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Sunday, November 4, 2007

जंगल के राजा की दुर्दशा

दिल दुखा देने वाला यह समाचार पढ़ना शायद किसी को अच्‍छा नहीं लगेगा.
लेकिन इस कटु सच्‍चाई को नकारा नहीं जा सकता कि अब पृथ्‍वी पर इस शाही जीव का अस्तित्‍व सचमुच खतरे में है. हमें क्‍या करना चाहिए ? शायद शेर और बाघों पर कहानियां लिखनी चाहिए, उनकी विविध तस्‍वीरें जमा कर लेनी चाहिए क्‍योंकि जल्‍द ही वे पूरी तरह लुपत हो जाएंगे. फिर हमें अपनी आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए इन तस्‍वीरों की जरूरत पढ़ेगी कि ''देखो बच्‍चो, यह था जंगल का राजा, जो कभी इस ग्रह पर रहता था. फिर हमने इसका शिकार कर लिया और अब यह समाप्‍त हो चुका है''. कल्‍पना कीजिए कि एक दिन अंतिम बाघ का शिकार होगा और पृथ्‍वी के जंगलों से वहां के राजा का अस्तित्‍व समाप्‍त हो जाएगा. कैसे होंगे बिना राजा के जंगल..... ?

दुनिया भर से बाघों की तीन प्रजातियां लुप्‍त

दुनियाभर में जंगल के राजा कहे जाने वाले बाघों और शेरों के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. गुजरात के गिर अभयारण्य में जहाँ हाल ही में ग्रामीणों द्वारा बिजली के करंट से की गई पाँच शेरों की हत्या ने वन्यजीव प्रेमियों को सकते में डाल दिया है, वहीं इंडोनेशिया में विपरीत परिस्थितियों के चलते पिछली सदी में बाघ की तीन उप प्रजातियों का पूरी तरह से नामोनिशान मिट गया है.

विश्व वन्यजीव कोष (WWF) शेरों और बाघों की निरंतर घट रही संख्या से परेशान हैं और उसने प्रकृति के इन जाँबाज प्राणियों की रक्षा के लिए अधिक से अधिक कदम उठाने का आह्वान किया है. WWF की अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक पिछली सदी बाघों के लिए खतरनाक रही और वही परिस्थितियाँ अब भी जारी है. संगठन का कहना है कि पिछली सदी में इंडोनेशिया में बाघों की बाली कैस्पेन और जावा तीन उप प्रजातियाँ पूरी तरह विलुप्त हो गईं. WWF के अनुसार वन्यजीवों को खतरे के मामले में लगभग पूरी ही दुनिया में हालात एक जैसे हैं और दक्षिणी चीनी बाघ प्रजाति भी तेजी से विलुप्त होने की ओर बढ़ रही है.

संगठन का कहना है कि सरकारी और गैर सरकारी संरक्षण प्रयासों के बावजूद विपरीत परिस्थितियाँ निरीह प्राणियों की जान लेने में लगी हैं. बाघों और शेरों की जान कई बार अभयारण्यों में बाढ़ का पानी भर जाने से चली जाती है तो कई बार सुरक्षित स्थानों की ओर भागने के प्रयास में वे या तो वाहनों के पहियों से कुचले जाते हैं या फिर घात लगाकर बैठे शिकारियों का निशाना बन जाते हैं.

गुजरात के गिर अभयारण्य में हाल के वर्षों में 33 शेरों की जान जा चुकी है. इनमें से कुछ प्राकृतिक कारणों से मारे गए, तो कुछ को ग्रामीणों या शिकारियों ने मार डाला. हाल ही में एक ग्रामीण परिवार ने गिर अभयारण्य के पाँच शेरों को बिजली के करंट से मार डाला. इस परिवार ने अपने खेतों के इर्द-गिर्द लगाए गए तारों में बिजली का करंट छोड़ रखा था. अक्टूबर के महीने में असम के ओरांग नेशनल पार्क में ग्रामीणों ने जहर देकर दो बाघों को मार डाला. भारतीय वन्यजीव ट्रस्ट (WTI) के अधिकारियों का कहना है कि ग्रामीणों ने वन्यजीवों द्वारा अपने पशुओं पर होने वाले हमलों का बदला लेने के लिए संभवत: ऐसा किया.

