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शनिवार, 20 सितंबर 2008

प्रवासी जल पक्षियों की प्रजातियां खत्‍म होने के करीब

मानव द्वारा प्राकृतिक संसाधनों के साथ छेड़छाड़ और उनके बेहिसाब दोहन का सिलसिला जारी है। बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं के रूप में इसके नतीजे हम भुगत भी रहे हैं। इंसानों की गलतियों का खामियाजा अब पशु-पक्षियों को भी भुगतना पड़ रहा है।

अफ्रीका और यूरेशिया में भ्रमण करने वाले प्रवासी जल पक्षियों की जनसंख्या में 40 फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्लेमिंगो, क्रेन और राजहंस सरीखे पक्षियों की जनसंख्या में कमी का मुख्य कारण इनके आवास का दोहन बताया गया है।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

एक टी-शर्ट की धुलाई और पर्यावरण

पर्यावरण को सबसे ज्‍यादा नुकसान पहुंचाने वाले तत्‍वो में ग्रीन हाउस गैसों का स्‍थान सबसे अव्‍वल है। आम घरों में इस्‍तेमाल होने वाली वाशिंग मशीन और रेफ्रिजरेटर भी इसके उत्‍सर्जन में अपना पूरा योगदान देते हैं। लेकिन इन वस्‍तुओं पर हमारी निर्भरता इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि इनके बिना जीवन की कोई कल्‍पना भी नहीं करना चाहता. पर्यावरण की रक्षा करने और ग्रीन हाउस गैसों के उत्‍पादन में कटौती करने की वकालत करने वाले लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि ऐसी जीवन शैली विकसित की जानी चाहिए जिससे पर्यावरण को हानि कम से कम पहुंचे।

मंगलवार, 9 सितंबर 2008

ठंडे मौसम ने बढ़ाई थी जीवन की रफ्तार

हाल में किए गए एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि 50 करोड़ साल पहले मौसम के अचानक ठंडे हो जाने से जीवन के पनपने की रफ्तार बढ़ गई थी। आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय के एक दल ने ईल के आकार वाले विलुप्त हो चुके एक समुद्री जीव के जीवाश्मों के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। दल ने सूक्ष्म दांतों जैसे आकार वाले इन जीवाश्मों में मौजूद आक्सीजन समस्थानिकों [आइसोटोप] के अनुपात का अध्ययन किया।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि जीवाश्म चट्टानों में मौजूद कैल्शियम कार्बोनेट की तुलना में जैव जीवाश्मों के भीतर लंबे समय तक आक्सीजन सुरक्षित बनी रहती है। अध्ययन यह प्रदर्शित करता है कि 49 करोड़ से 47 करोड़ साल पहले समुद्र की सतह 40 डिग्री सेल्सियस तापमान से घटकर उस तापमान पर आ पहुंची जहां आज हमारे ऊष्णकटिबंधीय इलाके हैं। यह नया तापमान लगभग ढाई करोड़ साल तक बरकरार रहा। यही वह समय है जब समुद्री जीवन विस्फोटक रफ्तार से पनपा। दरअसल इतिहास के विकास क्रम में इस दौर को सबसे तेज रफ्तार वाला दौर माना जाता है।

अध्ययन की प्रमुख अनुसंधानी डा जूली ट्राटर ने कहा कि इसके बाद समुद्र हिमनदों के तापमान तक ठंडे हो गए और इसी दौर में अनेक प्रजातियां विलुप्त हो गई। इसका अर्थ हुआ कि मौसम को बदल दिया जाए तो पृथ्वी पर जीवन बदला जा सकता है। जीवाश्मों के जरिये तापमान के रिकार्ड को हासिल करने के लिए दल ने कमरे के आकार वाले एक उपकरण का इस्तेमाल किया जिसे सेंसेटिव हाई रिजोल्यूशन आयन माइक्रोप्रोब या श्रिंप कहा जाता है यह पांच माइक्रान व्यास के अति सूक्ष्म आकार वाले नमूने से भी समस्थानिकों का माप कर सकता है। यह आकार हमारे बालों के दसवें हिस्से के बराबर है।

श्रिंप का इस्तेमाल कर फास्फेट सूक्ष्म जीवाश्मों से आक्सीजन का माप करना वास्तव में एक उपलब्धि है। श्रिंप बेहद आसान और भरोसेमंद तरीके से लाखों करोड़ों साल के दौरान मौसम में हुए बदलावों के बारे में जानकारी देता है। इस तरह से हमें इस बात को समझने में मदद मिल सकती है कि भविष्य में होने वाले मौसमी बदलावों के प्रति जीवन किस प्रकार प्रतिक्रिया करेगा। यह अध्ययन सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका साइंस के ताजा अंक में प्रकाशित हुआ है।

गुरुवार, 3 जुलाई 2008

एवरेस्ट को कचरा मुक्त करेगा चीन

चीन ने माउंट एवरेस्ट पर आवाजाही सीमित करने का फैसला किया है ताकि दुनिया की सबसे ऊँची चोटी को कचरे से मुक्त किया जा सके। इससे पूर्व मई में साम्यवादी नेतृत्व ने पर्वतारोहण के समय को सीमित कर इस 29035 फीट ऊँची चोटी पर पहुँचने वाले दक्षिणी मार्ग को बंद करने के लिए नेपाली सरकार को राजी कर लिया था ताकि चीन विरोधी प्रदर्शनकारी बीजिंग ओलिंपिक मशाल यात्रा में खलल न डाल सकें। इस चोटी पर हुई मशाल यात्रा यानी माउंट कोमोलांग्मा के हफ्तों बाद अब चीन की इस पर्वत से टीन केन बोतलें ऑक्सीजन के कनस्तर और पर्वतारोहियों के बस्ते जैसे सामान को हटाने के लिए विशेष दल भेजने की योजना है।

सरकारी संवाद समिति शिन्हुआ के अनुसार तिब्बती पर्यावरणीय सुरक्षा एजेंसी के नेता झेंग योंग्जे ने कहा कि हमारी यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि एवरेस्ट से बहने वाली नदी का पानी साफ रहते हुए समुद्र में मिले। हमारा उद्देश्य लोगों की छेड़छाड़ से माउंट एवरेस्ट को बचाना है।


इस अभियान को वर्ष 2009 के पहले छह महीने में पूरा करने की योजना है। इसका उद्देश्य हिमालय के इस क्षेत्र की नाजुक पर्यावरणीय परिस्थिति की हिफाजत करना है। इसका एक और मकसद रोंगबक हिमखंड को पिघलने से बचाना है, जो बीते एक दशक में अपने स्थान से 490 फिट पीछे खिसक गया है।


