अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार वायु प्रदूषण फेफड़ों के लिए ही नहीं बल्कि शुक्राणुओं के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है. नेशनल अकेडमी आफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित कनाडा में हुए इस अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण से न केवल शुक्राणुओं की संख्या घटती है बल्कि संबंधित डीएनए में होने वाले बदलाव के कारण आने वाली पीढि़यों में भी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.
अध्ययन के तहत कैनेडा और अमेरिका के नेशनल सेंटर फार टाक्सीकोलोजीकल रिसर्च के अनुसंधानकर्ताओं ने दस हफ्तों तक चूहों पर हैमिल्टन हार्बर इलाके की प्रदूषित हवा का प्रभाव देखा. इस दौरान उन्होंने पाया कि स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषण झेलने वाले चूहों के शुक्राणुओं का डीएनए 60 फीसदी तक बदल गया.
वैज्ञानिक इस बात को लेकर भी हैरान थे कि प्रदूषण दूर किए जाने के बाद भी शुक्राणुओं में डीएनए संबंधी बदलाव जारी रहे. गौरतलब है कि ये परिणाम पहले हुए एक अध्ययन की पुष्टि करते हैं, जिसके अनुसार स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषित वातावरण में पलने वाले चूहों के बच्चों के डीएनए में दोगुने बदलाव देखे गये.
रविवार, 24 फ़रवरी 2008
पर्यावरण संरक्षण के लिए आनलाइन सेवा
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के विषय पर यहां आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के मौके पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम के अध्यक्ष आचिम स्टेनर ने इस सेवा का शुभारंभ करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण खासतौर पर ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के संबंध में विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाना है।
उन्होंने कहा कि इस सेवा का लाभ उन देशों को मिलेगा जो धरती के तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए प्रयासरत है और पूरी शिद्दत से इस दिशा में काम कर रहे हैं। बाली में गत वर्ष दिसंबर में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन के बाद मोनाको का यह सम्मेलन पर्यावरण के मुद्दे पर आयोजित दूसरा सबसे बड़ा सम्मेलन है जिसमें दुनिया के तकरीबन 154 देश और सैकड़ों पर्यावरण विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं।
सम्मेलन के मेजबान मोनाको ने इस मौके पर कहा कि वह यूएनईपी परियोजना के तहत कोस्टा रिका आईसलैंड, नार्वे और न्यूजीलैंड के समान ही ग्रीन हाउस गैसों में मानक कटौती के प्रयास करेगा। कार रैलियों के आयोजन के लिए पूरी दुनिया में विख्यात मोनाको ग्रीन हाउस गैसों का एक बड़ा उत्सर्जक देश माना जाता है लिहाजा इस बार उसने इन हानिकारक गैसों की कटौती के पहल के तहत यह प्रयास शुरू किए हैं।
सुरा का सुरूर भी बदलेगी ग्लोबल वार्मिग

यह जानकारी सिर्फ इतना दर्शाने के लिए है कि ग्लोबल वार्मिंग का असर कितने व्यापक पैमाने पर हो रहा है. शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है और इस जानकारी का उद्देश्य इसका महिमा मंडन करना कतई नहीं है.
ग्लोबल वार्मिग का हाल यही रहा तो वाइन के सुरूर का तर्ज ही बदल जाएगा। वाइन उत्पादक दुनिया का नक्शा पलट जाएगा। ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। 'वाइन एंड क्लाइमेट चेंज' पर दूसरे अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस को संबोधित करते हुए फ्रांस के इनरा एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमुख बर्नार्ड सेगुइन का कहना था-जिन अंगूरों से वाइन बनती है, उनकी फसल ग्लोबल वार्मिग के कारण दस दिन पहले ही तैयार होने लगी है। इसका खामियाजा वाइन और उसके उत्पादन पर पड़ना तय है।
इस कांग्रेस में स्पेन, फ्रांस, अमेरिका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया सहित 36 देशों के 350 से ज्यादा विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे थे। इसका समापन हुआ शनिवार को अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति अलगोर के संबोधन से। सेगुइन का कहना था-अगर तापमान दो या तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो हम बोर्डीआक्स, रियोजा और बरगुंडी जैसी वाइन की गुणवत्ता को बचाए रखने का उपाय कर सकते हैं। लेकिन अगर तापमान में वृद्धि पांच से छह डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई तो वाइन उद्योग को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ जाएगा।