पार्क के संरक्षित क्षेत्र के नजदीक रहने वाले ग्रामीणों ने एक भैंस के शव पर जहर छिड़ककर कर उसे जंगल में फेंक दिया. भैंस का माँस खाकर दो बाघों की मौत हो गई. एक बाघ का शव दो अक्टूबर को भाबापुर गाँव के नजदीक पार्क के क्षेत्र में मिला, जबकि दूसरे बाघ का शव इसी क्षेत्र में चार अक्टूबर को मिला. बाघों और शेरों की संख्या में निरंतर आ रही गिरावट विश्वभर के वन्यजीव प्रेमियों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है.

मेरा सवाल: क्‍या कुछ समय बाद बाघ और शेर सिर्फ तस्‍वीरों में ही देखने को मिलेंगे?

5 comments :

सागर चन्द नाहर said...

पर्यानाद जी
शेरों की दुर्दशा के बारे में जानकर बहुत दुख हो रहा है। पर एक ना एक दिन यह होना ही है। एक जमाने में अमरीका में पेसेन्जर कबूतरों के झुंड जब आकाश से गुजरते थे तब पूरे पूरे दिन सूर्य नहीं दिखाई देता था, और जब मानव वहाँ पहुँचा सौ साल में पूरी प्रजाति ही नष्ट हो गई, कुछ ऐसा ही हाल डोडो का हुआ।
हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका हार्दिक स्वागत है, आज ही आपके चिट्ठे का पता चला। आपने बहुत ही बढ़िया विषय चुना है लिखने के लिये।
हम कविता , कहानियाँ, लेख तकनीक आदि विषयों पर बहुत लिखते हैं पर पर्यावरण पर बहुत ही चिट्ठे लिखे गये हैं।
आप नारद, चिट्ठाजगत, ब्लॉगवाणी और हिन्दी ब्लॉग्स पर अपने चिट्ठे का पंजीकरण करवालें ताकि अन्य पाठकों को भी इस सुन्दर चिट्ठे के बारे में पता चल सके।
आपके ब्लॉग का लिंख मैं अपने ब्लॉग के साईडबार में मेरे पसंदीदा चिट्ठों की लिस्ट में लगा रहा हूँ।
धन्यवाद। sagarchand.nahar @ gmail. com
॥दस्तक॥
गीतों की महफिल

अनुनाद सिंह said...

स्वागतम्! पर्यावरण के सMरक्षण के लिये किया गया आपका कार्य अत्यन्त स्तुत्य है।

लिखते रहिये, ऐसे ही जागृति आयेगी।

arvind mishra said...

एक मुश्किल यह है की अभी भी बहुत से लोग शेर और बाघ मी फर्क नही समझ पाते .अरे भाई जब उन्हें पहचानोगे नही तो बचाओगे क्या ख़ाक?
एक जमाने मी मशहूर रही भार्गवा डिक्शनरी ने टाईगर का अर्थ चीता लिख मारा ,यह होना चाहिए था बाघ .मानो यह कम नही था कि रामेश बेदी जैसे कथित वन्यजीव विशारद ने शेर को ही बाघ लिख पढ़ कर घोर भ्रम पैदा किया .आपके चिट्ठे मे बाघ का फोटो है मगर आपने भी शेर और बाघ दोनों की बात कर डाली है ,आप तो दोनों की समझ रखते हैं मगर क्या इन दोनों के फर्क से अपने सुधी पाठकों को भी परिचित करायेंगे ?
यह भी एड कर दीजियेगा कि चीता पूरी दुनिया मे चीते के नाम से ही जाना जाता है ,जो संस्कृत शब्द है और जिसका अर्थ चित्ता यानी धब्बेदार होता है ,मगर यह भारत से पचास वर्ष पहले ही लुप्त हो गया है .मगर अखबारों की माने तो अभी भी चीते की खाल सुर्खियों मे बरामद होती है और तमिल व्याघ्र नही तमिल्चीते हमला करते है -भार्गव जी अमर हैं !
अच्छी पोस्ट के लिए बधाई !

Bhavya said...

अच्छा प्रयास है। जारी रखिए।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन प्रयास के लिये साधुवाद एवं शुभकामनायें.

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