रविवार, २४ फरवरी २००८

प्रदूषण का एक घातक असर यह भी

अमेरिकी अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार वायु प्रदूषण फेफड़ों के लिए ही नहीं बल्कि शुक्राणुओं के लिए भी खतरनाक साबित हो सकता है. नेशनल अकेडमी आफ साइंस की पत्रिका में प्रकाशित कनाडा में हुए इस अध्ययन के अनुसार वायु प्रदूषण से न केवल शुक्राणुओं की संख्या घटती है बल्कि संबंधित डीएनए में होने वाले बदलाव के कारण आने वाली पीढि़यों में भी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

अध्ययन के तहत कैनेडा और अमेरिका के नेशनल सेंटर फार टाक्सीकोलोजीकल रिसर्च के अनुसंधानकर्ताओं ने दस हफ्तों तक चूहों पर हैमिल्टन हार्बर इलाके की प्रदूषित हवा का प्रभाव देखा. इस दौरान उन्होंने पाया कि स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषण झेलने वाले चूहों के शुक्राणुओं का डीएनए 60 फीसदी तक बदल गया.

वैज्ञानिक इस बात को लेकर भी हैरान थे कि प्रदूषण दूर किए जाने के बाद भी शुक्राणुओं में डीएनए संबंधी बदलाव जारी रहे. गौरतलब है कि ये परिणाम पहले हुए एक अध्ययन की पुष्टि करते हैं, जिसके अनुसार स्वस्थ हवा में सांस लेने वाले चूहों के मुकाबले प्रदूषित वातावरण में पलने वाले चूहों के बच्चों के डीएनए में दोगुने बदलाव देखे गये.

पर्यावरण संरक्षण के लिए आनलाइन सेवा

मोनाको। संयुक्त राष्ट्र ने धरती के पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के उपायों पर सभी देशों के बीच विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाने के लक्ष्य से क्लाइमेट न्यूट्रल नेटवर्क शीर्षक से एक आनलाइन सेवा की शुरूआत की है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के विषय पर यहां आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के मौके पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम के अध्यक्ष आचिम स्टेनर ने इस सेवा का शुभारंभ करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य पर्यावरण संरक्षण खासतौर पर ग्रीन हाउस गैसों की कटौती के संबंध में विचारों के आदान-प्रदान को सुगम बनाना है।

उन्होंने कहा कि इस सेवा का लाभ उन देशों को मिलेगा जो धरती के तापमान को बढ़ाने वाली ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए प्रयासरत है और पूरी शिद्दत से इस दिशा में काम कर रहे हैं। बाली में गत वर्ष दिसंबर में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित सम्मेलन के बाद मोनाको का यह सम्मेलन पर्यावरण के मुद्दे पर आयोजित दूसरा सबसे बड़ा सम्मेलन है जिसमें दुनिया के तकरीबन 154 देश और सैकड़ों पर्यावरण विशेषज्ञ शिरकत कर रहे हैं।

सम्‍मेलन के मेजबान मोनाको ने इस मौके पर कहा कि वह यूएनईपी परियोजना के तहत कोस्टा रिका आईसलैंड, नार्वे और न्यूजीलैंड के समान ही ग्रीन हाउस गैसों में मानक कटौती के प्रयास करेगा। कार रैलियों के आयोजन के लिए पूरी दुनिया में विख्यात मोनाको ग्रीन हाउस गैसों का एक बड़ा उत्सर्जक देश माना जाता है लिहाजा इस बार उसने इन हानिकारक गैसों की कटौती के पहल के तहत यह प्रयास शुरू किए हैं।

शनिवार, २३ फरवरी २००८

सुरा का सुरूर भी बदलेगी ग्लोबल वार्मिग


यह जानकारी सिर्फ इतना दर्शाने के लिए है कि ग्‍लोबल वार्मिंग का असर कितने व्‍यापक पैमाने पर हो रहा है. शराब स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक है और इस जानकारी का उद्देश्‍य इसका महिमा मंडन करना कतई नहीं है.

