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मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

फैशन जगत में अब इको फ्रैंडली कपड़े

फैशन जगत में अब इको फ्रैंडली कपड़ों का दबदबा बढ़ने लगा है। दुनिया भर के फैशन डिजाइनरों का ध्यान अब इको फ्रैंडली कपड़ों की ओर लगा है। लॉस एंजिल्स से लेकर टोरंटो तक आयोजित फैशन शो में इको फ्रैंडली कपड़ों का प्रदर्शन जोर-शोर से किया जा रहा है। पिछले साल लॉस एंजिल्स में आयोजित मर्सिडिज बेंज फैशन वीक के दौरान पर्यावरण हितैषी कपड़ों का बोलबाला रहा। इसमें भाग लेने वाले तमाम फैशन डिजाइनर्स ने अपने लेटेस्ट ट्रेंड में इको फ्रैंडली कपड़ों पर जोर दिया।

फैशन डिजाइनरों का कहना है कि ऐसे कपड़े न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में मददगार होते हैं, बल्कि सेक्सी लुक भी देते हैं। इस फैशन शो की थीम भी 'द ग्रीन इनिशिएटिव' रखी गई थी। कनाडा के एक फैशन मॉल में भी इन दिनों ग्रीन फैशन का बोलबाला है। सभी बड़े फैशन मॉल में सिंथेटिक कपड़ों की जगह पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने वाले कपड़े नजर आ रहे हैं।

फैशन डिजाइनर और स्टोर मालिक भी लोगों की भारी माँग को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए तमाम फेब्रिक कंपनियों ने वर्ष 2008 के लिए नई स्टाइल और लुक वाले कपड़े और उनके साथ की एक्सेसरीज लांच करने की तैयारी पूरी कर ली है। इनमें कपड़ों के मटेरियल से लेकर रंगों तक में जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है।

ऑर्गनिक ट्रेड एसोसिएशन (ओटीए) का कहना है कि आगामी तीन वर्षों में जैविक कपड़ों के बाजार में जबर्दस्त उछाल आने की संभावना है। वर्ष 2006 की ही बात करें तो इस वर्ष 2005 की तुलना में अमेरिका में 160 मिलियन डॉलर का मुनाफा हुआ। एसोसिएशन ने अनुमान लगाया है कि जैविक कपड़ों का बाजार आगामी तीन वर्षों में 116 फीसदी प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ेगा।

टोरंटो की फैशन डिजाइनर एनी थॉम्पसन कहती हैं कि इको फ्रैंडली कपड़ों का बाजार गर्म हो रहा है। लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में इको फ्रैंडली कपड़ों की रेंज लोगों को काफी पसंद आ रही है। एनी ने अपनी नई रेंज तैयार करने में केमिकल का अत्यंत कम उपयोग किया है। उन्होंने ज्यादातर बाँस, वाइल्ड सिल्क, फूलों के फर, सोया और अन्य जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया है। उनका यह कलेक्शन संभवतः अगले महीने तक बाजार में छा जाएगा।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2008

कार है ग्‍लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण

वैज्ञानिकों के एक शोध के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण परिवहन साधन हैं। इनमें कार सबसे ज्यादा है। कार के बाद ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने का दूसरा कारण विमानन क्षेत्र है। परंतु पानी के जहाज का मामला बेहद जटिल है। एनवायरमेंटल न्यूज नेटवर्क की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीआईसीईआरओ (सेंटर फॉर इंटरनेशनल क्लाइमेट एंड एनवायरमेंटल रिसर्च) के पाँच शोधकर्ता ने यह शोध किया है। इन्होंने परिवहन क्षेत्र को चार उपक्षेत्रों में बाँटा। इनमें स़ड़क परिवहन, उड्डयन, रेल और जहाजरानी हैं।

शोध करने वाले दल ने प्रत्येक उपक्षेत्र का ग्लोबल वार्मिंग में योगदान को आँका। इसके लिए रेडिएटिव फोर्स (आरएफ) को देखा, जो गाड़ियों से निकलने वाले धुएँ से होता है। अध्ययन का नतीजा यह निकला कि औद्योगिकीकरण के पहले से 15 प्रतिशत आरएफ मानव निर्मित कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन से होता है। परिवहन क्षेत्र इसकी जड़ है।