ब्रिटेन के दि इंडिपेंडेंट अखबार के अनुसार सर एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोरगे द्वारा पहली बार विश्व की इस सबसे ऊँची चोटी पर फतह करने के बाद से हजारों पर्वतारोही यहाँ आ चुके हैं। वर्ष 2007 में चीन के उत्तरी ओर से एवरेस्ट पर 40 हजार पर्वतारोही आए। इन्होंने 120 टन कचरा क्षेत्र में छोड़ दिया। लंदन के इस अखबार का कहना है कि वर्ष 2004 में 24 स्वयंसेवियों के दल ने आठ टन कचरा हटाया था। वर्ष 2006 में एक और सफाई दल ने 1.3 टन कचरा एवरेस्ट के क्षेत्र से हटाया।

शुक्रवार, 16 मई 2008

खतरे की सूची में आया धुवीय भालू

अमेरिकी सरकार ने ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में डाला है और चेतावनी दी है कि उत्तर धु्रव [आर्कटिक] महासागर में बर्फ पिघलने के कारण वहां उनका आवास खतरे में है। बर्फ पिघलने के रिकार्ड किए गए अभी तक के निम्नतम स्तर से जुड़ीं तस्वीरें उपग्रह से मिलने के बाद गृह मंत्री डर्क केम्पथोर्न ने कहा कि आज मैं ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों के कानून [ईएसए] की सूची में डाल रहा हूं। सरकार, वैज्ञानिकों तथा अमेरिकी मत्स्य और वन्यप्राणी सेवा विभाग की सलाह पर कार्य कर रही है।

केम्पथोर्न ने कहा कि ईएसए के कानूनी मानकों ने ध्रुवीय भालू को खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में डालने को बाध्य किया है, लेकिन मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि इस प्रजाति के कानून की सूची में दर्ज होने से विश्व में जलवायु परिवर्तन या समुद्र में बर्फ पिघलना नहीं रुकेगा। किसी भी बड़े निराकरण के लिए सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को कदम उठाना होंगे। केम्पथोर्न ने अलास्का और ब्यूफोर्ट सी के टापूओं में ध्रुवीय भालुओं पर नजर रखने के लिए बड़े कदम उठाने की बात कही है। उन्होंने विदेशी सरकारों से भी इस प्रजाति के बचाव के लिए सहयोग करने को कहा है।
विश्व में मौजूद कुल 25 000 ध्रुवीय भालुओं की संख्या में से दो तिहाई भालू कनाडा में हैं। इसके बाद भी वहां की सरकार ने इसे खतरे में पड़ी प्रजातियों की सूची में नहीं डाला है। कनाडा की एक पैनल ने पिछले महीने वहां की सरकार से ध्रुवीय भालू को बचाने के लिए कदम उठाने का निवेदन किया था।
इस प्रजाति के प्रति विशेष चिंता जताई गई है लेकिन इसे विलुप्त होने की कगार पर नहीं बताया गया है। केम्पथोर्न ने हालांकि कहा कि अगर ऐहतियात के कदम नहीं उठाए गए तो धुव्रीय भालू के भविष्य में विलुप्ति की कगार पर पहुंचने की संभावना है।

धीरे-धीरे मरुस्थल में बदला था सहारा

एक नए शोध के अनुसार अफ्रीका का सहारा क्षेत्र लगातार हरियाली घटते जाने की वजह से करीब 2700 साल पहले विश्व के सबसे बड़े मरुस्थल में तब्दील हो गया। हालाँकि पहले की खोज में कहा जाता रहा है कि जलवायु में अचानक परिवर्तन होने से ऐसा हुआ था। उत्तरी अफ्रीका में स्थित सहारा करीब छह हजार साल पहले काफी हराभरा था और वहाँ पेड़ों की अच्छी संख्या थी। इसके अलावा वहाँ कई बड़ी झीलें भी हुआ करती थीं।

यूरोप, अमेरिका और कनाड़ा के वैज्ञानिकों के एक दल के शोध के अनुसार ऑस्ट्रेलिया से भी बड़े भाग में फैले सहारा में आबादी भी थी और पर्याप्त हरियाली भी। सहारा क्षेत्र में भौतिक बदलाव की कहानी का ब्यौरा देने वाले अधिकतर तत्व नष्ट हो चुके हैं लेकिन वैज्ञानिकों ने सहारा में मौजूद कुछ बड़ी झीलों में से एक योआ की विभिन्न परतों का अध्ययन किया। योआ उत्तरी चाड में स्थित है। वहाँ किए गए अध्ययन से नई जानकारी सामने आई जो पुरानी मान्यताओं के विपरीत है।


नए अध्ययन में शामिल वैज्ञानिक स्टीफन क्रोपलिन का कहना है कि ताजा तथ्य प्रचलित मान्यताओं के विपरीत है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार करीब 5500 साल पहले हरियाली में तेजी से कमी आने के कारण मरुस्थल का विस्तार हुआ और सहारा विश्व का सबसे बड़ा रेगिस्तान बन गया। इसके पहले 2000 में कोलंबिया विश्वविद्यालय के पीटर दि मेनोकल द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार सहारा की जलवायु में तेजी से बदलाव हुआ था।


क्रोपलिन ने कहा कि योआ झील से मिले तथ्य विपरीत कहानी कहते हैं और सहारा के मरुस्थल में तब्दील होने में समय लगा। उन्होंने कहा कि मेनोकल के आँकड़े गलत नहीं हैं लेकिन उनकी गलत व्याख्या की गई।

रविवार, 30 मार्च 2008

अंधेरे से उजाले की किरण

यह है सिडनी का प्रसिद्ध ओपेरा हाउस। रोशनी से जगमगाता (ऊपर) और अंधेरे में डूबा हुआ (नीचे)। ग्लोबल वार्मिग के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से शनिवार, 29 मार्च को आस्ट्रेलिया के इस सबसे महत्वपूर्ण शहर की सभी बत्तियां एक घंटे के लिए बुझा दी गई थीं। अंधकारमय भविष्य से दुनिया को आगाह करने के लिए अर्थ आवर कार्यक्रम के तहत 35 से ज्यादा देशों के लगभग 370 शहर शनिवार को एक घंटे के लिए अंधेरे में डूबे रहेंगे।

निरीह प्राणियों की हत्‍या का विरोध क्‍यों नहीं?


क्‍या यह चित्र कुछ कहता है? यह कैनेडा के सेंट लारेंस की खाड़ी में शुक्रवार 28 मार्च को एक हार्प सील को मारता एक शिकारी है। जीवों के खिलाफ हिंसा के चलते ऐसे अनेक निरीह प्राणी असमय काल के गाल में समा रहे हैं. कैनेडा और जापान जैसे कुछ देशों में यह क्रूर धंधा धड़ल्‍ले से जारी है. इन देशों की सरकारें अपने काम को जायज ठहराती हैं.