ग्लोबल वार्मिग का हाल यही रहा तो वाइन के सुरूर का तर्ज ही बदल जाएगा। वाइन उत्पादक दुनिया का नक्शा पलट जाएगा। ऐसा विशेषज्ञों का मानना है। 'वाइन एंड क्लाइमेट चेंज' पर दूसरे अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस को संबोधित करते हुए फ्रांस के इनरा एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रमुख बर्नार्ड सेगुइन का कहना था-जिन अंगूरों से वाइन बनती है, उनकी फसल ग्लोबल वार्मिग के कारण दस दिन पहले ही तैयार होने लगी है। इसका खामियाजा वाइन और उसके उत्पादन पर पड़ना तय है।

इस कांग्रेस में स्पेन, फ्रांस, अमेरिका, न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया सहित 36 देशों के 350 से ज्यादा विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे थे। इसका समापन हुआ शनिवार को अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति अलगोर के संबोधन से। सेगुइन का कहना था-अगर तापमान दो या तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ता है तो हम बोर्डीआक्स, रियोजा और बरगुंडी जैसी वाइन की गुणवत्ता को बचाए रखने का उपाय कर सकते हैं। लेकिन अगर तापमान में वृद्धि पांच से छह डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गई तो वाइन उद्योग को बड़ी समस्या का सामना करना पड़ जाएगा।

स्पेन के फर्नाडो जमोरा का कहना था कि अधिक गर्मी और वर्षा के अभाव में समय से पहले पक जाने पर अंगूर क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। अगर अंगूर जल्दी पक जाते हैं तो उनके शर्करा ज्यादा गाढ़ा जाता है। अम्लीयता कम हो जाती है और पीएच स्तर भी बढ़ जाता है। ऐसे अंगूर से बनी वाइन में अल्कोहल का स्तर ज्यादा और अम्लीयता कम होती, नतीजतन कड़वाहट बढ़ जाती है।

शुक्रवार, २२ फरवरी २००८

पानी गर्म होने से सब नष्‍ट होगा... अंटार्कटिक

दूसरा व अंतिम भाग। इस लेख का पहला भाग यहां पढ़ें

ग्लोबल वार्मिग अगर ऐसे ही बरकरार रही तो अंटार्कटिका का समुद्री जीवन शार्क, केकड़ों और अन्य परभक्षियों के आक्रमण से बर्बाद हो जाएगा। वैज्ञानिकों के अनुसार जैसे-जैसे अंटार्कटिका के वातावरण का तापमान बढ़ रहा है, शार्क वहां पहुंचती जा रही हैं। प्रोफेसर कैरिल विल्गा के अनुसार हालांकि शार्क की रफ्तार केकड़ों की तुलना में कुछ धीमी ही है। केकड़े तेजी से वहां की ओर बढ़ रहे हैं। वे वहां पहुंचने में सफल हुए नहीं कि वहां पाए जाने वाले जीवों को चट करना आरंभ कर देंगे।

अमेरिका में रोड आइसलैंड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर विल्गा उस अंतरराष्ट्रीय दल के प्रमुख हैं जो इस समय इस महाद्वीप पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन कर रहा है। अंटार्कटिका के समुद्र की तलहटी में पाए जाने वाले कई जीव-जंतु पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे अनोखे जीवों में शामिल हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार जो जातियां वहां पाई जाती हैं, उनकी आबादी के अनुपात में शार्क और अन्य बड़ी मछलियों के वहां जाने से आमूलचूल परिवर्तन आएगा। ब्रिटेन में साउथेंप्टन विश्वविद्यालय स्थित नेशनल ओसेनोग्राफी सेंटर के डाक्टर स्वेन थैट्जी कहते हैं कि अंटार्कटिका के उथले पानी में रहने वाले जंतु धरती पर अनोखे हैं क्योंकि लाखों वर्षो में उन्होंने बहुत ही ठंडे पानी में विकास किया है।

अंटार्कटिका में शीत की प्रक्रिया चार करोड़ वर्ष पहले आरंभ हुई थी। इसकी वजह से सभी विशालकाय परभक्षी जैसे शार्क और केकड़े वहां से चले गए। ये इतने ठंडे वातावरण में नहीं रह सके थे। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि तुरंत स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयास नहीं किए गए तो दुनिया में आखिरी बचे इस मूल वातावरण को कायम रखना असंभव हो जाएगा। अल्बामा में डुफिन आइसलैंड सी लैबोरेटरी के डाक्टर रिचर्ड अरोनसन के मुताबिक अब हमें अंटार्कटिका में कार्रवाई करनी ही पड़ेगी।