स्पेन के फर्नाडो जमोरा का कहना था कि अधिक गर्मी और वर्षा के अभाव में समय से पहले पक जाने पर अंगूर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। अगर अंगूर जल्दी पक जाते हैं तो उनके शर्करा ज्यादा गाढ़ा जाता है। अम्लीयता कम हो जाती है और पीएच स्तर भी बढ़ जाता है। ऐसे अंगूर से बनी वाइन में अल्कोहल का स्तर ज्यादा और अम्लीयता कम होती, नतीजतन कड़वाहट बढ़ जाती है।
शनिवार, 23 फ़रवरी 2008
पानी गर्म होने से सब नष्ट होगा... अंटार्कटिक
दूसरा व अंतिम भाग। इस लेख का पहला भाग यहां पढ़ें
ग्लोबल वार्मिग अगर ऐसे ही बरकरार रही तो अंटार्कटिका का समुद्री जीवन शार्क, केकड़ों और अन्य परभक्षियों के आक्रमण से बर्बाद हो जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार जैसे-जैसे अंटार्कटिका के वातावरण का तापमान बढ़ रहा है, शार्क वहां पहुंचती जा रही हैं। प्रोफेसर कैरिल विल्गा के अनुसार हालांकि शार्क की रफ्तार केकड़ों की तुलना में कुछ धीमी ही है। केकड़े तेजी से वहां की ओर बढ़ रहे हैं। वे वहां पहुंचने में सफल हुए नहीं कि वहां पाए जाने वाले जीवों को चट करना आरंभ कर देंगे।
अमेरिका में रोड आइलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विल्गा उस अंतरराष्ट्रीय दल के प्रमुख हैं जो इस समय इस महाद्वीप पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है। अंटार्कटिका के समुद्र की तलहटी में पाए जाने वाले कई जीव-जंतु पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अनोखे जीवों में शामिल हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार जो जातियां वहां पाई जाती हैं, उनकी आबादी के अनुपात में शार्क और अन्य बड़ी मछलियों के वहां जाने से आमूलचूल परिवर्तन आएगा। ब्रिटेन में साउथेंप्टन विश्वविद्यालय स्थित नेशनल ओशियानोग्राफी सेंटर के डाक्टर स्वेन थैट्जी कहते हैं कि अंटार्कटिका के उथले पानी में रहने वाले जंतु धरती पर अनोखे हैं क्योंकि लाखों वर्षो में उन्होंने बहुत ही ठंडे पानी में विकास किया है।
अंटार्कटिका में शीत की प्रक्रिया चार करोड़ वर्ष पहले आरंभ हुई थी। इसकी वजह से सभी विशालकाय परभक्षी जैसे शार्क और केकड़े वहां से चले गए। ये इतने ठंडे वातावरण में नहीं रह सके थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि तुरंत स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयास नहीं किए गए तो दुनिया में आखिरी बचे इस मूल वातावरण को कायम रखना असंभव हो जाएगा। अल्बामा में डफिन आइलैंड सी लैबोरेटरी के डाक्टर रिचर्ड अरोनसन के मुताबिक अब हमें अंटार्कटिका में कार्रवाई करनी ही पड़ेगी।
शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008
गर्म हो रहा है अंटार्कटिक का जल
अंटार्कटिक के जल का तापमान बढ़ रहा है और साथ ही समुद्र का जल स्तर भी ऊंचा हो रहा है। दक्षिणी महासागर के तापमान में बदलाव के रिकार्ड का अध्ययन करने पर यह बात सामने आई है। अंटार्कटिक क्षेत्र में आस्ट्रेलिया, फ्रांस और अमेरिका के संयुक्त कार्यक्रम के तहत पिछले 15 साल के आंकड़े एकत्रित किए गए जिसके बाद आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने हाल ही में यह बात कही। कार्यक्रम में आस्ट्रेलियाई दल का नेतृत्व करने वाले स्टीव रिनटाउल ने कहा कि प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक अंटार्कटिक जल की प्रवृत्ति का अध्ययन कर सकेंगे। वह यह भी बता सकेंगे कि इसका वैश्विक जलवायु पर क्या असर पड़ सकता है।विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक जो आंकड़े उन्हें मिले हैं उनके अनुसार अंटार्कटिक का तापमान बढ़ रहा है। विशेष रूप से समुद्र के ऊपरी भाग में तापमान में खासी बढ़ोतरी हुई है। दुनिया भर में समुद्र के जल का तापमान बढ़ रहा है। बहरहाल हाल के अध्ययन से अब यह भी साबित हो गया है कि दक्षिणी महासागर की गहराई में भी तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। दक्षिणी महासागर में तापमान में जो परिवर्तन हो रहा है वह दुनिया के अन्य भागों के मुकाबले कम है। लेकिन महासागर गर्मी को जमा करते जा रहे हैं जो ठीक नहीं है।
उन्होंने कहा कि इसका मतलब है दक्षिणी महासागर में तापमान बढ़ता जा रहा है। इसका प्रभाव समुद्र के जल स्तर पर भी पड़ेगा क्योंकि गर्म जल का विस्तार होता है और इसके साथ समुद्र का जल स्तर भी बढ़ता है। जिस क्षेत्र में यह कार्यक्रम चलाया गया वहां पिछले करीब एक दशक में समुद्र का जल स्तर तीन सेंटीमीटर बढ़ गया है।
इस विषय पर और जानकारी अगले भाग में पढ़ें
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