दरअसल, कनाडा में हर साल व्यवसायिक उपयोग के लिए काफी बड़े स्तर पर सीलों का शिकार किया जाता है। तमाम विरोधों के बावजूद कनाडा सरकार इस पर प्रतिबंध लगाने को तैयार नहीं है। हालांकि उसने घोषणा की है कि इस साल सिर्फ दो लाख 75 हजार सीलों को मारा जाएगा, लेकिन मानवीय तरीके से?

अब यह तो कनाडा सरकार ही जाने कि किसी जीव की हत्या मानवीय ढंग से कैसे की जा सकती है, वह भी व्यवसाय के लिए. जीवों की इस क्रूरतापूर्ण तरीके से हत्‍या के खिलाफ विश्‍व समुदाय को आवाज उठाना होगी अन्‍यथा वह दिन दूर नहीं जब अंतिम जीव की हत्‍या होगी और तब हम उस विनाश को नहीं पाएंगे जो प्रकृति हमें दंडित करने के लिए करेगी.

शुक्रवार, 14 मार्च 2008

शहरीकरण का बोझ नहीं सह पाएगा धरती का पर्यावरण

चाहे शहरी चकाचौंध का आकर्षण हो या रोटी कमाने की मजबूरी लेकिन सच यह है कि दुनिया की करीब आधी आबादी शहरों में बसने लगी है। वातावरण में हर साल कार्बन डाईआक्साइड के रूप में घुलने वाले जहर की 80 फीसदी मात्रा इन्हीं लोगों की वजह से है। विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि धरती की जलवायु का हश्र इसी बात पर निर्भर करता है कि हम अपने शहरों को कैसे सजाते-संवारते हैं। वे यह भी कहते रहे हैं कि शहरों का भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि अगले 20 साल में शहरों पर लगातार बढ़ रहे बोझ को किस तरह नियंत्रित किया जाता है।

हम जैसों के लिए ज्‍यादा चिंता : भारत जैसे विकासशील देशों के संदर्भ में यह चेतावनी कुछ ज्यादा ही गंभीर है। वजह यह कि व‌र्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के मुताबिक विकासशील देशों में शहरी आबादी साढ़े तीन फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है, जबकि विकसित देशों में यह दर एक फीसदी से भी कम है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक अगले 20 सालों में शहरों की आबादी जितनी बढ़ेगी, उसका 95 फीसदी बोझ विकासशील देशों पर ही पड़ेगा। यानी 2030 तक विकासशील देशों में दो अरब और लोग शहरों में रहने लगेंगे।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अगर शहरों पर बढ़ रहे बोझ और प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो एक करोड़ से ज्यादा आबादी वाले बड़े शहरों पर भविष्य में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ जाएगा। दुनिया के ऐसे 21 बड़े शहरों में से 75 फीसदी विकासशील देशों में ही हैं। कुछ आंकड़ों के मुताबिक 2015 तक ऐसे 33 में से 27 शहर विकासशील देशों में होंगे।

बढ़ती संख्या, घटती सुविधाएं: शहरों पर ज्यों-ज्यों बोझ बढ़ रहा है, लोगों को मिलने वाली सुविधाएं घट रही हैं। बेहतर जिंदगी की चाह में लोग शहरों की ओर भागते हैं, लेकिन वास्तव में उन्हें मुसीबतें ही मिलती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक विकासशील देशों में 70 फीसदी से ज्यादा [करीब 90 करोड़] आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है। वर्ष 2020 तक यह संख्या दो अरब हो जाने का अनुमान है। ऐसे में जहां उनके लिए स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ती हैं, वहीं पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है।

प्रदूषण की कीमत: शहरों में विकास और बढ़ती जनसंख्या के चलते प्रदूषण भी खूब बढ़ रहा है। तेजी से विकास कर रहे चीन के खाते में दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 16 शहर हैं। प्रदूषण के चलते शहरों में हर साल करीब दस लाख लोग समय से पहले मर जाते हैं। इनमें ज्यादातर विकासशील देशों के ही होते हैं।

रविवार, 24 फ़रवरी 2008

प्रदूषण का एक घातक असर यह भी

अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार वायु प्रदूषण फेफड़ों के लिए ही नहीं बल्कि शुक्राणुओं के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है. नेशनल अकेडमी आफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित कनाडा में हुए इस अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण से न केवल शुक्राणुओं की संख्या घटती है बल्कि संबंधित डीएनए में होने वाले बदलाव के कारण आने वाली पीढि़यों में भी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

अध्ययन के तहत कैनेडा और अमेरिका के नेशनल सेंटर फार टाक्सीकोलोजीकल रिसर्च के अनुसंधानकर्ताओं ने दस हफ्तों तक चूहों पर हैमिल्टन हार्बर इलाके की प्रदूषित हवा का प्रभाव देखा. इस दौरान उन्होंने पाया कि स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषण झेलने वाले चूहों के शुक्राणुओं का डीएनए 60 फीसदी तक बदल गया.

वैज्ञानिक इस बात को लेकर भी हैरान थे कि प्रदूषण दूर किए जाने के बाद भी शुक्राणुओं में डीएनए संबंधी बदलाव जारी रहे. गौरतलब है कि ये परिणाम पहले हुए एक अध्ययन की पुष्टि करते हैं, जिसके अनुसार स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषित वातावरण में पलने वाले चूहों के बच्चों के डीएनए में दोगुने बदलाव देखे गये.

पर्यावरण संरक्षण के लिए आनलाइन सेवा

मोनाको। संयुक्त राष्ट्र ने धरती के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के उपायों पर सभी देशों के बीच विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाने के लक्ष्य से क्लाइमेट न्यूट्रल नेटवर्क शीर्षक से एक आनलाइन सेवा की शुरूआत की है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के विषय पर यहां आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के मौके पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम के अध्यक्ष आचिम स्टेनर ने इस सेवा का शुभारंभ करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण खासतौर पर ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के संबंध में विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाना है।

उन्होंने कहा कि इस सेवा का लाभ उन देशों को मिलेगा जो धरती के तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए प्रयासरत है और पूरी शिद्दत से इस दिशा में काम कर रहे हैं। बाली में गत वर्ष दिसंबर में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन के बाद मोनाको का यह सम्मेलन पर्यावरण के मुद्दे पर आयोजित दूसरा सबसे बड़ा सम्मेलन है जिसमें दुनिया के तकरीबन 154 देश और सैकड़ों पर्यावरण विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं।

सम्‍मेलन के मेजबान मोनाको ने इस मौके पर कहा कि वह यूएनईपी परियोजना के तहत कोस्टा रिका आईसलैंड, नार्वे और न्यूजीलैंड के समान ही ग्रीन हाउस गैसों में मानक कटौती के प्रयास करेगा। कार रैलियों के आयोजन के लिए पूरी दुनिया में विख्यात मोनाको ग्रीन हाउस गैसों का एक बड़ा उत्सर्जक देश माना जाता है लिहाजा इस बार उसने इन हानिकारक गैसों की कटौती के पहल के तहत यह प्रयास शुरू किए हैं।

सुरा का सुरूर भी बदलेगी ग्लोबल वार्मिग


यह जानकारी सिर्फ इतना दर्शाने के लिए है कि ग्‍लोबल वार्मिंग का असर कितने व्‍यापक पैमाने पर हो रहा है. शराब स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक है और इस जानकारी का उद्देश्‍य इसका महिमा मंडन करना कतई नहीं है.

