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बुधवार, 5 दिसंबर 2007

खतरे में है अफ्रीका की सबसे बड़ी झील

पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी झील का अस्तित्व खतरे में है. विक्टोरिया झील के निरीक्षण के बाद विशेषज्ञों ने यह राय दी है. झील का उपयोग कारों और ट्रकों की सफाई के लिए किया जा रहा है. इससे झील का पानी और प्रदूषित हो गया है. झील में जलकुंभियों की भरमार है, जिससे मछलियां भी कम होती जा रही है.

पर्यावरण वैज्ञानिकों और विक्टोरिया झील के किनारे रहने वाले लोगों का मानना है कि यदि जल्द इस झील को बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो झील को पूरी तरह से खत्म होने से नहीं रोका जा सकता है. विक्टोरिया झील के पास के एक गांव के पर्यावरण वैज्ञानिक एरिक ओडाडा ने कहा कि यह झील पहले भी तीन बार सूख चुकी है, लेकिन इस बार यह खतरा मनुष्य द्वारा पैदा की गई स्थितियों के कारण अधिक चिंताजनक बन गया है.

आसपास के गांवों में जंगल की कटाई और झील में मिलने वाली दर्जनों नदियों के कारण उत्पन्न गाद से झील को काफी नुकसान हो रहा है. पिछले सौ सालों में जलस्तर 120 मीटर से घटकर 40 मीटर रह गया है. 15 वर्षो से झील के सहारे मछली का कारोबार करने वाले ज्योफ्री ओब्योर ने कहा कि यदि यह सब जारी रहा तो झील पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से निर्भर रहने वाले लाखों लोगों की रोजी-रोटी खतरे में पड़ जाएगी.

मंगलवार, 4 दिसंबर 2007

मानव के सर्वश्रेष्‍ठ होने का भ्रम

लंबे समय से यह धारणा चली आ रही थी कि चीजों को ग्रहण करने और उसे जानने समझने के मामले में मानव सभी प्राणियों से आगे है. हाल के एक अनुसंधान में यह तथ्य उभर कर आया है कि नन्हे चिंपैंजी याद्दाश्त के मामले में हमें आसानी से पछाड़ सकते हैं. मजे की बात यह है कि अदना से दिखने वाले इन चिंपैंजी की याद्दाश्त का मामला सिर्फ पेड़-पौधों या जंगलों से जुड़ा हुआ नहीं है. वे ज्ञान के क्षेत्र में और गिनती याद रखने तक में भी मनुष्यों से आगे हैं.

जापानी वैज्ञानिकों ने अपने एक अध्ययन में पाया कि गिनती याद करने और उन्हें दोहराने के मामले में नन्हे चिंपैंजियों में वयस्क मानवों से कहीं ज्यादा और विलक्षण गुण होता है. क्योटो यूनिवर्सिटी के तेत्सूरो मात्सुजावा ने जापानी वैज्ञानिकों के इस ऐतिहासिक अध्ययन के निष्कर्षो के महत्व को रेखांकित किया है. उनका कहना है कि अब भी बहुत सारे लोग और अनेक जीव वैज्ञानिक मानते हैं कि मानव तमाम बोधात्मक क्रियाओं में चिंपैंजी से आगे हैं.

इस अनुसंधान के निष्कर्ष करेंट बायोलोजी में प्रकाशित किए गए हैं. निष्कषों में कहा गया है कि कोई इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता है कि चिंपैंजी पांच साल की उम्र में नन्हे चिंपैंजी याद्दाश्त के परीक्षण में आदमियों से अच्छा प्रदर्शन करेंगे. अनुसंधान में कहा गया है कि यहां हमने पहली बार प्रदर्शित किया है कि समान प्रक्रिया अपनाते हुए समान उपकरण से परीक्षण करने पर नन्हे चिंपैंजी में संख्यात्मक याद्दाश्त वयस्क मानव से ज्यादा होती है. उनमें विलक्षण कार्यकारी स्मृति क्षमता होती है.

मातृत्व से गुजर चुकी मादा चिंपैंजियों में अय पहली चिंपैंजी थी जिसने उचित अंकों से वास्तविक जीवन की वस्तुओं को लेबल करने के लिए अरबी अंकों का इस्तेमाल करना सीखा था. इस बार संपन्न नए परीक्षण में चिंपैंजियों या मानवों को टच-स्क्रीन की मदद से एक से ले कर नौ तक विभिन्न अंकों को पेश किया गया. इसके बाद इन अंकों को खाली वर्गो से बदल दिया गया. परीक्षण में हिस्सा ले रहे मानवों और चिंपैंजियों को यह याद रखना था कि अंक किन स्थलों पर आए थे. उन्हें उन वर्गो को उचित क्रम में छूना था.

