की खपत कम करने वाला विधेयक पारित हो गया है. इस विधेयक के प्रमुख प्रावधानों में कारों में ईधन की खपत कम करने के उपाय बढ़ाने को अनिवार्य किया जाना शामिल है. इसे लागू किए जाने पर दो करोड़ अस्सी लाख कारों को अमेरिकी सड़कों से हटाने के बराबर फायदा होगा.

यह विधेयक राष्ट्रपति जार्ज बुश के हस्ताक्षर के बाद कानून की शक्ल ले लेगा. प्रतिनिधि सभा में विधेयक के पक्ष में 314 और विरोध में 100 मत पड़े. पर्यावरणविदों ने विधेयक का स्वागत किया है. विधेयक के अन्य प्रावधानों में ज्यादा बिजली खपत वाले बल्बों का इस्तेमाल 2012 तक बंद करने और कार इंजनों के लिए अक्षत ईधन खास कर मक्के और लकड़ी के टुकड़ों से बनने वाले एथनाल का उत्पादन छह गुना तक बढ़ाना शामिल है.

मंगलवार, १८ दिसम्बर २००७

विशालकाय चूहा और आदमी से बड़ा बिच्‍छू

इंडोनेशिया के सुदूर पूर्वी क्षेत्र में पापुआ प्रांत में खोज के दौरान वैज्ञानिकों ने दो स्तनपायी जीवों का पता लगाया है. इन जीवों में एक विशालकाय चूहा भी है. वैज्ञानिकों के अनुसार पाए गए दोनों जीव नई प्रजाति के है. 'कंजरवेशन इंटरनेशनल' और 'इंडोनेशियन इंस्टीट्यूट आफ सांइस' के वैज्ञानिक समूह ने 2005 के बाद एक बार फिर फूजा पहाड़ियों का भ्रमण किया जिस दौरान उन्हे कई नए पौधे और जानवर मिले.

इस दौरान टीम को दो स्तनपायी जीव भी मिले है जिनमें सबसे छोटे थली धारी जीव 'सरकार्टीटस पिगमी पोसम' के अलावा 'मेलोमिस' विशालकाय चूहा शामिल है. इस चूहे का आकार आमतौर पर पाए जाने वाले चूहे से पांच गुना है. खोज का नेतृत्व करने वाले 'कंजरवेशन इंटरनेशनल' के उपाध्यक्ष ब्रूस बीहल्र के अनुसार, यह अपने आप में सुखद एहसास है कि पृथ्वी पर एक जगह ऐसी भी है जहां वन्यजीव और प्राकृतिक जीव सुरक्षित हैं.



आदमी से बड़े हुआ करते थे समुद्री बिच्छू

कभी समुद्री बिच्छू मनुष्य से बड़े हुआ करते थे. इनकी लंबाई ढाई मीटर यानी आठ फुट तक हुआ करती थी. ब्रिटेन और जर्मनी के शोधकर्ताओं के हाथ लग गया है इसी तरह के बिच्छू के एक पंजे का जीवाश्म. यह जीवाश्म पश्चिमी जर्मनी के सीमांत कस्बे प्रूएम में खुदाई के दौरान पाया गया है. यह आरथ्रोपाड यानी संधिपाद श्रेणी के जीव का अब तक का सबसे बड़ा जीवाश्म है. ब्रिटिश रायल सोसाइटी के एक जर्नल बायोलाजी लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन में यह बात कही गई है.

पश्चिमी इंग्लैंड की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में पृथ्वी विज्ञान संकाय के सिमोन ब्रैडी के शब्दों में यह सचमुच एक अद्भुत खोज है. सामान्य से बड़े आकार के कनखजूरे, बिच्छू, काक्रोच और कीट-पतंगों के जीवाश्म बरामद किए जाने के बारे में तो हम सब वाकिफ हैं, लेकिन अभी तक किसी रेंगने वाले प्राचीन कालीन जीव का यह शायद सबसे बड़ा जीवाश्म है.

अध्ययन में बताया गया है कि प्रूएम में बरामद पंजा 46 सेंटीमीटर का है. यह पंजा 4600 से 2550 लाख वर्ष पूर्व समुद्री बिच्छू का है जिसे जैकेलोपटेरस रेनानिया कहा जाता है. वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह पंजा जिस बिच्छू का है उसकी लंबाई 2.33 मीटर से 2.5 मीटर के बीच का रहा होगा. यह अब तक के बरामद किसी आरथ्रोपाड के शरीर से कहीं ज्यादा बड़ा है.

रविवार, १६ दिसम्बर २००७

बाली सम्‍मेलन: एक और गंवाया हुआ अवसर

जलवायु परिवर्तन पर बाली सम्मेलन को पलीता लगाने में अमेरिका ने कोई कसर नहीं छोड़ी है. जैसे तैसे रोडमैप पर सहमति जताई तो अब अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश कह रहे हैं कि कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए विकासशाली देशों को उत्साहित नहीं किया जा रहा है जो चिंता की बात है. यानि कोई न कोई पेंच बनाए बिना अमेरिका को संतुष्टि नहीं मिलने वाली.

यह बात सही है कि सिर्फ़ विकसित देशों के प्रयास से जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता और इसमें विकासशील देशों की भागीदारी को भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए. इसी मुद्दे को लेकर अमेरिका हठधर्मिता का प्रदर्शन कर रहा है. इसीलिए बाली में अमेरिका के रूख़ की आलोचना हुई. दो दिन पहले यूएनओ ने अमेरिका व अन्‍य विकसित देशों पर सम्‍मेलन को विफल बनाने का आरोप जड़ा था.