ग्लोबल वार्मिग का हाल यही रहा तो वाइन के सुरूर का तर्ज ही बदल जाएगा। वाइन उत्पादक दुनिया का नक्शा पलट जाएगा। ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। 'वाइन एंड क्लाइमेट चेंज' पर दूसरे अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस को संबोधित करते हुए फ्रांस के इनरा एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमुख बर्नार्ड सेगुइन का कहना था-जिन अंगूरों से वाइन बनती है, उनकी फसल ग्लोबल वार्मिग के कारण दस दिन पहले ही तैयार होने लगी है। इसका खामियाजा वाइन और उसके उत्पादन पर पड़ना तय है।

इस कांग्रेस में स्पेन, फ्रांस, अमेरिका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया सहित 36 देशों के 350 से ज्यादा विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे थे। इसका समापन हुआ शनिवार को अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति अलगोर के संबोधन से। सेगुइन का कहना था-अगर तापमान दो या तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो हम बोर्डीआक्स, रियोजा और बरगुंडी जैसी वाइन की गुणवत्ता को बचाए रखने का उपाय कर सकते हैं। लेकिन अगर तापमान में वृद्धि पांच से छह डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई तो वाइन उद्योग को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ जाएगा।

स्पेन के फर्नाडो जमोरा का कहना था कि अधिक गर्मी और वर्षा के अभाव में समय से पहले पक जाने पर अंगूर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। अगर अंगूर जल्दी पक जाते हैं तो उनके शर्करा ज्यादा गाढ़ा जाता है। अम्लीयता कम हो जाती है और पीएच स्तर भी बढ़ जाता है। ऐसे अंगूर से बनी वाइन में अल्कोहल का स्तर ज्यादा और अम्लीयता कम होती, नतीजतन कड़वाहट बढ़ जाती है।

शनिवार, 23 फ़रवरी 2008

पानी गर्म होने से सब नष्‍ट होगा... अंटार्कटिक

दूसरा व अंतिम भाग। इस लेख का पहला भाग यहां पढ़ें
ग्लोबल वार्मिग अगर ऐसे ही बरकरार रही तो अंटार्कटिका का समुद्री जीवन शार्क, केकड़ों और अन्य परभक्षियों के आक्रमण से बर्बाद हो जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार जैसे-जैसे अंटार्कटिका के वातावरण का तापमान बढ़ रहा है, शार्क वहां पहुंचती जा रही हैं। प्रोफेसर कैरिल विल्गा के अनुसार हालांकि शार्क की रफ्तार केकड़ों की तुलना में कुछ धीमी ही है। केकड़े तेजी से वहां की ओर बढ़ रहे हैं। वे वहां पहुंचने में सफल हुए नहीं कि वहां पाए जाने वाले जीवों को चट करना आरंभ कर देंगे। अमेरिका में रोड आइलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विल्गा उस अंतरराष्ट्रीय दल के प्रमुख हैं जो इस समय इस महाद्वीप पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है। अंटार्कटिका के समुद्र की तलहटी में पाए जाने वाले कई जीव-जंतु पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अनोखे जीवों में शामिल हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार जो जातियां वहां पाई जाती हैं, उनकी आबादी के अनुपात में शार्क और अन्य बड़ी मछलियों के वहां जाने से आमूलचूल परिवर्तन आएगा। ब्रिटेन में साउथेंप्टन विश्वविद्यालय स्थित नेशनल ओशियानोग्राफी सेंटर के डाक्टर स्वेन थैट्जी कहते हैं कि अंटार्कटिका के उथले पानी में रहने वाले जंतु धरती पर अनोखे हैं क्योंकि लाखों वर्षो में उन्होंने बहुत ही ठंडे पानी में विकास किया है। अंटार्कटिका में शीत की प्रक्रिया चार करोड़ वर्ष पहले आरंभ हुई थी। इसकी वजह से सभी विशालकाय परभक्षी जैसे शार्क और केकड़े वहां से चले गए। ये इतने ठंडे वातावरण में नहीं रह सके थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि तुरंत स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयास नहीं किए गए तो दुनिया में आखिरी बचे इस मूल वातावरण को कायम रखना असंभव हो जाएगा। अल्बामा में डफिन आइलैंड सी लैबोरेटरी के डाक्टर रिचर्ड अरोनसन के मुताबिक अब हमें अंटार्कटिका में कार्रवाई करनी ही पड़ेगी।

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

गर्म हो रहा है अंटार्कटिक का जल

अंटार्कटिक के जल का तापमान बढ़ रहा है और साथ ही समुद्र का जल स्तर भी ऊंचा हो रहा है। दक्षिणी महासागर के तापमान में बदलाव के रिकार्ड का अध्ययन करने पर यह बात सामने आई है। अंटार्कटिक क्षेत्र में आस्ट्रेलिया, फ्रांस और अमेरिका के संयुक्त कार्यक्रम के तहत पिछले 15 साल के आंकड़े एकत्रित किए गए जिसके बाद आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने हाल ही में यह बात कही। कार्यक्रम में आस्ट्रेलियाई दल का नेतृत्व करने वाले स्टीव रिनटाउल ने कहा कि प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक अंटार्कटिक जल की प्रवृत्ति का अध्ययन कर सकेंगे। वह यह भी बता सकेंगे कि इसका वैश्विक जलवायु पर क्या असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक जो आंकड़े उन्‍हें मिले हैं उनके अनुसार अंटार्कटिक का तापमान बढ़ रहा है। विशेष रूप से समुद्र के ऊपरी भाग में तापमान में खासी बढ़ोतरी हुई है। दुनिया भर में समुद्र के जल का तापमान बढ़ रहा है। बहरहाल हाल के अध्ययन से अब यह भी साबित हो गया है कि दक्षिणी महासागर की गहराई में भी तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। दक्षिणी महासागर में तापमान में जो परिवर्तन हो रहा है वह दुनिया के अन्य भागों के मुकाबले कम है। लेकिन महासागर गर्मी को जमा करते जा रहे हैं जो ठीक नहीं है।