अध्ययन में पाया गया कि नन्हे चिंपैंजी एक निगाह में अनेक अंक याद रख सकते हैं. उनकी ग्राह्य शक्ति इतनी पैनी है कि अगर उन अंकों को 210 मिली सेकेंड के लिए फ्लैश किया जाता है तो भी उन्हें याद रहता है. उनके प्रदर्शन में कोई परिवर्तन नहीं आता है. उल्लेखनीय है कि हमें मोटे तौर पर अपनी पलकें झपकाने में करीब 105 मिलीसेकेंड का समय लगता है. अनुसंधानकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि 210 मिलीसेकेंड इतना पर्याप्त समय नहीं है जिसमें मानव दृष्टि स्क्रीन का चक्कर लगाए.

अध्ययन में पाया गया कि कुल मिला कर तीन नन्हे चिंपैंजियों का प्रदर्शन अपनी मांओं से बेहतर है. तीनों नन्हे चिंपैंजी प्रदर्शन के मामले में वयस्क मानवों से भी बाजी मार ले गए. वयस्क मानवों का प्रदर्शन तीनों ही चिंपैंजियों से खराब था. वे रिस्पांस देने में ज्यादा सुस्त रहे. मात्सुजवा ने मानव के मुकाबले चिंपैंजियों के बेहतर प्रदर्शन की जटिल गुत्थी सुलझाने के प्रयास के तहत कहा कि चिंपैंजियों में किसी जटिल दृश्य या पैटर्न की विस्तृत एवं सटीक छवि को याद रखने की विशेष क्षमता होती है. उन्होंने कहा कि इस तरह की फोटोग्राफिक याददाश्त मानव के कुछ सामान्य बच्चों में भी होती है. फिर उम्र के साथ घटती जाती है.

सोमवार, 3 दिसंबर 2007

तो आपका जन्‍म किस मौसम में हुआ?

वैज्ञानिकों को आपने शायद ही कभी ऐसी बातें करते सुना हो, लेकिन ये सच है कि सितारों से नहीं बल्कि इस बात से आपका व्यक्तित्व और स्वास्थ्य तय होता है कि आप किस मौसम में पैदा हुए हैं. संडे टेलीग्राफ ने अपनी रिपोर्ट में यूरोप के एक शोधकर्ता दल की रिपोर्ट प्रकाशित की है जिसमें पाया गया है कि भाग्य का पहिया सितारों से नहीं घूमता बल्कि यह जालिम मौसम का कमाल होता है, जो लोगों के व्यक्तित्व के विभिन्न पहुलओं को संचालित करता है.

शोध के अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में मई महीने में पैदा होने वाली महिलाएँ अधिक मनोवेगी व्यवहार करती हैं जबकि जिनका जन्म नवंबर में होता है वे अधिक बहिर्मुखी होती हैं. इसी प्रकार वसंत ऋतु में पैदा होने वाले पुरुष सर्दियों में पैदा हुए पुरुषों के मुकाबले अधिक दृढ़ विचारों के होते हैं. रिपोर्ट कहती है कि पतझड़ में पैदा होने वाले लोग शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय होते हैं और फुटबॉल जैसे खेल में कमाल दिखाते हैं जबकि वसंत ऋतु में पैदा होने वालों का रुझान शतरंज जैसे खेलों की ओर अधिक होता है. सितंबर और दिसंबर के बीच पैदा होने वाले लोग मानसिक रूप से अधिक आतंकित रहते हैं जबकि इस बात के ठोस सबूत हैं कि जाती सर्दी और आते वसंत में पैदा हुए लोग शिजोफ्रेनिया के अधिक शिकार होते हैं.

हार्टफोर्डशायर यूनिवर्सिटी के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर रिचर्ड वाइजमैन के हवाले से दैनिक ने लिखा है यह एकदम से कुछ वैसा ही है जैसा आप मौसम के तापमान के संबंध में उम्मीद लगाते हैं. मौसम संबंधी कई सारे प्रभाव दोनों गोलार्द्ध में उलटे हो जाते हैं. एक अन्य शोधकर्ता तथा एबरदीन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन ईगल कहते हैं किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व को परिभाषित करने में मुख्य दोष आहार तथा पोषण में मौसमी उतार-चढ़ाव तथा सर्दियों में होने वाले संक्रमण का होता है. यहाँ आनुवंशिक तथा अन्य पर्यावरणीय कारण भी भूमिका अदा करते हैं. इसलिए मौसम की पैदाइश एक सहायक कारक है.