इसके बाद काफी प्रयास किए गए और जलवायु परिवर्तन पर सभी पक्षों में एक रोडमैप पर सहमति बनी है जिसके आधार पर ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लए नया समझौता तैयार होगा. रोडमैप के दस्तावेज़ के मुताबिक अगले दो वर्षों में बातचीत के आधार एक नया समझौता तैयार होगा जो 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल की जगह लेगा. क्योटो समझौते की सीमा वर्ष 2012 में ख़त्म हो रही है और इसे अमरीका का समर्थन प्राप्त नहीं है.

कमियां भी हैं: खबरों के अनुसार सम्मेलन में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के दस्तावेज़ पर आरंभिक सहमति तो बन गई लेकिन लक्ष्य तय नहीं हो सके जिसके लिए योरपियन संघ ज़ोर लगा रहा था. समझौते के प्रारुप पत्र से यह भी स्पष्ट नहीं है कि कार्बन डाईऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने में विकासशील देशों की कितनी भागीदारी होगी.

योरपियन संघ काफ़ी बढ़ चढ़कर कह रहा था कि विकसित देशों को ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करना चाहिए और पहले के दस्तावेज़ में उसे प्रमुखता से जगह मिली थी मगर इस दस्तावेज़ में वो हिस्सा महज़ फ़ुटनोट बनकर रह गया है यानी मुख्य दस्तावेज़ के पीछे जोड़ी गई टिप्पणियाँ और आँकड़े. साथ ही वर्ष 2050 तक उत्सर्जन को आधा करने की जो बात थी वो भी इस दस्तावेज़ से बाहर कर दी गई है.

अमेरिका ने चेतावनी दी थी कि अगर प्रदूषण फैलाने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए कोई बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित किया गया तो वह इसे स्वीकार नहीं करेगा. अमेरिका के लिए चिंता का विषय था ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने की अनिवार्य शर्तें, इस बारे में दस्तावेज़ की भाषा अस्पष्ट सी रखी गई दिखती है.

इसमें विकसित देशों से ज़रूरी प्रतिबद्धताओं और क़दमों को राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन देने की बात कही गई है, अमेरिका हमेशा से ही ऐसी भाषा का पक्षधर रहा है. मगर इसमें ये भी कहा गया है कि ये समर्थन अनिवार्य शर्तों के रूप में भी हो सकता है. इस भाषा के साथ अमेरिका में आने वाले नए प्रशासन को वर्ष 2009 के अंत तक वैधानिक रूप से अनिवार्य सीमा तय करने की छूट मिल सकती है.

खबरों के अनुसार जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख ईवो ड बुए नम आँखों के साथ सम्मेलन कक्ष के बाहर जाते दिखे. पर्यावरण से जुड़े संगठनों और अन्य प्रतिनिधियों ने दस्तावेज़ की इस भाषा को कमज़ोर बताते हुए इसे गँवाया हुआ एक अवसर कहा है.

शनिवार, १५ दिसम्बर २००७

सवाल यह है कि हम किसे मार रहे हैं?

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में इटावा के पास चंबल नदी में दुर्लभ प्रजाति गेवियेलिस गेंगेटिक्स के सत्रह घड़ियाल मरे हुए पाए गए. घड़ियालों की यह दुर्लभ प्रजाति अब विलुप्त होने की कगार पर है और शासन इनके संरक्षण पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन घड़ियालों की हत्‍या की गई है और इसके लिए वन विभाग के अमले के वो लोग ही जिम्‍मेदार बताए जा रहे हैं जिन्‍हें रक्षा करने का दायित्‍व सौंपा गया.

जान लीजिए कि गेवियेलिस गेंगेटिक्स एक इतनी महत्वपूर्ण प्रजाति के घड़ियाल हैं कि इंटरनेशनल यूनियन फॉर कन्वेंशन ऑफ नेचर एंड नेचरल हेरिटेज़ (आईयूसीएन) ने इसे क्रिटिकल एंडेजर्ड श्रेणी में रखा है. भारतीय वन्य जीव अधिनियम 1972 में भी इस प्रजाति को अनुसूची प्रथम में रखा गया है.

इसे बचाने के लिए 1979 में चंबल नदी को घड़ियालों के लिए घोषित अभयारण्य बनाया गया. उस समय घड़ियालों की संख्या इतनी कम हो चुकी थी कि घड़ियालों की यह प्रजाति ही समाप्त हो जाती. इसी नदी से प्राप्त घड़ियालों के अंडों को इकट्ठा कर कृत्रिम प्रजनन हेतु लखनऊ स्थित कुकरेल घड़ियाल सेंटर पर ले जाया जाता था, वहां इन्हे दो-तीन साल रखने के पश्चात फिर चंबल में छोड़ दिया जाता था.

वर्ष 1996 तक यह संख्या बढ़कर 1200 तक पहुंच गई किंतु वर्ष 2000 से एक बार फिर घड़ियालों के ऊपर संकट के बादल छाने लगे. कारण यह था कि अभयारण्य में जगह-जगह चोरी छिपे शिकार और उनके प्राकृत वास में बालू खनन का प्रकोप बढ़ता ही गया. पूरे चंबल नदी क्षेत्र में घड़ियालों की प्रजाति पर एक नया संकट दिख रहा है क्‍योंकि यह मानव निर्मित है.