उन्होंने कहा कि इसका मतलब है दक्षिणी महासागर में तापमान बढ़ता जा रहा है। इसका प्रभाव समुद्र के जल स्तर पर भी पड़ेगा क्योंकि गर्म जल का विस्तार होता है और इसके साथ समुद्र का जल स्तर भी बढ़ता है। जिस क्षेत्र में यह कार्यक्रम चलाया गया वहां पिछले करीब एक दशक में समुद्र का जल स्तर तीन सेंटीमीटर बढ़ गया है।
इस विषय पर और जानकारी अगले भाग में पढ़ें

विश्व के 24 शहरों में होगा ब्लैक आउट

ग्लोबल वार्मिग के प्रति जागरूकता अभियान चलाने के लिए अर्थ आवर कार्यक्रम के तहत विश्व के 24 शहरों में अगले महीने बत्तियां बुझाकर अंधेरा कर दिया जाएगा। अर्थ आवर पहल पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े शहर सिडनी से शुरू हुई थी। वहां के लगभग 22 लाख लोगों ने चांदनी रोशनी से नहाए सिडनी ऑपेरा हाउस को छोड़कर अपने-अपने घरों, प्रतिष्ठानों तथा हार्बर ब्रिज की बत्तियां बुझाकर उन्हें अंधेरे में डुबो दिया था।

ग्रीन हाउस गैसों में कटौती करे भारत-चीन: दूसरी ओर अनुमान से कहीं तेज रफ्तार से बढ़ रहे वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निबटने की मुहिम के तहत चीन और भारत जैसे विकासशील देशों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए सख्त और प्रभावी कदम उठाने की अपील की गई है। जलवायु परिवर्तन पर आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में इससे निबटने के लिए वर्ष 2020 तकनिर्धारित लक्ष्य हासिल करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए और सख्त कदम उठाने होंगे। आस्ट्रेलिया के शीर्ष पर्यावरण सलाहकार रास गारनाट के अनुसार इस दिशा में तेजी से बढ़ने की जरूरत है। आस्ट्रेलिया समेत भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय पैनल की ओर से अब तक जारी आंकलन रिपोर्ट के आंकड़े पुराने हो चुके हैं। इसमें जलवायु परिवर्तन की जो रफ्तार दर्शाई गई है वह उससे कहीं तेजी से बढ़ रहा है इसलिए इसके लिए सुझाए गए उपायों में और सख्ती लानी है। रिपोर्ट में कार्बन कटौती के लिए दो स्तरीय सुझाव दिए गए हैं जिसके अनुसार पहले स्तर पर ये उपाय क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर होने हैं जबकि दूसरे स्तर पर यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने हैं जिसमें आस्ट्रेलिया, भारत और चीन जैसे देशों को अहम भूमिका निभानी है।

सोमवार, 11 फ़रवरी 2008

एक गोरिल्‍ला की शवयात्रा

एक गोरिल्‍ला की शवयात्रा
विश्‍व प्रेस फोटोग्राफी अवार्ड के समसामयिक मुद्दों के वर्ग में प्रथम स्थान दक्षिण अफ़्रीका के छायाकार ब्रेंट स्टर्टन को मिला. न्यूज़वीक पत्रिका के लिए उन्होंने ये तस्वीर खींची थी जिसमें कॉंगो के विरुंगा नेशनल पार्क से एक मृत पहाड़ी गोरिल्ला को उठाकर ले जाते लोगों का दृश्य है.

प्रकृति



विश्‍व प्रेस फोटोग्राफी अवार्ड के प्रकृति वर्ग में इस तस्वीर को दूसरा पुरस्कार मिला है.
कनाडा के पॉल निकलेन ने ये तस्वीर कनाडा में खींची.



दोनों तस्‍वीरें बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार

बुधवार, 6 फ़रवरी 2008

प्रशांत महासागर में प्लास्टिक का समुद्री कचराघर

विश्व का सबसे बड़ा महासागर प्रशांत जल्द ही प्लास्टिक महासागर में तब्दील हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई चेतावनियों के बावजूद लोग प्रशांत महासागर में कूड़ा-करकट डालना जारी रखे हुए हैं। इससे यह महासागर कूड़े के ढेर में तब्दील होता जा रहा है और पानी में गंदगी फैल रही है।

अमेरिकी संस्था अल्गेलिता मेरीन रिसर्च फाउंडेशन के अनुसंधान निदेशक मा‌र्क्स एरिकसन ने कहा कि प्रशांत महासागर में प्लास्टिक और अन्य तरह का कचरा डाले जाने से यह अपने वास्तविक स्वरूप को खो रहा है। यदि यह सिलसिला रुका नहीं तो प्रशांत महासागर प्लास्टिक महासागर के रूप में अपनी पहचान बना लेगा। यह स्थितिन केवल समुद्री जीवों, बल्कि मनुष्यों के लिए भी घातक होगी।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में प्लास्टिक का समुद्री कचराघर तैयार हो गया है। यह कचराघर हवाई से जापान तक फैलता जा रहा है। दि इंडिपेंडेंट ने एरिकसन के हवाले से लिखा है कि प्लास्टिक का यह कचराघर क्षेत्रफल के हिसाब से अमेरिका से दुगना बड़ा हो सकता है। प्रशांत महासागर में प्लास्टिक के इस समुद्री कचराघर को 1997 में लास एंजिलिस से हवाई तक हुई नौका दौड़ के दौरान खोजा गया था।

यह समुद्री कचराघर वास्तव में दो जुड़े हुए क्षेत्र हैं। ये हवाई द्वीप के दोनों ओर स्थित हैं। ये पूर्वी व पश्चिमी प्रशांत कूड़ा पट्टी के रूप में जाने जाते हैं। इनका करीब पांचवां हिस्सा जहाजों और तेल संयंत्रों से फेंका गया कूड़ा है, जबकि बाकी का कचरा जमीन से इसमें डाला गया है। पिछले 15 साल से इसपर नजर रखे कर्टिस एबिसमेयर के अनुसार यह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जा रहा है।

हवाई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेविड कार्ल के अनुसार प्लास्टिक समुद्री कचराघर के आकार और व्यवहार का पता लगाने के लिए और ज्यादा अनुसंधान की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अल्गेलिता की खोज पर शक करने का कोई कारण नहीं है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार प्लास्टिक के कचरे से हर साल दस लाख से अधिक समुद्री जीवों की मौत होती है। मृत पाए जाने वाले समुद्री जीवों के पेट में सिगरेट लाइटर और टूथब्रश पाए जाते हैं, क्योंकि समुद्र में डाले जाने वाले प्लास्टिक के इन अपशिष्ट पदार्थो को समुद्री जीव गलती से भोजन समझ कर खा जाते हैं।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

