Saturday, February 13, 2010

कपड़े धुलेंगे मगर बिना पानी खर्च किए

यह एक अच्‍छी खबर है। ब्रिटेन में वैज्ञानिकों ने ईको फ्रेंडली वाशिंग मशीन तैयार की है। यह न के बराबर पानी के इस्तेमाल से कपड़ों को आम मशीनों की तरह ही साफ करेगी। इसमें आम मशीनों के मुकाबले बहुत कम बिजली और डिटर्जेट की जरूरत पड़ेगी।

Friday, February 12, 2010

बाघों को असली खतरा अमीरजादों से

एक ओर जहाँ विश्व के सभी देश लुप्तप्राय जीवों के संरक्षण के लिए अपनी तत्परता दिखा रहे हैं वहीं एशिया में नवधनाढ्यों के बीच बाघ की हड्डियों से बनने वाली शराब तथा उसके खाल, मांस और दाँतों से बनने वाले उत्पादों की बढ़ती माँग से पूरे विश्व में बाघों के संरक्षण पर खतरा मंडरा रहा है।

Wednesday, February 03, 2010

समुद्रों में बढ़ते डैड जोन से जलजीवन पर खतरा

यदि धरती पर पर्यावरण का संकट बरकरार रहा तो समुद्र में भी जीवन खत्म हो जाएगा। इसकी वजह है महासागरों के गहरे पानी में कम होती आक्सीजन की मात्रा। यह कुछ वैसा ही नजारा होगा जैसा हजारों साल पहले समुद्र में ज्वालामुखी फटने पर हुआ होगा। महासागरों के अध्ययन बता रहे हैं कि समुद्र में 'डेड जोन' बनते जा रहे हैं।

Monday, February 01, 2010

पर्यावरण में बदलाव लाता है सल्फर

धरती को सदियों से बार-बार ज्वालामुखी विस्फोटों का सामना करना पड़ा है। एक नए शोध में दावा किया गया है कि करीब दस करोड़ वर्ष पहले ज्वालामुखियों की बाढ़ में समुद्री जीवन का एक तिहाई हिस्सा खत्म हो गया होगा। अब तक माना जाता था कि वातावरण में छोड़ा जाने वाला कार्बन डाइआक्साइड मौसम में आ रहे बदलावों का मुख्य कारण है।

बाघों की संख्या दोगुनी करने का संकल्प

बाघों की घटती संख्या पर चिंता

थाईलैंड में हाल ही में तेरह एशियाई देशों की एक बैठक में बाघों की लगातार घटती संख्या पर बेहद दुख जताया गया है। बैठक के दौरान संकल्प लिया कि 2022 तक बाघों की संख्या दुगुनी हो जानी चाहिए।

Sunday, January 31, 2010

अब तो अपने बाघों को बचाएं

पिछली शताब्‍दी के आरंभ में बाघों की आबादी करीब 40 हजार थी। अब उनमें से केवल 1411 भारत में बाकी बचे हैं। पिछले वर्ष भारत में 86 बाघों की जान गई। भारत में करीब 37 बाघ अभयारण्‍य हैं लेकिन इनमें से करीब 17 अब अपनी बाघों की आबादी को पूरी तरह खो चुकी हैं या खोने की कगार पर हैं।

Friday, June 05, 2009

उन्‍होंने पर्यावरण को बचा लिया

उन्‍हें यह भ्रम है कि पेड़ लगाए जाते हैं और मैं कोई पर्यावरण बचाओ आंदोलन चलाने वाला व्‍यक्ति हूं। अक्‍सर कहा जाता है "वृक्षारोपण कार्यक्रम" .... मुझे लगता है कि यह पौधरोपण कार्यक्रम है। पौधा लगाया जाता है न कि पेड़।

खैर... मैंने विनम्रता से मना कर दिया कि मैं उनके "पेड़ लगाने" के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सकता क्‍योंकि वे गांरटी नहीं दे पाए कि लगाए गए पौधों की रक्षा की जाएगी और वे पेड़ बनेंगे। मैं अपने लगाए पौधों को पेड़ बनाने के लिए उनकी रक्षा भी करता हूं।