Friday, May 16, 2008

खतरे की सूची में आया धुवीय भालू

अमेरिकी सरकार ने ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में डाला है और चेतावनी दी है कि उत्तर धु्रव [आर्कटिक] महासागर में बर्फ पिघलने के कारण वहां उनका आवास खतरे में है। बर्फ पिघलने के रिकार्ड किए गए अभी तक के निम्नतम स्तर से जुड़ीं तस्वीरें उपग्रह से मिलने के बाद गृह मंत्री डर्क केम्पथोर्न ने कहा कि आज मैं ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों के कानून [ईएसए] की सूची में डाल रहा हूं। सरकार, वैज्ञानिकों तथा अमेरिकी मत्स्य और वन्यप्राणी सेवा विभाग की सलाह पर कार्य कर रही है।


केम्पथोर्न ने कहा कि ईएसए के कानूनी मानकों ने ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में डालने को बाध्य किया है, लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस प्रजाति के कानून की सूची में दर्ज होने से विश्व में जलवायु परिवर्तन या समुद्र में बर्फ पिघलना नहीं रुकेगा। किसी भी बड़े निराकरण के लिए सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को कदम उठाना होंगे। केम्पथोर्न ने अलास्का और ब्यूफोर्ट सी के टापूओं में ध्रुवीय भालुओं पर नजर रखने के लिए बड़े कदम उठाने की बात कही है। उन्होंने विदेशी सरकारों से भी इस प्रजाति के बचाव के लिए सहयोग करने को कहा है।
विश्व में मौजूद कुल 25 000 ध्रुवीय भालुओं की संख्या में से दो तिहाई भालू कनाडा में हैं। इसके बाद भी वहां की सरकार ने इसे खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में नहीं डाला है। कनाडा की एक पैनल ने पिछले महीने वहां की सरकार से ध्रुवीय भालू को बचाने के लिए कदम उठाने का निवेदन किया था।
इस प्रजाति के प्रति विशेष चिंता जताई गई है लेकिन इसे विलुप्त होने की कगार पर नहीं बताया गया है। केम्पथोर्न ने हालांकि कहा कि अगर ऐहतियात के कदम नहीं उठाए गए तो धुव्रीय भालू के भविष्य में विलुप्ति की कगार पर पहुंचने की संभावना है।

धीरे-धीरे मरुस्थल में बदला था सहारा

एक नए शोध के अनुसार अफ्रीका का सहारा क्षेत्र लगातार हरियाली घटते जाने की वजह से करीब 2700 साल पहले विश्व के सबसे बड़े मरुस्थल में तब्दील हो गया। हालाँकि पहले की खोज में कहा जाता रहा है कि जलवायु में अचानक परिवर्तन होने से ऐसा हुआ था। उत्तरी अफ्रीका में स्थित सहारा करीब छह हजार साल पहले काफी हराभरा था और वहाँ पेड़ों की अच्छी संख्या थी। इसके अलावा वहाँ कई बड़ी झीलें भी हुआ करती थीं।


यूरोप, अमेरिका और कनाड़ा के वैज्ञानिकों के एक दल के शोध के अनुसार ऑस्ट्रेलिया से भी बड़े भाग में फैले सहारा में आबादी भी थी और पर्याप्त हरियाली भी। सहारा क्षेत्र में भौतिक बदलाव की कहानी का ब्यौरा देने वाले अधिकतर तत्व नष्ट हो चुके हैं लेकिन वैज्ञानिकों ने सहारा में मौजूद कुछ बड़ी झीलों में से एक योआ की विभिन्न परतों का अध्ययन किया। योआ उत्तरी चाड में स्थित है। वहाँ किए गए अध्ययन से नई जानकारी सामने आई जो पुरानी मान्यताओं के विपरीत है।


नए अध्ययन में शामिल वैज्ञानिक स्टीफन क्रोपलिन का कहना है कि ताजा तथ्य प्रचलित मान्यताओं के विपरीत है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार करीब 5500 साल पहले हरियाली में तेजी से कमी आने के कारण मरुस्थल का विस्तार हुआ और सहारा विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान बन गया। इसके पहले 2000 में कोलंबिया विश्वविद्यालय के पीटर दि मेनोकल द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार सहारा की जलवायु में तेजी से बदलाव हुआ था।