फैशन जगत में अब इको फ्रैंडली कपड़े

फैशन जगत में अब इको फ्रैंडली कपड़ों का दबदबा बढ़ने लगा है। दुनिया भर के फैशन डिजाइनरों का ध्यान अब इको फ्रैंडली कपड़ों की ओर लगा है। लॉस एंजिल्स से लेकर टोरंटो तक आयोजित फैशन शो में इको फ्रैंडली कपड़ों का प्रदर्शन जोर-शोर से किया जा रहा है। पिछले साल लॉस एंजिल्स में आयोजित मर्सिडिज बेंज फैशन वीक के दौरान पर्यावरण हितैषी कपड़ों का बोलबाला रहा। इसमें भाग लेने वाले तमाम फैशन डिजाइनर्स ने अपने लेटेस्ट ट्रेंड में इको फ्रैंडली कपड़ों पर जोर दिया।

फैशन डिजाइनरों का कहना है कि ऐसे कपड़े न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में मददगार होते हैं, बल्कि सेक्सी लुक भी देते हैं। इस फैशन शो की थीम भी 'द ग्रीन इनिशिएटिव' रखी गई थी। कनाडा के एक फैशन मॉल में भी इन दिनों ग्रीन फैशन का बोलबाला है। सभी बड़े फैशन मॉल में सिंथेटिक कपड़ों की जगह पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने वाले कपड़े नजर आ रहे हैं।

फैशन डिजाइनर और स्टोर मालिक भी लोगों की भारी माँग को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए तमाम फेब्रिक कंपनियों ने वर्ष 2008 के लिए नई स्टाइल और लुक वाले कपड़े और उनके साथ की एक्सेसरीज लांच करने की तैयारी पूरी कर ली है। इनमें कपड़ों के मटेरियल से लेकर रंगों तक में जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है।

ऑर्गनिक ट्रेड एसोसिएशन (ओटीए) का कहना है कि आगामी तीन वर्षों में जैविक कपड़ों के बाजार में जबर्दस्त उछाल आने की संभावना है। वर्ष 2006 की ही बात करें तो इस वर्ष 2005 की तुलना में अमेरिका में 160 मिलियन डॉलर का मुनाफा हुआ। एसोसिएशन ने अनुमान लगाया है कि जैविक कपड़ों का बाजार आगामी तीन वर्षों में 116 फीसदी प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ेगा।

टोरंटो की फैशन डिजाइनर एनी थॉम्पसन कहती हैं कि इको फ्रैंडली कपड़ों का बाजार गर्म हो रहा है। लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में इको फ्रैंडली कपड़ों की रेंज लोगों को काफी पसंद आ रही है। एनी ने अपनी नई रेंज तैयार करने में केमिकल का अत्यंत कम उपयोग किया है। उन्होंने ज्यादातर बाँस, वाइल्ड सिल्क, फूलों के फर, सोया और अन्य जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया है। उनका यह कलेक्शन संभवतः अगले महीने तक बाजार में छा जाएगा।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2008

कार है ग्‍लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण

वैज्ञानिकों के एक शोध के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण परिवहन साधन हैं। इनमें कार सबसे ज्यादा है। कार के बाद ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने का दूसरा कारण विमानन क्षेत्र है। परंतु पानी के जहाज का मामला बेहद जटिल है। एनवायरमेंटल न्यूज नेटवर्क की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीआईसीईआरओ (सेंटर फॉर इंटरनेशनल क्लाइमेट एंड एनवायरमेंटल रिसर्च) के पाँच शोधकर्ता ने यह शोध किया है। इन्होंने परिवहन क्षेत्र को चार उपक्षेत्रों में बाँटा। इनमें स़ड़क परिवहन, उड्डयन, रेल और जहाजरानी हैं।

शोध करने वाले दल ने प्रत्येक उपक्षेत्र का ग्लोबल वार्मिंग में योगदान को आँका। इसके लिए रेडिएटिव फोर्स (आरएफ) को देखा, जो गाड़ियों से निकलने वाले धुएँ से होता है। अध्ययन का नतीजा यह निकला कि औद्योगिकीकरण के पहले से 15 प्रतिशत आरएफ मानव निर्मित कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन से होता है। परिवहन क्षेत्र इसकी जड़ है।

ओजोन के लिए परिवहन को 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार माना जा सकता है। अध्ययन कहता है कि ज्यादा से ज्यादा ध्यान तेजी से बन रही सड़कों की ओर भी दिया जाना चाहिए। अकेले कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन में सड़क यातायात ने दो-तिहाई योगदान दिया है। अगले सौ साल में यह स्थिति और बिगड़ती जाएगी। यानी सड़क यातायात का योगदान ग्लोबल वार्मिंग में तेजी से बढ़ेगा।

जहाँ तक पानी के जहाजों की बात है तो स्थिति और जटिल है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि जहाजों से ज्यादा नुकसान नहीं होता। कारण जहाजों से सल्फर डायऑक्साइड और नाइट्रोजन उत्सर्जित होती है। इनका असर ठंडा होता है। चूँकि ये गैसें ज्यादा समय तक वातावरण में नहीं रहती हैं और आने वाले समय में कार्बन डायऑक्साइड इसका असर खत्म कर देगी।

शनिवार, 2 फ़रवरी 2008

सन् 2007 में 3 लाख 30 हजार टन... लेकिन क्‍या?

मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन फॉर इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी (एमएआईटी) की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2007 में भारत में 3 लाख 30 हजार टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकला, जिसमें से केवल 19 हजार टन को रिसाइकल किया जा सका। रिपोर्ट में बताया गया है कि केवल टेलीविजन और कम्प्यूटर से 56,324 टन कचरा निकला, जिसमें से केवल 12 हजार टन को ही प्रोसेस किया गया। बाकी कचरा पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन रहा है।

एचसीएल इंफोसिस्टम्स के कार्यकारी उपाध्यक्ष जॉर्ज पॉल कहते हैं कि भारत में बड़े पैमाने पर रिसाइकल प्लांट की जरूरत है जिसमें सरकार को सहयोग करना चाहिए।एक अध्ययन के मुताबिक चीन और जापान में इलेक्ट्रॉनिक कचरा गंभीर परेशानी का कारण बनता जा रहा है। भारत की अपेक्षा उन देशों में अत्यधिक मात्रा में ई-वेस्ट निकलता है। प्रोसेस की प्रक्रिया तेज होने के बावजूद वहाँ ई-वेस्ट का समुचित निपटारा नहीं हो पाता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों में कई खतरनाक रसायन होते हैं जो स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। जागरूकता की कमी और नष्ट करने की मुश्किल प्रक्रिया के कारण भारत में ई-वेस्ट को रिसाइकल करने का कोई भी प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है।