ओजोन के लिए परिवहन को 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार माना जा सकता है। अध्ययन कहता है कि ज्यादा से ज्यादा ध्यान तेजी से बन रही सड़कों की ओर भी दिया जाना चाहिए। अकेले कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन में सड़क यातायात ने दो-तिहाई योगदान दिया है। अगले सौ साल में यह स्थिति और बिगड़ती जाएगी। यानी सड़क यातायात का योगदान ग्लोबल वार्मिंग में तेजी से बढ़ेगा।

जहाँ तक पानी के जहाजों की बात है तो स्थिति और जटिल है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि जहाजों से ज्यादा नुकसान नहीं होता। कारण जहाजों से सल्फर डायऑक्साइड और नाइट्रोजन उत्सर्जित होती है। इनका असर ठंडा होता है। चूँकि ये गैसें ज्यादा समय तक वातावरण में नहीं रहती हैं और आने वाले समय में कार्बन डायऑक्साइड इसका असर खत्म कर देगी।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

सन् 2007 में 3 लाख 30 हजार टन... लेकिन क्‍या?

मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन फॉर इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी (एमएआईटी) की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2007 में भारत में 3 लाख 30 हजार टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकला, जिसमें से केवल 19 हजार टन को रिसाइकल किया जा सका। रिपोर्ट में बताया गया है कि केवल टेलीविजन और कम्प्यूटर से 56,324 टन कचरा निकला, जिसमें से केवल 12 हजार टन को ही प्रोसेस किया गया। बाकी कचरा पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन रहा है।

एचसीएल इंफोसिस्टम्स के कार्यकारी उपाध्यक्ष जॉर्ज पॉल कहते हैं कि भारत में बड़े पैमाने पर रिसाइकल प्लांट की जरूरत है जिसमें सरकार को सहयोग करना चाहिए।एक अध्ययन के मुताबिक चीन और जापान में इलेक्ट्रॉनिक कचरा गंभीर परेशानी का कारण बनता जा रहा है। भारत की अपेक्षा उन देशों में अत्यधिक मात्रा में ई-वेस्ट निकलता है। प्रोसेस की प्रक्रिया तेज होने के बावजूद वहाँ ई-वेस्ट का समुचित निपटारा नहीं हो पाता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों में कई खतरनाक रसायन होते हैं जो स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। जागरूकता की कमी और नष्ट करने की मुश्किल प्रक्रिया के कारण भारत में ई-वेस्ट को रिसाइकल करने का कोई भी प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है।

सच्‍चई यह है कि इलेक्ट्रॉनिक चीजों का बाजार जिस तेजी से बढ़ रहा है उतनी तेजी से इलेक्ट्रॉनिक कचरे को नष्ट करने का काम नहीं हो पा रहा है। अब यही इलेक्ट्रॉनिक कचरा न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए मुसीबत का कारण और बीमारियों का घर बनता जा रहा है।


नईदुनिया से साभार

दुनिया के सबसे नए प्राणी की खोज

वैज्ञानिकों ने तंज़ानिया के पहाड़ियों में एक नए स्तनधारी जीव की खोज की है जो चूहे की शक्ल का है. इस नए अनोखे प्राणी को 'रिनोकोस्यॉन उडज़ुंग्वेंसिस' नाम दिया गया है. इसे अफ़्रीका में पाए जाने वाले चूहे जैसे प्राणी 'एलिफैंट श्रियू' की ही एक नस्ल माना जा रहा है जिसके पैर लंबे होते हैं और जिसका मुँह निकला हुआ होता है.

'ज़ूलॉजी' पत्रिका में इस प्राणी की खोज की ख़बर छापी गई है. बिल्ली के आकार के इस जीव को छोटे हिरन और चींटी खाने वाले दंतविहीन प्राणियों के बीच की संकर प्रजाति माना जा रहा है. इसका चेहरा स्लेटी रंग का और थूथन लंबा और लचकदार है. पीले और भूरे रंग वाले इस जीव की टांगें नुकीली हैं.