क्रोपलिन ने कहा कि योआ झील से मिले तथ्य विपरीत कहानी कहते हैं और सहारा के मरुस्थल में तब्दील होने में समय लगा। उन्होंने कहा कि मेनोकल के आँकड़े गलत नहीं हैं लेकिन उनकी गलत व्याख्या की गई।

Saturday, March 29, 2008

अंधेरे से उजाले की किरण

यह है सिडनी का प्रसिद्ध ओपेरा हाउस। रोशनी से जगमगाता (ऊपर) और अंधेरे में डूबा हुआ (नीचे)। ग्लोबल वार्मिग के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से शनिवार, 29 मार्च को आस्ट्रेलिया के इस सबसे महत्वपूर्ण शहर की सभी बत्तियां एक घंटे के लिए बुझा दी गई थीं। अंधकारमय भविष्य से दुनिया को आगाह करने के लिए अर्थ आवर कार्यक्रम के तहत 35 से ज्यादा देशों के लगभग 370 शहर शनिवार को एक घंटे के लिए अंधेरे में डूबे रहेंगे।

निरीह प्राणियों की हत्‍या का विरोध क्‍यों नहीं?


क्‍या यह चित्र कुछ कहता है? यह कैनेडा के सेंट लारेंस की खाड़ी में शुक्रवार 28 मार्च को एक हार्प सील को मारता एक शिकारी है। जीवों के खिलाफ हिंसा के चलते ऐसे अनेक निरीह प्राणी असमय काल के गाल में समा रहे हैं. कैनेडा और जापान जैसे कुछ देशों में यह क्रूर धंधा धड़ल्‍ले से जारी है. इन देशों की सरकारें अपने काम को जायज ठहराती हैं.

दरअसल, कनाडा में हर साल व्यवसायिक उपयोग के लिए काफी बड़े स्तर पर सीलों का शिकार किया जाता है। तमाम विरोधों के बावजूद कनाडा सरकार इस पर प्रतिबंध लगाने को तैयार नहीं है। हालांकि उसने घोषणा की है कि इस साल सिर्फ दो लाख 75 हजार सीलों को मारा जाएगा, लेकिन मानवीय तरीके से?

अब यह तो कनाडा सरकार ही जाने कि किसी जीव की हत्या मानवीय ढंग से कैसे की जा सकती है, वह भी व्यवसाय के लिए. जीवों की इस क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्‍या के खिलाफ विश्‍व समुदाय को आवाज उठाना होगी अन्‍यथा वह दिन दूर नहीं जब अंतिम जीव की हत्‍या होगी और तब हम उस विनाश को नहीं पाएंगे जो प्रकृति हमें दंडित करने के लिए करेगी.

Thursday, March 13, 2008

शहरीकरण का बोझ नहीं सह पाएगा धरती का पर्यावरण

चाहे शहरी चकाचौंध का आकर्षण हो या रोटी कमाने की मजबूरी लेकिन सच यह है कि दुनिया की करीब आधी आबादी शहरों में बसने लगी है। वातावरण में हर साल कार्बन डाईआक्साइड के रूप में घुलने वाले जहर की 80 फीसदी मात्रा इन्हीं लोगों की वजह से है। विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि धरती की जलवायु का हश्र इसी बात पर निर्भर करता है कि हम अपने शहरों को कैसे सजाते-संवारते हैं। वे यह भी कहते रहे हैं कि शहरों का भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि अगले 20 साल में शहरों पर लगातार बढ़ रहे बोझ को किस तरह नियंत्रित किया जाता है।

हम जैसों के लिए ज्‍यादा चिंता : भारत जैसे विकासशील देशों के संदर्भ में यह चेतावनी कुछ ज्यादा ही गंभीर है। वजह यह कि व‌र्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के मुताबिक विकासशील देशों में शहरी आबादी साढ़े तीन फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है, जबकि विकसित देशों में यह दर एक फीसदी से भी कम है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक अगले 20 सालों में शहरों की आबादी जितनी बढ़ेगी, उसका 95 फीसदी बोझ विकासशील देशों पर ही पड़ेगा। यानी 2030 तक विकासशील देशों में दो अरब और लोग शहरों में रहने लगेंगे।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अगर शहरों पर बढ़ रहे बोझ और प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो एक करोड़ से ज्यादा आबादी वाले बड़े शहरों पर भविष्य में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ जाएगा। दुनिया के ऐसे 21 बड़े शहरों में से 75 फीसदी विकासशील देशों में ही हैं। कुछ आंकड़ों के मुताबिक 2015 तक ऐसे 33 में से 27 शहर विकासशील देशों में होंगे।