सच्‍चई यह है कि इलेक्ट्रॉनिक चीजों का बाजार जिस तेजी से बढ़ रहा है उतनी तेजी से इलेक्ट्रॉनिक कचरे को नष्ट करने का काम नहीं हो पा रहा है। अब यही इलेक्ट्रॉनिक कचरा न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए मुसीबत का कारण और बीमारियों का घर बनता जा रहा है।


नईदुनिया से साभार

दुनिया के सबसे नए प्राणी की खोज

वैज्ञानिकों ने तंज़ानिया के पहाड़ियों में एक नए स्तनधारी जीव की खोज की है जो चूहे की शक्ल का है. इस नए अनोखे प्राणी को 'रिनोकोस्यॉन उडज़ुंग्वेंसिस' नाम दिया गया है. इसे अफ़्रीका में पाए जाने वाले चूहे जैसे प्राणी 'एलिफैंट श्रियू' की ही एक नस्ल माना जा रहा है जिसके पैर लंबे होते हैं और जिसका मुँह निकला हुआ होता है.

'ज़ूलॉजी' पत्रिका में इस प्राणी की खोज की ख़बर छापी गई है. बिल्ली के आकार के इस जीव को छोटे हिरन और चींटी खाने वाले दंतविहीन प्राणियों के बीच की संकर प्रजाति माना जा रहा है. इसका चेहरा स्लेटी रंग का और थूथन लंबा और लचकदार है. पीले और भूरे रंग वाले इस जीव की टांगें नुकीली हैं.


शोध की पुष्टि करने वाले कैलीफोर्निया अकादमी ऑफ साइंस के डॉक्टर ग्लेन रथबन ने कहा, “यह मेरे अब तक के करियर की सबसे रोमांचक खोजों में से एक है. एलिफैंट श्रियू केवल अफ़्रीका में पाए जाते हैं. ये नाम इसलिए रखा गया क्योंकि इनका ऊपरी हिस्सा अमरीका और यूरोप के श्रियू से मिलता जुलता है." वास्तव में इस प्राणी का संबंध दस करोड़ साल पहले के अफ़्रीकी स्तनधारियों के समूह से माना जा रहा है.

इस नई प्रजाति को सबसे पहले वर्ष 2005 में तंज़ानिया में डुंडुलु जंगलों की उडज़ुंगवा पहाड़ियों पर फ़िल्माए दृश्यों में देखा गया था. ये फ़िल्म इटली में ट्रेन्टो म्युज़ियम ऑफ नेचुरल साइंस के फ़्रैंसेस्को रोवरो ने बनाई थी. डॉक्टर रथबन ने कहा, “जब मैंने ये तस्वीरे देखी तो मुझे सब नया लगा लेकिन केवल तस्वीरों के आधार पर कुछ कहना मुमकिन नहीं था. फिर मार्च 2006 में हम वहाँ दोबारा गए और कुछ नमूने लिए.”


वैज्ञानिकों का कहना है अभी रिनोकोस्यॉन उडज़ुंग्वेंसिस नामक इस प्राणी के बारे में काफ़ी कुछ जानना बाक़ी है लेकिन उनका मानना है कि आगे शोध में इस तरह के जानवरों और उनके रहन-सहन के बारे में जानने को मिलेगा. तंज़ानिया की उडज़ुंगवा पहाड़ियों में जैव विविधता से भरी पड़ी है. इस नई प्रजाति के अलांवा बंदर की नई प्रजाति किपुंजी भी वहीं पाई गई थी.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2008

क्‍यों बदल रहा है मौसम इस तरह?

चीन के दक्षिणी इलाकों में पिछले 50 सालों के बाद पहली बार भयंकर बर्फ पड़ी है. इस तूफान के कारण लाखों लोग प्रभावित हुए हैं. तूफान की चपेट में आने से 60 लोगों की मौत हो चुकी है. इस बर्फीले तूफान से पर्यावरण वैज्ञानिक हैरत में पड़ गए हैं. एक ओर वैज्ञानिक इसे जलवायु परिवर्तन का नतीजा मान रहे है, वहीं दूसरी तरफ उनका यह भी कहना है कि यह तूफान जलवायु परिवर्तन के कारण नहीं आया है.

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक लॉ नीना वैदर पैर्टन के इस तूफान के कारण मौसम का असामान्य व्यवहार है. इसे जलवायु परिवर्तन के कारण मानना जल्दबाजी होगा. ऐसा एक दशक बाद या कई सालों में दुनिया के किसी भी देश में हो सकता है. यह प्राकृतिक है लेकिन ऐसे बर्फीले तूफान या मौसम की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती.

इसी प्रकार उत्तरी इस्राइल के पहाड़ी इलाकों में कड़ाके की ठंड पड़ रही है. तेल अवीव और यरुशलम के बीच राजमार्ग को बंद कर दिया गया है. यरुशलम और पहाड़ी क्षेत्रों में कई इंच तक बर्फ जम गई है. बर्फबारी और ठंड के कारण स्कूल और दुकानों को बंद करने के आदेश दे दिए गए हैं. हालांकि यरुशलम में साल में एक बार बर्फबारी होती रही है और वैज्ञानिक इसे सामान्य घटना मान रहे हैं.

इसके बावजूद यह तथ्‍य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि सारी दुनिया में मौसम का चक्र परिवर्तित हो रहा है और यह केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं है. इसके पीछे बहुत हद तक मानवजनित कारण भी हैं और वैज्ञानिकों का इस मुद्दे पर एकमत नहीं होना भी कहीं न कहीं यह दर्शाता है कि इन अनोखी घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन का हाथ भी है.


चित्र में सफेद चट्टानों की शक्ल में नजर आ रही बर्फ चीन के जिनान में हवांग हो नदी का हिस्सा हैं. शानडांग प्रांत के जिनान सहित करीब छह सौ किलोमीटर में निरंतर गिरते तापमान के कारण हवांग हो नदी पिछले दिनों पूरी तरह जम गई. इस नदी को यलो रिवर भी कहा जाता है.

मंगलवार, 15 जनवरी 2008

गहरे समुद्र में हंपबैक व्‍हेलों का रहस्‍यमयी गान

हंपबैक व्‍हेल बहुत ही सौम्‍य और निरापद जीव हैं. समुद्र की गहराइयों में विचरने वाले ये भीमकाय जीव सदा रहस्‍य के आवरण में घिरे रहे हैं. मानव के साथ इनका संपर्क तभी होता है जब जापान जैसे देश इनका शिकार करने के लिए समुद्र में जाते हैं. पहली बार इनके एक अनछुए पहलू के बारे में कुछ दुर्लभ तस्‍वीरें और ध्‍वनियां प्राप्‍त हुई हैं. गहरे शांत समुद्र में जलविहार करती हंपबैक व्‍हेल के एक झ़ुंड का आपसी संवाद या फिर मस्‍ती में गाया जा रहा कोई गीत... न जाने यह क्‍या है. आप भी सुनिए और आनंद लीजिए.