दुर्लभ प्रजाति के जानवरों के प्रति यह क्रूरतापूर्ण व्‍यवहार हमारी किस पाशविक प्रवृत्ति का द्योतक है? जीव हत्‍या का अधिकार किसने हमें दे दिया और वह भी ऐसे जीव जिन्‍हें हम पहले ही खत्‍म होने की कगार पर पहुंचा चुके हैं. सरकार उन्‍हें बचाने का अभियान चला रही है और चंद धन लोलुप अपराधी इन्‍हें मार रहे हैं. यदि इस क्रूरता पर अंकुश नहीं लगा तो एक दिन समूची मानव जाति का ही विनाश हो जाएगा.

बुधवार, १२ दिसम्बर २००७

अगले पांच साल में बर्फ नहीं होगी आर्कटिक में

आर्कटिक महासागर वर्ष 2012 में बर्फ रहित हो जाएगा. नासा के एक जलवायु वैज्ञानिक जे ज्वाली ने यह आशंका जताई है. उनका कहना है कि जिस रफ्तार से आर्कटिक महासागर की बर्फ पिघल रही है, उसे देखते हुए इस बात की पूरी आशंका है कि 2012 तक वह बर्फ रहित हो जाएगा.

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आंकड़ों के अनुसार ग्रीनलैंड की बर्फीली चादर पिछले आंकड़े की तुलना में करीब 19 अरब टन अधिक पिघल चुकी है. इस साल गर्मी में यहां की बर्फ चार साल पहले मौजूद बर्फ की तुलना में बिल्कुल आधी थी.

पिछले साल वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने आश्चर्य जताते हुए कहा था कि आर्कटिक के बर्फ पिघलने की गति को देखते हुए लगता है कि यह 2040 तक नदारद हो जाएगा. इसी सप्ताह नए आंकड़ों का विश्लेषण करने के बाद ज्वाली ने कहा कि इस गति से तो आर्कटिक महासागर वर्ष 2012 में ही बर्फ रहित हो सकता है.



कल अमेरिका में ये हुआ

अमेरिका के मध्य स्थित ओकलाहोमा शहर में तूफान के चलते में जहाँ सड़कें बर्फ की मोटी चादर के नीचे छिप गई हैं और यातायात व्यवस्था ठप हो गई है, वहीं 6,00,000 घरों और बाजारों की बिजली गुल हो गई है. तूफान के कारण हुए सड़क हादसों में 17 लोगों की मौत हो चुकी है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आने वाले दिनों में भी जबरदस्त बर्फबारी होने और जमा देने वाली ठंड पड़ने की भविष्यवाणी की गई है. ओकलाहोमा और मिसौरी में आपात स्थिति की घोषणा कर दी गई है. इस जबर्दस्‍त तूफान के कारण सड़क हादसों में 15 लोगों की मौत हो चुकी है.

स्थानीय लोगों का कहना है कि चारों ओर से बर्फ के भार से पेड़ों की टहनियों के चटखकर गिरने की आवाज सुनाई पड़ रही है. राष्ट्रीय मौसम सेवा ने ओकलाहोमा मिसौरी, कनसास और नेब्रास्का में सड़कों पर पोस्टर लगाकर बर्फीला तूफान आने की चेतावनी दी है. राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड को सतर्क कर दिया गया है.

अब पर्यानाद्: यह केवल एक बानगी है. पर्यावरण से छेड़डाड़ और प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने के इससे भी बद्तर परिणाम हमें झेलना होंगे. यह तो महज एक शुरूआत है.

शनिवार, ८ दिसम्बर २००७

रेनबो वारियर और लुई पाल्‍मर

जलवायु परिवर्तन के मसले पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में संदेश देने का जो तरीका 'रेनबो वारियर' और स्विट्जलैंड के एक यात्री ने निकाला है उससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता. वैश्विक पर्यावरण आंदोलन ग्रीनपीस के ध्वजपोत 'रेनबो वारियर' ने बेनोआ बंदरगाह की गर्म-उनींदी छोटी तरंगों पर इस उम्मीद के साथ डेरा डाला कि संयुक्त राष्ट्र संघ के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के नीति निर्धारकों तक उनका संदेश पहुंच जाएगा.

चालीस डोंगियों से घिरे इस प्रसिद्ध जहाज के किनारे लगने के समय बंदरगाह पर मौजूद संचालक ने वहां प्रवेश करने की अनुमति देने में अच्छा खासा वक्त लगाया, उसने कमोबेश यही रुख जहाज के साथ चल रही मीडियाकर्मियों की नाव के साथ भी अपनाया. जहाज के साथ चल रही डोंगियों को बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई.

'रेनबो वारियर' भारत से इंडोनेशिया पहुंचा है. ग्रीनपीस से जुड़े गेविन एडवर्डस, जो जलवायु परिवर्तन अभियान का नेतृत्व कर रहे हैं ने बताया कि पिछले महीने की शुरूआत तक यह जहाज गंगा के मुहाने पर था. वहां से गुजरते हुए कोलकाता के नजदीक थर्मल प्लांट के एक 'बायलर' के खिलाफ जहाज पर एक बैनर लगाया गया था. इस अभियान का संदेश पुराने फैशन के बल्बों की जगह सीएफएल के बल्ब लगाने की वकालत करना था. (Ban The Bulb)

वहीं, स्विट्जलैंड के एक यात्री ल्यूसर्न से लुई पाल्मर सौर ऊर्जा से चलने वाली कार के जरिए 50 हजार किलोमीटर की यात्रा कर बाली पहुंचा है. लुई ने इस वर्ष 3 जुलाई को ल्यूसर्न से अपनी यात्रा शुरू की थी. भारत होते हुए अब वह 3 से 14 दिसंबर के बीच बाली में हो रहे जलवायु परिवर्तन के लिए यहां पहुंचा है.