लोगों का भविष्य बताने वाले हालाँकि इन चीजों को नहीं मानते और वे इसी तथ्य से प्रभावित हैं कि किसी व्यक्ति विशेष का व्यक्तित्व सितारों से प्रभावित होता है. इसके तर्क में वे उन लाखों लोगों का उदाहरण देते हैं जो रोजाना अपना भविष्यफल देखते हैं. लेकिन शोधकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि इन प्रभावों के पीछे कुछ मूलभूत जैविकीय कारण जिम्मेदार हैं न कि सितारों या ग्रहों की गति.

स्वीडन की यूमेया यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जयंती छोटाई के अनुसार गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला के शरीर द्वारा पैदा किए गए संवेदनशील हार्मोन्स का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चा किस मौसम में पैदा हुआ है और यही स्तर गर्भावस्था के समय से ही शिशु के व्यक्तित्व को आकार देना शुरू कर देता है.

प्रोफेसर छोटाई कहती हैं कि तापमान, संक्रमण, रौशनी, जीवनशैली में परिवर्तन तथा पोषण ये सभी चीजें मौसम पर निर्भर करती हैं और इसी से ऐसा समझा जाता है कि हार्मोन्स प्रभावित होते हैं. ये विभिन्नता हमारी सौर प्रणाली में आने वाले मौसमी बदलाव से समझी जा सकती हैं. उदाहरण के लिए सर्दियों में सूरज की रोशनी कम रहती है और तापमान में गिरावट आती है. ऐसे मौसम में विषाणुओं का संक्रमण अधिक फैलता है.

रविवार, 2 दिसंबर 2007

आइए फिर याद करें भोपाल गैस त्रासदी

तेईस साल गुजर गए. मानव इतिहास की सबसे क्रूरतम् औद्योगिक दुर्घटना यानि भोपाल गैस त्रासदी को याद करने का समय एक बार फिर आ चुका है. कुछ रस्‍मी विरोध प्रदर्शन होंगे, कुछ आंसू बहाए जाएंगे और फिर जिंदगी आगे बढ़ जाएगी. लेकिन उन हजारों लोगों का जीवन उस काली रात के बाद हमेशा के लिए बदल चुका है जिनके अपने इस त्रासदी की भेट चढे थे. दुर्भाग्‍य यह है कि आज भी हजारों लोग ऐसे हैं जो गैस के दुष्‍प्रभावों के कारण नारकीय जीवन जीने को विवश हैं.

आंकड़ों की बात करने का अब कोई औचित्‍य नहीं है. लेकिन आइए आज फिर देखते हैं मौत के उस खेल से जुड़े कुछ वीभत्‍स आंकड़े. ग्रीनपीस के आंकड़े कहते हैं करीब 8 हजार लोग तभी मारे गए थे. उसके बाद से अब तक करीब 25 हजार से ज्‍यादा मौतें हो चुकी हैं. हर माह 10 से 15 लोग आज भी गैस के दुष्‍प्रभावों से उपजी विकृतियों का शिकार होकर मौत के मुंह में चले जाते हैं. करीब 5 लाख लोग गैस के दुष्‍प्रभावों का शिकार किसी न किसी रूप में हुए थे. करीब 1.5 लाख बच्‍चे गैस से प्रभावित माता पिता की संतानों के रूप में जन्‍म लेने के बाद स्‍थाई यप से स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी समस्‍याओं का सामना कर रहे हैं.

गैस पीडितों को मुआवजा बंट गया, वारैन एंडरसन आज भी स्‍वतंत्र घूम रहा है और भोपाल इस जघन्‍य त्रासदी की रुला देने वाली दु:स्‍मृतियों को बोझ अपने सीने पर ढोने को वि‍वश है. लेकिन सबसे अहम् सवाल यह है कि हमने इस त्रासदी से क्‍या सीखा? क्‍या हमने ऐसी दुर्घटना फिर कभी ना हो, यह सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रयास किए ? जवाब बहुत खराब है..... नहीं.

औद्योगिकीकरण की अंधी रफ्तार अब और तेज हो चुकी है और यह गारंटी कोई नहीं दे सकता कि ऐसा फिर नहीं होगा. यूनियन कार्बाइड की बंद पड़ी उस मानवभक्षी फैक्‍ट्री के खंडहरों में अब भी जहरीले रसायन पड़े हैं, जिन्‍हें हटाने को लेकर यदा कदा आवाज उठती है लेकिन राजनीति शुरू हो जाती है और कुछ नहीं हो पाता.