बढ़ती संख्या, घटती सुविधाएं: शहरों पर ज्यों-ज्यों बोझ बढ़ रहा है, लोगों को मिलने वाली सुविधाएं घट रही हैं। बेहतर जिंदगी की चाह में लोग शहरों की ओर भागते हैं, लेकिन वास्तव में उन्हें मुसीबतें ही मिलती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक विकासशील देशों में 70 फीसदी से ज्यादा [करीब 90 करोड़] आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है। वर्ष 2020 तक यह संख्या दो अरब हो जाने का अनुमान है। ऐसे में जहां उनके लिए स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ती हैं, वहीं पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है।

प्रदूषण की कीमत: शहरों में विकास और बढ़ती जनसंख्या के चलते प्रदूषण भी खूब बढ़ रहा है। तेजी से विकास कर रहे चीन के खाते में दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 16 शहर हैं। प्रदूषण के चलते शहरों में हर साल करीब दस लाख लोग समय से पहले मर जाते हैं। इनमें ज्यादातर विकासशील देशों के ही होते हैं।

Sunday, February 24, 2008

प्रदूषण का एक घातक असर यह भी

अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार वायु प्रदूषण फेफड़ों के लिए ही नहीं बल्कि शुक्राणुओं के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है. नेशनल अकेडमी आफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित कनाडा में हुए इस अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण से न केवल शुक्राणुओं की संख्या घटती है बल्कि संबंधित डीएनए में होने वाले बदलाव के कारण आने वाली पीढि़यों में भी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

अध्ययन के तहत कैनेडा और अमेरिका के नेशनल सेंटर फार टाक्सीकोलोजीकल रिसर्च के अनुसंधानकर्ताओं ने दस हफ्तों तक चूहों पर हैमिल्टन हार्बर इलाके की प्रदूषित हवा का प्रभाव देखा. इस दौरान उन्होंने पाया कि स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषण झेलने वाले चूहों के शुक्राणुओं का डीएनए 60 फीसदी तक बदल गया.

वैज्ञानिक इस बात को लेकर भी हैरान थे कि प्रदूषण दूर किए जाने के बाद भी शुक्राणुओं में डीएनए संबंधी बदलाव जारी रहे. गौरतलब है कि ये परिणाम पहले हुए एक अध्ययन की पुष्टि करते हैं, जिसके अनुसार स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषित वातावरण में पलने वाले चूहों के बच्चों के डीएनए में दोगुने बदलाव देखे गये.

पर्यावरण संरक्षण के लिए आनलाइन सेवा

मोनाको। संयुक्त राष्ट्र ने धरती के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के उपायों पर सभी देशों के बीच विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाने के लक्ष्य से क्लाइमेट न्यूट्रल नेटवर्क शीर्षक से एक आनलाइन सेवा की शुरूआत की है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के विषय पर यहां आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के मौके पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम के अध्यक्ष आचिम स्टेनर ने इस सेवा का शुभारंभ करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण खासतौर पर ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के संबंध में विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाना है।

उन्होंने कहा कि इस सेवा का लाभ उन देशों को मिलेगा जो धरती के तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए प्रयासरत है और पूरी शिद्दत से इस दिशा में काम कर रहे हैं। बाली में गत वर्ष दिसंबर में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन के बाद मोनाको का यह सम्मेलन पर्यावरण के मुद्दे पर आयोजित दूसरा सबसे बड़ा सम्मेलन है जिसमें दुनिया के तकरीबन 154 देश और सैकड़ों पर्यावरण विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं।

सम्‍मेलन के मेजबान मोनाको ने इस मौके पर कहा कि वह यूएनईपी परियोजना के तहत कोस्टा रिका आईसलैंड, नार्वे और न्यूजीलैंड के समान ही ग्रीन हाउस गैसों में मानक कटौती के प्रयास करेगा। कार रैलियों के आयोजन के लिए पूरी दुनिया में विख्यात मोनाको ग्रीन हाउस गैसों का एक बड़ा उत्सर्जक देश माना जाता है लिहाजा इस बार उसने इन हानिकारक गैसों की कटौती के पहल के तहत यह प्रयास शुरू किए हैं।