पाल्मर का इस सम्मेलन में भाग ले रहे प्रतिनिधियों को संदेश स्पष्ट है कि हम परंपरागत ईधन की बजाय सौर ऊर्जा का इस्तेमाल भी यातायात के लिए कर सकते है. पाल्मर का इरादा जीवाश्म ईधन के इस्तेमाल के बिना सड़क यातायात के माध्यम से पूरी दुनिया का भ्रमण करना है. फिलहाल इस गाड़ी को उन्होंने बाली इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर के सामने खड़ा किया है. इस सम्मेलन के बाद पाल्मर ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका का भ्रमण करेगे.

पर्यानाद्: जो साथी पिछली पोस्‍ट नहीं पढ़ पाए हैं, वे इसे जरूर पढ़ें.

शुक्रवार, ७ दिसम्बर २००७

आप भी आएं पर्यानाद्. पर, स्‍वागत है

बाल किशन जी ने कहा है कि मैं पर्यावरण संरक्षण के उपाय भी बताऊं. घुघूती बासूती ने सबके मिले जुले विचारों वाली पोस्‍ट रखने का सुझाव दिया है. मुझे कोई एतराज नहीं. पर्यानाद् पर आने वाले सभी साथियों से मैं विनम्र अनुरोध करूंगा कि प्रकृति, पर्यावरण, वन्‍य जीव संरक्षण, ग्‍लोबल वार्मिंग या इससे जुड़े किसी भी विषय पर यदि कोई विचार आपके मन में हैं, कोई जानकारी आप बांटना चाहते हैं, तो बेझिझक लाइए आपका स्‍वागत है.

अपने विचार या जानकारी जो भी चाहें, मुझे paryanaad@gmail.com पर भेजें, पर्यानाद् पर आपके नाम से आ जाएगा. कोई बंदिश नहीं, कोई संपादन नहीं (मेरा प्रोफेशन होने के बावजूद उसे अलग रखूंगा, जब तक कि ऐसा करना बेहतरी के लिए जरूरी ना हो, या कोई विवशता ना बन जाए) बस इतनी अपेक्षा रहेगी कि जानकारी सही हो और विचार मौलिक हों.

इधर मेरे मन में भी एक विचार कई दिनों से चल रहा है लेकिन उसे अभी सबके साथ शेयर नहीं करूंगा क्‍योंकि उस सिलसिले को आरंभ करने के लिए यहां कुछ तकनीकी समायोजन करने होंगे. जैसे ही कर लूंगा आपको भी बता दूंगा.

वैसे शुरुआत मीनाक्षी जी ने कर ही दी है. उन्‍होंने एक बहुत ही सुंदर लिंक दिया, मैने देखा तो बस मोहित हो गया. आप सब भी देखें, मुझे यकीन है कि पसंद करेंगे.

बाल किशन जी हालांकि मैं मानता हूं कि कोई जानकारी देने के लिए मैं सही व्‍यक्ति नहीं हूं. अपने आस पास नजरें दौड़ाएं, बहुत कुछ ऐसा दिख जाए‍गा, जिसे रोकने वाला कोई नहीं. आज से यह काम आप कीजिए.

बहरहाल एक छोटा सा तरीका बताता हूं. याद करें आपने अंतिम बार किसी ऐसे पौधे को कब सींचा था, जो आपने नहीं लगाया? आए दिन हम अखबारों में वृक्षारोपण समारोहों के आयोजन के बारे में पढ़ते हैं. क्‍या आप जानते हैं कि 80 प्रतिशत मामलों में ऐसे पौधे कभी वृक्ष नहीं बन पाते क्‍योंकि उनकी देखभाल करने वाला आमतौर पर कोई नहीं होता. ऐसे किसी आयोजन के बाद कुछ पेड़ों को जीवित रखने का संकल्‍प ले लीजिए. (पर उपदेश कुशल बहुतेरे)

एक भूल सुधार: 26 नवंबर को यहां जो पोस्‍ट मैने दी थी, उसके लिए वीडियो का लिंक सागरचंद नाहर जी ने उपलब्‍ध कराया था. नाहर जी का शुक्रिया. उस वक्त मैं उनका उल्‍लेख करना भूल गया था. भूल के लिए माफ करें नाहर जी.

तो आज मीनाक्षी जी के सौजन्‍य से देखें कुछ मन को झंकृत कर देने वाले दृश्‍य, साथ में थोड़ा सा कुछ पढ़ना भी होगा और थोड़ा सा कुछ सुनना भी होगा. नीचे की कड़ी को क्लिक करें, आप पहुचं जाएंगे. हां यदि समय लगे तो जरा धैर्य रखें. यकीन जानें आपको निराशा नहीं होगी. ये रही कड़ी....

Earth Teach Me to Remember....

पुनश्‍च: घुघूती बासूती, उम्‍मीद करता हूं कि आप प्रसन्‍न होंगी लेकिन अब आप भी अपने अनुभव, विचार, जानकारी यहां आकर हमारे साथ बांटें.

चार सौ बाघ निगल गया मध्‍य प्रदेश

बरसों से 'टाइगर स्टेट' के दर्जे पर इतरा रहे मप्र के लिए यह खतरे की घंटी है. नई और वैज्ञानिक विधि से हुई ताजा गणना ने यह राज फाश कर दिया है कि राज्य के जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों में सिर्फ 296 बाघ ही बचे हैं. जबकि कुछ समय पहले तक समूचा महकमा यह दावे करते नहीं अघाता था कि प्रदेश में बाघों की संख्या 7 सौ है. अगर सरकार के दावे तब सही थे तो यह जवाब लाजिमी है कि बाकी 400 बाघों को जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

एक खबर के अनुसार भारतीय वन्य प्राणी संस्थान देहरादून ने हाल में मप्र के बाघों की गणना की अंतिम रिपोर्ट तैयार की है. इसमें संख्या का खुलासा हुआ है. लगभग पाँच महीने पहले संस्थान ने अंतरिम रिपोर्ट में बाघों की अनुमानित संख्या 4 सौ के आसपास बताई थी. लेकिन अंतिम निष्कर्ष यह उभरा कि राज्य के खुले एवं संरक्षित क्षेत्रों में महज 296 बाघ बचे हैं. यदि शावकों को भी जोड़ लिया जाए तो यह गिनती 346 तक पहुँच रही है.