मंगलवार, 8 जनवरी 2008

काश कि यह बब्‍बर शेर सफल हो पाता

वन्‍य जीवों की हत्‍या करने का दुष्‍कर्म पूरी दुनिया में चल रहा है. लेकिन एक बब्‍बर शेर के असफल शिकार का यह दुर्लभ वीडियो बताता है कि अब शिकारी भी शिकार बनेंगे. वन्‍य जीवों ने अपने खिलाफ हो रहे अत्‍याचार का विरोध शुरू कर दिया है. काश कि यह बब्‍बर शेर सफल हो जाता... कम से कम शिकारियों का थोड़ी नसीहत तो मिल पाती.

शरीर की गर्मी से होगा पानी गरम

ऊर्जा का संचार दुनिया के हर प्राणी में होता है, लेकिन इसके सही उपयोग की दिशा में अब तक कोई काम नहीं किया गया. अब मानव शरीर की ऊर्जा का उपयोग पानी गरम करने में किया जाएगा. स्टॉकहोम के सेंट्रल स्टेशन में रोजाना हजारों लोग आते हैं और इस दौरान उनके शरीर से निकली ऊर्जा बेकार चली जाती है.

इस बारे में प्रोजेक्ट लीडर कार्ल सनडॉम का कहना है कि इस ऊर्जा का इस्तेमाल पानी गर्म करने में किया जाएगा और उसे पास वाली बिल्डिंग में सप्लाई किया जाएगा. स्वीडन की सरकारी कंपनी जेनहूसेट के कार्ल ने बताया कि इस स्टेशन से रोजाना करीब ढाई लाख लोग गुजरते हैं. इनमें से कुछ ट्रेन पक़ड़ने तो कुछ सब-वे का इस्तेमाल करने, जबकि कुछ यहाँ शॉपिंग करने आते हैं. इन सभी लोगों के शरीर से ऊर्जा निकलती है और बेकार चली जाती है.

उन्होंने बताया कि इसी वजह से हमने इस ऊर्जा को वेंटिलेशन सिस्टम के जरिए इकट्ठा करने की योजना बनाई है. वैसे इस ऊर्जा को बाहर निकालने के लिए आमतौर पर खिड़कियों का इस्तेमाल किया जाता है.कार्ल ने कहा कि योजना यह है कि इस ऊर्जा का उपयोग पानी गर्म करने में किया जाए और उसे पास वाली एक बिल्डिंग में सप्लाई किया जाए. उन्होंने कहा कि 2010 में यहाँ बनकर तैयार होने वाले होटल और कुछ दुकानों को भी गर्म पानी की सप्लाई की जाएगी.

कार्ल के अनुसार यह पुरानी तकनीक है, लेकिन हम इसका इस्तेमाल नए तरीके से कर रहे हैं. फिलहाल कोई भी इस तकनीक के जरिए इस ऊर्जा का इस्तेमाल नहीं कर रहा है. उन्होंने कहा कि इससे पानी गर्म करने की लागत में 20 फीसदी तक की कमी आएगी. ऊर्जा सहित अन्‍य प्राकृतिक संसाधनों के अपव्‍यय को लेकर सारी दुनिया में जो कुछ चल रहा है उसे देखते हुए यह एक सराहनीय प्रयास है.

रविवार, 6 जनवरी 2008

अंधेरे से उजाले की किरण

यह है सिडनी का प्रसिद्ध ओपेरा हाउस। रोशनी से जगमगाता (ऊपर) और अंधेरे में डूबा हुआ (नीचे)। ग्लोबल वार्मिग के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से शनिवार, 29 मार्च को आस्ट्रेलिया के इस सबसे महत्वपूर्ण शहर की सभी बत्तियां एक घंटे के लिए बुझा दी गई थीं। अंधकारमय भविष्य से दुनिया को आगाह करने के लिए अर्थ आवर कार्यक्रम के तहत 35 से ज्यादा देशों के लगभग 370 शहर शनिवार को एक घंटे के लिए अंधेरे में डूबे रहेंगे।

शनिवार, 5 जनवरी 2008

इंसान से बेहतर ओरांग उटान

एक नए अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि मनुष्य का सबसे करीबी जैविक साथी ओरांग उटान न सिर्फ मनुष्य की तरह हँस सकता है, बल्कि उसने हँसना मनुष्यों से पहले सीख लिया था और वे एक-दूसरे की नकल उतारने में माहिर होते हैं. अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम द्वारा किए गए अध्ययन में बताया गया है कि हँसी मनुष्यों ने ईजाद नहीं की, बल्कि उनसे पहले ओरांग उटान ने हँसना सीख लिया था और वे एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति का प्रदर्शन भी करते थे. इतना ही नहीं उनमें एक-दूसरे की नकल करने की प्रवृत्ति भी मनुष्यों से पहले की है.

यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. मरीना डेविला रोस के मुताबिक अब तक यही माना जाता रहा था कि हँसी और सहानुभूति सबसे पहले मनुष्यों के व्यवहार का अंग बनी, लेकिन यह प्रवृत्ति ओरांग उटान में मनुष्यों से भी पहले विकसित हो गई थी और वे इसका उपयोग भी भरपूर करते आए हैं. शोधकर्ताओं की टीम ने इस शोध के परिणामों का परीक्षण करने के लिए चार अलग-अलग देशों के प्राइमेट सेंटर पर ओरांग उटान के चेहरों के अलग-अलग भावों वाली तस्वीरों को 25 ओरांग उटान के एक ग्रुप को एक-एक कर दिखाया.

उन्होंने पाया कि जब एक ओरांग उटान को किसी दूसरे ओरांग उटान की खुले मुँह वाली तस्वीर दिखाई गई तो उसे देखकर वह भी वैसा ही चेहरा बनाने लगा. इसी तरह हँसते चेहरे वाली तस्वीर देखकर वह भी हँसने लगा. रोस कहते हैं कि यह शोध जानवरों में सहानुभूति के नए पक्ष को उजागर करता है. वे कहते हैं कि इसे इस तरह से भी व्यक्त किया जा सकता है कि ओरांग एटान सिर्फ मनुष्यों की तरह बोल नहीं सकते, बाकी काम जैसे हाव-भाव व्यक्त करना आदि वे मनुष्यों से बेहतर कर सकते हैं.