शोध की पुष्टि करने वाले कैलीफोर्निया अकादमी ऑफ साइंस के डॉक्टर ग्लेन रथबन ने कहा, “यह मेरे अब तक के करियर की सबसे रोमांचक खोजों में से एक है. एलिफैंट श्रियू केवल अफ़्रीका में पाए जाते हैं. ये नाम इसलिए रखा गया क्योंकि इनका ऊपरी हिस्सा अमरीका और यूरोप के श्रियू से मिलता जुलता है." वास्तव में इस प्राणी का संबंध दस करोड़ साल पहले के अफ़्रीकी स्तनधारियों के समूह से माना जा रहा है.

इस नई प्रजाति को सबसे पहले वर्ष 2005 में तंज़ानिया में डुंडुलु जंगलों की उडज़ुंगवा पहाड़ियों पर फ़िल्माए दृश्यों में देखा गया था. ये फ़िल्म इटली में ट्रेन्टो म्युज़ियम ऑफ नेचुरल साइंस के फ़्रैंसेस्को रोवरो ने बनाई थी. डॉक्टर रथबन ने कहा, “जब मैंने ये तस्वीरे देखी तो मुझे सब नया लगा लेकिन केवल तस्वीरों के आधार पर कुछ कहना मुमकिन नहीं था. फिर मार्च 2006 में हम वहाँ दोबारा गए और कुछ नमूने लिए.”


वैज्ञानिकों का कहना है अभी रिनोकोस्यॉन उडज़ुंग्वेंसिस नामक इस प्राणी के बारे में काफ़ी कुछ जानना बाक़ी है लेकिन उनका मानना है कि आगे शोध में इस तरह के जानवरों और उनके रहन-सहन के बारे में जानने को मिलेगा. तंज़ानिया की उडज़ुंगवा पहाड़ियों में जैव विविधता से भरी पड़ी है. इस नई प्रजाति के अलांवा बंदर की नई प्रजाति किपुंजी भी वहीं पाई गई थी.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008

क्‍यों बदल रहा है मौसम इस तरह?

चीन के दक्षिणी इलाकों में पिछले 50 सालों के बाद पहली बार भयंकर बर्फ पड़ी है. इस तूफान के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए हैं. तूफान की चपेट में आने से 60 लोगों की मौत हो चुकी है. इस बर्फीले तूफान से पर्यावरण वैज्ञानिक हैरत में पड़ गए हैं. एक ओर वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का नतीजा मान रहे है, वहीं दूसरी तरफ उनका यह भी कहना है कि यह तूफान जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं आया है.

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक लॉ नीना वैदर पैर्टन के इस तूफान के कारण मौसम का असामान्य व्यवहार है. इसे जलवायु परिवर्तन के कारण मानना जल्दबाजी होगा. ऐसा एक दशक बाद या कई सालों में दुनिया के किसी भी देश में हो सकता है. यह प्राकृतिक है लेकिन ऐसे बर्फीले तूफान या मौसम की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती.

इसी प्रकार उत्तरी इस्राइल के पहाड़ी इलाकों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है. तेल अवीव और यरुशलम के बीच राजमार्ग को बंद कर दिया गया है. यरुशलम और पहाड़ी क्षेत्रों में कई इंच तक बर्फ जम गई है. बर्फबारी और ठंड के कारण स्कूल और दुकानों को बंद करने के आदेश दे दिए गए हैं. हालांकि यरुशलम में साल में एक बार बर्फबारी होती रही है और वैज्ञानिक इसे सामान्य घटना मान रहे हैं.

इसके बावजूद यह तथ्‍य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि सारी दुनिया में मौसम का चक्र परिवर्तित हो रहा है और यह केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं है. इसके पीछे बहुत हद तक मानवजनित कारण भी हैं और वैज्ञानिकों का इस मुद्दे पर एकमत नहीं होना भी कहीं न कहीं यह दर्शाता है कि इन अनोखी घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन का हाथ भी है.


चित्र में सफेद चट्टानों की शक्ल में नजर आ रही बर्फ चीन के जिनान में हवांग हो नदी का हिस्सा हैं. शानडांग प्रांत के जिनान सहित करीब छह सौ किलोमीटर में निरंतर गिरते तापमान के कारण हवांग हो नदी पिछले दिनों पूरी तरह जम गई. इस नदी को यलो रिवर भी कहा जाता है.