खास बात यह है कि बाघों की गणना का तरीका अब बदल गया है. वन्य प्राणी संस्थान ने वैज्ञानिक विधि अपनाते हुए बाघों का जंगल में रहवास क्षेत्र, उनका विचरण क्षेत्र, पगमार्क आदि के आधार पर गिनती का तरीका अपनाया है. इसके पहले राज्य के वनकर्मी बाघों के पगमार्क के आधार पर ही गिनती किया करते थे. ताजा रिपोर्ट से साफ है कि राज्य में बाघों की संख्या में काफी कमी आ गई है. खुले वन क्षेत्रों में तो इनकी संख्या में चिंताजनक गिरावट है. जबकि नेशनल पार्क व टाइगर रिजर्व में यह संख्या संभली हुई तो है, लेकिन पिछले दावों की तुलना में काफी कम है.

अब मप्र के पाँच टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 232 है और खुले क्षेत्रों में महज 64 बाघ हैं. कई टाइगर रिजर्व में तो बाघों के नजर ही नहीं आने की बातें भी सामने आती रही हैं. मप्र में कुल 5 टाइगर रिजर्व हैं, जबकि 25 अभयारण्य और 9 नेशनल पार्क हैं. उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद मप्र में वर्ष 2003 में बाघों की संख्या 711 बताई गई थी. इसके बाद वर्ष 05 व 06 में गणना की विधि को वैज्ञानिक आधार दे दिया गया.

नतीजतन जो संख्या सामने आई वह चौंकाने वाली रही. यदि यही हाल रहा तो आने वाले वक्तमें मप्र के माथे से टाइगर स्टेट का तमगा हट भी सकता है. वैसे राज्य के अधिकारी अभी यह कहकर अपने आप को दिलासा दे रहे हैं कि पूरे देश में ही 911 बाघ बचे हैं और इनमे से साढ़े तीन सौ मप्र में हैं लिहाजा तमगा छिनने का सवाल ही नहीं. यही सोच शायद बाघों के प्रति पर्याप्त समर्पण में बाधक बन रही है. वैसे इस संख्या ने राज्य के जंगलों में शिकार माफिया के सक्रिय होने तथा जंगल महकमे के लाचार और लापरवाह होने की तरफ भी उँगली उठाई है.

जानकारों का मानना है कि हालातों को तत्काल बस में नहीं किया गया तो स्थिति और बिगड़ भी सकती है. इधर सूत्र बताते हैं कि राज्य शासन शीघ्र ही वन विभाग के वरिष्ठ अफसरों को तलब कर जंगलों व संरक्षित वन क्षेत्रों की स्थिति पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है. बाघ की कुल नौ उप प्रजातियाँ ज्ञात हैं, जिनमें से पाँच फिलहाल मौजूद हैं. भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार में बंगाल या रॉयल बंगाल टाइगर पाया जाता है.

जानवरों में बाघ सबसे वजनदार कैट प्रजाति का है. साइबेरियन टाइगर में अब तक सबसे वजनदार बाघ 384 किग्रा का दर्ज है. नर बंगाल टाइगर का वजन 227 किलो तक होता है जबकि मादा का 141 किलो. बाघ कभी भी समूह में शिकार नहीं करता. यह अकेले शिकार करना पसंद करता है. इसकी दौ़ड़ने की गति 49 से 65 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है. बाघ पाँच मीटर यानी करीब 16 फुट की ऊँचाई तक कूद सकता है और 9 से 10 मीटर दूरी से शिकार पर छलाँग लगा सकता है.

गुरुवार, ६ दिसम्बर २००७

तुम्‍हारी दास्‍तां तक ना होगी दास्‍तानों में

बाली में संयुक्त राष्ट्र के एक सम्मेलन में युवा कार्यकर्ताओं ने वहां आए प्रतिनिधियों को चेताया कि अगर जल्द ही जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो उन्हे अपना अस्तित्व बचाने के लिए एक आपातकालीन किट की आवश्यकता पड़ सकती है.

'बाली इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर' में जब 187 देशों के 10 हजार प्रतिनिधि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए चर्चा कर रहे थे तो अचानक स्वंयसेवी संगठनों के सदस्य यहां आ पहुंचे. उन्होंने प्रतिनिधियों को आपातकालीन किट के बारे में जानकारी दी और कहा कि लोगों को क्यों इसकी जरूरत पड़ सकती है.

उन्होंने बताया कि इस किट में मलेरिया से बचाव के लिए दवाईयां है क्योंकि जलवायु परिवर्तन से सहसा कई तरह की बीमारियों का खतरा उत्पन्न हो सकता है. स्वयंसेवकों के अनुसार समुद्र का पानी लगातार बढ़ता जा रहा है और तटीय इलाकों में खतरा पैदा हो रहा है. इस वजह से लाईफ बेल्ट की आवश्यकता हो सकती है.