यदि हम ऐसी घटनाओं से सबक नहीं सीख सकते तो कुछ भी हमारी चेतना को जाग्रत करने में सक्षम नहीं है. पर्यावरण का विनाश अंतत: मानवीय जीवन के विनाश का कारण साबित होगा. भोपाल की जगह कोई और शहर होगा, यूनियन कार्बाइड की जगह कोई और कंपनी होगी लेकिन मरेंगे वहां भी इंसान ही. बस उनके नाम बदल जाएंगे. प्रकृति का आर्तनाद् सुनिए, यह पर्यानाद् है.... अपने बच्‍चों की खातिर, अपनी खातिर पर्यावरण का विनाश रोकिए.

शनिवार, 1 दिसंबर 2007

शायद उसकी जान नहीं बच पाई

यह सच्ची घटना कल शुक्रवार 30 नवंबर की शाम को हुई. मैं और मेरा एक मित्र अपने अपने दोपहिया वाहनों पर सवार हो‍कर कहीं जा रहे थे. शहर के बीचों-बीच एक बेहद व्‍यस्‍त मार्ग पर हमेशा की तरह भयंकर ट्रैफिक जाम लगा देख कर मूड ऑफ हो गया. वाहनों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा था और उस नीम अंधेरे में अंडर ब्रिज के ठीक पहले सारा ट्रैफिक थम सा गया था. धीरे-धीरे अपने छोटे से दो पहिये को लुढ़काते हुए जब मैं ट्रैफिक जाम के बीच पहुंचा तो माजरा देख कर दिल को बड़ी चोट पहुंची.

वह सड़क के बीचों-बीच अधमरी सी हालत में पड़ा था. वाहन चालक बड़बड़ा रहे थे लेकिन कोई उसकी सहायता के बारे में कुछ नहीं सोच रहा था. सब एक दूसरे को कोसते हुए किसी भी तरह उसके अगल-बगल से आगे निकलने की कोशिश में लगे थे. मै किसी तरह अपना वाहन लेकर उसके पास पहंचा और सबसे पहला काम मैने अपने दोपहिए को उसके सामने आड़ा खड़ा कर एक तरफ का ट्रैफिक रोकने का किया. इस बीच मेरा दोस्‍त अपने वाहन पर आगे निकल गया.

हालत बड़ी विकट थी. मैं उसके पास पहंचा और झुक कर देखने का प्रयास किया कि वह जीवित था या नहीं .... धीरे से हाथ लगा कर उसे छुआ तो उसके शरीर में हल्‍की सी जुंबिश हुई. अचानक लोगों का जमावड़ा इकट्ठा होने लगा. एक सज्‍जन बोले, मर गया है.... दूसरे बोले कमर टूट गई है... मैं सोच रहा था कि क्‍या करूं ? जहां जाने के लिए निकला था, वहां पहुंचना भी जरूरी था. लेकिन में उसे सड़क पर इस तरह छोड़ कर भी नहीं जा सकता था.

ट्रैफिक बुरी तरह जाम हो चुका था और पब्लिक मुझसे कुछ करने की उम्‍मीद कर रही थी. यह सब कुछ केवल दो या तीन मिनट के अंदर हो गया... मैंने सोचा कि अब उसे उठाना ही होगा. पिछले हिस्‍से को धीरे से पकड़ा, उठाया ... सड़क पार की बगल में गहरे नाले के किनारे बने बगीचे की बाड़ के अंदर हाथ डाल कर उसे धीरे से छोड़ दिया. ट्रैफिक चल पड़ा किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा और मैं भी अपना वाहन उठा कर आगे बढ़ गया.

लेकिन मेरा मन अब भी मुझे कचोट रहा है. मुझे नहीं मालुम कि वह जीवित बचा या नहीं, मुझे उस समय जो सही लगा मैने कर दिया. लेकिन मन बार-बार कह रहा है कि मुझे उसकी सुरक्षा के लिए कुछ और भी करना चाहिए था जो कि मैने नहीं किया. यह आत्‍मग्‍लानि का बोध मुझ पर हावी होता जा रहा है और नहीं जानता कि मैं इससे कैसे उबरूंगा.

मैं आपसे जानना चाहता हूं कि ऐसे हालात में यदि आप होते तो क्‍या करते ? जो मैने किया क्‍या वह सही था ? या मुझे कुछ और भी करना चाहिए था ? अवश्‍य बताएं कि मैने जो किया वह सही था या गलत ? यदि उसकी मौत हो गई तो क्‍या मैं भी उसके लिए जिम्‍मेदार माना जाउंगा ?

शायद आप जानना चाहते हैं कि वह कौन था ? वह करीब पांच फीट लंबा एक सर्प था.