मूल समस्‍याओं की उपेक्षा से क्षुब्‍ध स्‍वयंसेवकों ने कहा कि पूरी दुनिया का तापमान इतना अधिक हो जाएगा कि इसके लिए हाथ से चलने वाला एक पंखा होना जरूरी होगा. उन्‍होंने बताया पिघलते हिमनदों की वजह से जलापूर्ति प्रभावित होगी और पानी को साफ करने के लिए जल शोधक दावइयों की आवश्यकता हो सकती है.

स्‍वयंसेवकों का कहना है कि कृषि भूमि के बंजर होने से खाद्य समस्या हो सकती है. इससे निपटने के लिए लोगों के पास पर्याप्त राशन होना चाहिए. बदलती जलवायु का प्रभाव शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र पर भी पड़ता है. इससे मुकाबले के लिए विटामिन की गोलियां भी होनी चाहिएं. जलवायु परिवर्तन की वजह से लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना पड़ सकता है इसलिए उनके पास हर समय एक बस का टिकट होना चाहिए.

इसे भी देखें : ग्‍लोबल वार्मिंग से चिंतित लोगों का प्रदर्शन

ग्लोबल वार्मिग से चिंतित लोगों का प्रदर्शन

इंडोनेशिया के प्रशांत द्वीपों में रहने वाले लोगों ने ग्लोबल वार्मिग के कारण डूबते अपने घरों की ओर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है. वे पूछ रहे है कि समुद्र के बढ़ते जलस्तर से उनके घरों को कौन बचाएगा? जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर यहां हो रहे सम्मेलन में दुनिया भर के 187 देशों के 10000 से ज्यादा प्रतिनिधि भाग ले रहे है.

ग्लोबल वार्मिग के खतरे से निपटने के लिए संमेलन में तय की जा रहीं नीतियों को जल्द से जल्द लागू किए जाने की मांग करते हुए टोंगा, किरीबती, बाउगेनविले और टॉरेस द्वीपों के लोगों ने अपने पारंपरिक गानों, नृत्य और चित्रों के माध्यम से खुद पर ग्लोबल वार्मिग के प्रभावों को दर्शाया.

पारंपरिक गाने के रूप में अपनी पीड़ा और भय का इजहार करते हुए वे कह रहे है कि अब मछली पकड़ना बहुत मुश्किल हो गया है और पेड़ लगातार गिर रहे है. समुद्र हमारे पास आता जा रहा है और हमारी जमीन को निगल रहा है. बाउगेनविले के कार्टरेट्स द्वीप से इस प्रदर्शन में हिस्सा लेने आर्ई उरसुला राकोवा ने कहा कि अगर पश्चिमि देश हमें अपने यहां बसाने की पेशकश करते हैं तो उनके साथ मिल कर हमारी संस्कृति नष्ट हो जाएगी. हम नहीं चाहते कि हमारे साथ ऐसा हो.

बुधवार, ५ दिसम्बर २००७

खतरे में है अफ्रीका की सबसे बड़ी झील

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी झील का अस्तित्व खतरे में है. विक्टोरिया झील के निरीक्षण के बाद विशेषज्ञों ने यह राय दी है. झील का उपयोग कारों और ट्रकों की सफाई के लिए किया जा रहा है. इससे झील का पानी और प्रदूषित हो गया है. झील में जलकुंभियों की भरमार है, जिससे मछलियां भी कम होती जा रही है.

पर्यावरण वैज्ञानिकों और विक्टोरिया झील के किनारे रहने वाले लोगों का मानना है कि यदि जल्द इस झील को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो झील को पूरी तरह से खत्म होने से नहीं रोका जा सकता है. विक्टोरिया झील के पास के एक गांव के पर्यावरण वैज्ञानिक एरिक ओडाडा ने कहा कि यह झील पहले भी तीन बार सूख चुकी है, लेकिन इस बार यह खतरा मनुष्य द्वारा पैदा की गई स्थितियों के कारण अधिक चिंताजनक बन गया है.

आसपास के गांवों में जंगल की कटाई और झील में मिलने वाली दर्जनों नदियों के कारण उत्पन्न गाद से झील को काफी नुकसान हो रहा है. पिछले सौ सालों में जलस्तर 120 मीटर से घटकर 40 मीटर रह गया है. 15 वर्षो से झील के सहारे मछली का कारोबार करने वाले ज्योफ्री ओब्योर ने कहा कि यदि यह सब जारी रहा तो झील पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर रहने वाले लाखों लोगों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी.

मंगलवार, ४ दिसम्बर २००७

मानव के सर्वश्रेष्‍ठ होने का भ्रम

लंबे समय से यह धारणा चली आ रही थी कि चीजों को ग्रहण करने और उसे जानने समझने के मामले में मानव सभी प्राणियों से आगे है. हाल के एक अनुसंधान में यह तथ्य उभर कर आया है कि नन्हे चिंपैंजी याद्दाश्त के मामले में हमें आसानी से पछाड़ सकते हैं. मजे की बात यह है कि अदना से दिखने वाले इन चिंपैंजी की याद्दाश्त का मामला सिर्फ पेड़-पौधों या जंगलों से जुड़ा हुआ नहीं है. वे ज्ञान के क्षेत्र में और गिनती याद रखने तक में भी मनुष्यों से आगे हैं.

जापानी वैज्ञानिकों ने अपने एक अध्ययन में पाया कि गिनती याद करने और उन्हें दोहराने के मामले में नन्हे चिंपैंजियों में वयस्क मानवों से कहीं ज्यादा और विलक्षण गुण होता है. क्योटो यूनिवर्सिटी के तेत्सूरो मात्सुजावा ने जापानी वैज्ञानिकों के इस ऐतिहासिक अध्ययन के निष्कर्षो के महत्व को रेखांकित किया है. उनका कहना है कि अब भी बहुत सारे लोग और अनेक जीव वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव तमाम बोधात्मक क्रियाओं में चिंपैंजी से आगे हैं.

इस अनुसंधान के निष्कर्ष करेंट बायोलोजी में प्रकाशित किए गए हैं. निष्कषों में कहा गया है कि कोई इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता है कि चिंपैंजी पांच साल की उम्र में नन्हे चिंपैंजी याद्दाश्त के परीक्षण में आदमियों से अच्छा प्रदर्शन करेंगे. अनुसंधान में कहा गया है कि यहां हमने पहली बार प्रदर्शित किया है कि समान प्रक्रिया अपनाते हुए समान उपकरण से परीक्षण करने पर नन्हे चिंपैंजी में संख्यात्मक याद्दाश्त वयस्क मानव से ज्यादा होती है. उनमें विलक्षण कार्यकारी स्मृति क्षमता होती है.

मातृत्व से गुजर चुकी मादा चिंपैंजियों में अय पहली चिंपैंजी थी जिसने उचित अंकों से वास्तविक जीवन की वस्तुओं को लेबल करने के लिए अरबी अंकों का इस्तेमाल करना सीखा था. इस बार संपन्न नए परीक्षण में चिंपैंजियों या मानवों को टच-स्क्रीन की मदद से एक से ले कर नौ तक विभिन्न अंकों को पेश किया गया. इसके बाद इन अंकों को खाली वर्गो से बदल दिया गया. परीक्षण में हिस्सा ले रहे मानवों और चिंपैंजियों को यह याद रखना था कि अंक किन स्थलों पर आए थे. उन्हें उन वर्गो को उचित क्रम में छूना था.

अध्ययन में पाया गया कि नन्हे चिंपैंजी एक निगाह में अनेक अंक याद रख सकते हैं. उनकी ग्राह्य शक्ति इतनी पैनी है कि अगर उन अंकों को 210 मिली सेकेंड के लिए फ्लैश किया जाता है तो भी उन्हें याद रहता है. उनके प्रदर्शन में कोई परिवर्तन नहीं आता है. उल्लेखनीय है कि हमें मोटे तौर पर अपनी पलकें झपकाने में करीब 105 मिलीसेकेंड का समय लगता है. अनुसंधानकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि 210 मिलीसेकेंड इतना पर्याप्त समय नहीं है जिसमें मानव दृष्टि स्क्रीन का चक्कर लगाए.

अध्ययन में पाया गया कि कुल मिला कर तीन नन्हे चिंपैंजियों का प्रदर्शन अपनी मांओं से बेहतर है. तीनों नन्हे चिंपैंजी प्रदर्शन के मामले में वयस्क मानवों से भी बाजी मार ले गए. वयस्क मानवों का प्रदर्शन तीनों ही चिंपैंजियों से खराब था. वे रिस्पांस देने में ज्यादा सुस्त रहे. मात्सुजवा ने मानव के मुकाबले चिंपैंजियों के बेहतर प्रदर्शन की जटिल गुत्थी सुलझाने के प्रयास के तहत कहा कि चिंपैंजियों में किसी जटिल दृश्य या पैटर्न की विस्तृत एवं सटीक छवि को याद रखने की विशेष क्षमता होती है. उन्होंने कहा कि इस तरह की फोटोग्राफिक याददाश्त मानव के कुछ सामान्य बच्चों में भी होती है. फिर उम्र के साथ घटती जाती है.

सोमवार, ३ दिसम्बर २००७

तो आपका जन्‍म किस मौसम में हुआ?

वैज्ञानिकों को आपने शायद ही कभी ऐसी बातें करते सुना हो, लेकिन ये सच है कि सितारों से नहीं बल्कि इस बात से आपका व्यक्तित्व और स्वास्थ्य तय होता है कि आप किस मौसम में पैदा हुए हैं. संडे टेलीग्राफ ने अपनी रिपोर्ट में यूरोप के एक शोधकर्ता दल की रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें पाया गया है कि भाग्य का पहिया सितारों से नहीं घूमता बल्कि यह जालिम मौसम का कमाल होता है, जो लोगों के व्यक्तित्व के विभिन्न पहुलओं को संचालित करता है.

शोध के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में मई महीने में पैदा होने वाली महिलाएँ अधिक मनोवेगी व्यवहार करती हैं जबकि जिनका जन्म नवंबर में होता है वे अधिक बहिर्मुखी होती हैं. इसी प्रकार वसंत ऋतु में पैदा होने वाले पुरुष सर्दियों में पैदा हुए पुरुषों के मुकाबले अधिक दृढ़ विचारों के होते हैं. रिपोर्ट कहती है कि पतझड़ में पैदा होने वाले लोग शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय होते हैं और फुटबॉल जैसे खेल में कमाल दिखाते हैं जबकि वसंत ऋतु में पैदा होने वालों का रुझान शतरंज जैसे खेलों की ओर अधिक होता है. सितंबर और दिसंबर के बीच पैदा होने वाले लोग मानसिक रूप से अधिक आतंकित रहते हैं जबकि इस बात के ठोस सबूत हैं कि जाती सर्दी और आते वसंत में पैदा हुए लोग शिजोफ्रेनिया के अधिक शिकार होते हैं.

हार्टफोर्डशायर यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर रिचर्ड वाइजमैन के हवाले से दैनिक ने लिखा है यह एकदम से कुछ वैसा ही है जैसा आप मौसम के तापमान के संबंध में उम्मीद लगाते हैं. मौसम संबंधी कई सारे प्रभाव दोनों गोलार्द्ध में उलटे हो जाते हैं. एक अन्य शोधकर्ता तथा एबरदीन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन ईगल कहते हैं किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को परिभाषित करने में मुख्य दोष आहार तथा पोषण में मौसमी उतार-चढ़ाव तथा सर्दियों में होने वाले संक्रमण का होता है. यहाँ आनुवंशिक तथा अन्य पर्यावरणीय कारण भी भूमिका अदा करते हैं. इसलिए मौसम की पैदाइश एक सहायक कारक है.

लोगों का भविष्य बताने वाले हालाँकि इन चीजों को नहीं मानते और वे इसी तथ्य से प्रभावित हैं कि किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तित्व सितारों से प्रभावित होता है. इसके तर्क में वे उन लाखों लोगों का उदाहरण देते हैं जो रोजाना अपना भविष्यफल देखते हैं. लेकिन शोधकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि इन प्रभावों के पीछे कुछ मूलभूत जैविकीय कारण जिम्मेदार हैं न कि सितारों या ग्रहों की गति.

स्वीडन की यूमेया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जयंती छोटाई के अनुसार गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला के शरीर द्वारा पैदा किए गए संवेदनशील हार्मोन्स का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चा किस मौसम में पैदा हुआ है और यही स्तर गर्भावस्था के समय से ही शिशु के व्यक्तित्व को आकार देना शुरू कर देता है.

प्रोफेसर छोटाई कहती हैं कि तापमान, संक्रमण, रौशनी, जीवनशैली में परिवर्तन तथा पोषण ये सभी चीजें मौसम पर निर्भर करती हैं और इसी से ऐसा समझा जाता है कि हार्मोन्स प्रभावित होते हैं. ये विभिन्नता हमारी सौर प्रणाली में आने वाले मौसमी बदलाव से समझी जा सकती हैं. उदाहरण के लिए सर्दियों में सूरज की रोशनी कम रहती है और तापमान में गिरावट आती है. ऐसे मौसम में विषाणुओं का संक्रमण अधिक फैलता है.

रविवार, २ दिसम्बर २००७

आइए फिर याद करें भोपाल गैस त्रासदी

तेईस साल गुजर गए. मानव इतिहास की सबसे क्रूरतम् औद्योगिक दुर्घटना यानि भोपाल गैस त्रासदी को याद करने का समय एक बार फिर आ चुका है. कुछ रस्‍मी विरोध प्रदर्शन होंगे, कुछ आंसू बहाए जाएंगे और फिर जिंदगी आगे बढ़ जाएगी. लेकिन उन हजारों लोगों का जीवन उस काली रात के बाद हमेशा के लिए बदल चुका है जिनके अपने इस त्रासदी की भेट चढे थे. दुर्भाग्‍य यह है कि आज भी हजारों लोग ऐसे हैं जो गैस के दुष्‍प्रभावों के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं.


आंकड़ों की बात करने का अब कोई औचित्‍य नहीं है. लेकिन आइए आज फिर देखते हैं मौत के उस खेल से जुड़े कुछ वीभत्‍स आंकड़े. ग्रीनपीस के आंकड़े कहते हैं करीब 8 हजार लोग तभी मारे गए थे. उसके बाद से अब तक करीब 25 हजार से ज्‍यादा मौतें हो चुकी हैं. हर माह 10 से 15 लोग आज भी गैस के दुष्‍प्रभावों से उपजी विकृतियों का शिकार होकर मौत के मुंह में चले जाते हैं. करीब 5 लाख लोग गैस के दुष्‍प्रभावों का शिकार किसी न किसी रूप में हुए थे. करीब 1.5 लाख बच्‍चे गैस से प्रभावित माता पिता की संतानों के रूप में जन्‍म लेने के बाद स्‍थाई यप से स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं का सामना कर रहे हैं.

गैस पीडितों को मुआवजा बंट गया, वारैन एंडरसन आज भी स्‍वतंत्र घूम रहा है और भोपाल इस जघन्‍य त्रासदी की रुला देने वाली दु:स्‍मृतियों को बोझ अपने सीने पर ढोने को वि‍वश है. लेकिन सबसे अहम् सवाल यह है कि हमने इस त्रासदी से क्‍या सीखा? क्‍या हमने ऐसी दुर्घटना फिर कभी ना हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रयास किए ? जवाब बहुत खराब है..... नहीं.

औद्योगिकीकरण की अंधी रफ्तार अब और तेज हो चुकी है और यह गारंटी कोई नहीं दे सकता कि ऐसा फिर नहीं होगा. यूनियन कार्बाइड की बंद पड़ी उस मानवभक्षी फैक्‍ट्री के खंडहरों में अब भी जहरीले रसायन पड़े हैं, जिन्‍हें हटाने को लेकर यदा कदा आवाज उठती है लेकिन राजनीति शुरू हो जाती है और कुछ नहीं हो पाता.

यदि हम ऐसी घटनाओं से सबक नहीं सीख सकते तो कुछ भी हमारी चेतना को जाग्रत करने में सक्षम नहीं है. पर्यावरण का विनाश अंतत: मानवीय जीवन के विनाश का कारण साबित होगा. भोपाल की जगह कोई और शहर होगा, यूनियन कार्बाइड की जगह कोई और कंपनी होगी लेकिन मरेंगे वहां भी इंसान ही. बस उनके नाम बदल जाएंगे. प्रकृति का आर्तनाद् सुनिए, यह पर्यानाद् है.... अपने बच्‍चों की खातिर, अपनी खातिर पर्यावरण का विनाश रोकिए.