गुरुवार, २१ फरवरी २००८

गर्म हो रहा है अंटार्कटिक का जल

अंटार्कटिक के जल का तापमान बढ़ रहा है और साथ ही समुद्र का जल स्तर भी ऊंचा हो रहा है। दक्षिणी महासागर के तापमान में बदलाव के रिकार्ड का अध्ययन करने पर यह बात सामने आई है। अंटार्कटिक क्षेत्र में आस्ट्रेलिया, फ्रांस और अमेरिका के संयुक्त कार्यक्रम के तहत पिछले 15 साल के आंकड़े एकत्रित किए गए जिसके बाद आस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने हाल ही में यह बात कही। कार्यक्रम में आस्ट्रेलियाई दल का नेतृत्व करने वाले स्टीव रिनटाउल ने कहा कि प्राप्त आंकड़ों के आधार पर वैज्ञानिक अंटार्कटिक जल की प्रवृत्ति का अध्ययन कर सकेंगे। वह यह भी बता सकेंगे कि इसका वैश्विक जलवायु पर क्या असर पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अभी तक जो आंकड़े उन्‍हें मिले हैं उनके अनुसार अंटार्कटिक का तापमान बढ़ रहा है। विशेष रूप से समुद्र के ऊपरी भाग में तापमान में खासी बढ़ोतरी हुई है। दुनिया भर में समुद्र के जल का तापमान बढ़ रहा है। बहरहाल हाल के अध्ययन से अब यह भी साबित हो गया है कि दक्षिणी महासागर की गहराई में भी तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। दक्षिणी महासागर में तापमान में जो परिवर्तन हो रहा है वह दुनिया के अन्य भागों के मुकाबले कम है। लेकिन महासागर गर्मी को जमा करते जा रहे हैं जो ठीक नहीं है।


उन्होंने कहा कि इसका मतलब है दक्षिणी महासागर में तापमान बढ़ता जा रहा है। इसका प्रभाव समुद्र के जल स्तर पर भी पड़ेगा क्योंकि गर्म जल का विस्तार होता है और इसके साथ समुद्र का जल स्तर भी बढ़ता है। जिस क्षेत्र में यह कार्यक्रम चलाया गया वहां पिछले करीब एक दशक में समुद्र का जल स्तर तीन सेंटीमीटर बढ़ गया है।
इस विषय पर और जानकारी अगले भाग में पढ़ें

विश्व के 24 शहरों में होगा ब्लैक आउट

ग्लोबल वार्मिग के प्रति जागरूकता अभियान चलाने के लिए अर्थ आवर कार्यक्रम के तहत विश्व के 24 शहरों में अगले महीने बत्तियां बुझाकर अंधेरा कर दिया जाएगा। अर्थ आवर पहल पिछले साल ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े शहर सिडनी से शुरू हुई थी। वहां के लगभग 22 लाख लोगों ने चांदनी रोशनी से नहाए सिडनी ऑपेरा हाउस को छोड़कर अपने-अपने घरों, प्रतिष्ठानों तथा हार्बर ब्रिज की बत्तियां बुझाकर उन्हें अंधेरे में डुबो दिया था।

ग्रीन हाउस गैसों में कटौती करे भारत-चीन: दूसरी ओर अनुमान से कहीं तेज रफ्तार से बढ़ रहे वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निबटने की मुहिम के तहत चीन और भारत जैसे विकासशील देशों से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए सख्त और प्रभावी कदम उठाने की अपील की गई है। जलवायु परिवर्तन पर आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा में जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके खतरे तेजी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में इससे निबटने के लिए वर्ष 2020 तकनिर्धारित लक्ष्य हासिल करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों में कटौती के लिए और सख्त कदम उठाने होंगे। आस्ट्रेलिया के शीर्ष पर्यावरण सलाहकार रास गारनाट के अनुसार इस दिशा में तेजी से बढ़ने की जरूरत है। आस्ट्रेलिया समेत भारत और चीन जैसे विकासशील देशों को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय पैनल की ओर से अब तक जारी आंकलन रिपोर्ट के आंकड़े पुराने हो चुके हैं। इसमें जलवायु परिवर्तन की जो रफ्तार दर्शाई गई है वह उससे कहीं तेजी से बढ़ रहा है इसलिए इसके लिए सुझाए गए उपायों में और सख्ती लानी है। रिपोर्ट में कार्बन कटौती के लिए दो स्तरीय सुझाव दिए गए हैं जिसके अनुसार पहले स्तर पर ये उपाय क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर होने हैं जबकि दूसरे स्तर पर यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने हैं जिसमें आस्ट्रेलिया, भारत और चीन जैसे देशों को अहम भूमिका निभानी है।

रविवार, १० फरवरी २००८

एक गोरिल्‍ला की शवयात्रा

एक गोरिल्‍ला की शवयात्रा
विश्‍व प्रेस फोटोग्राफी अवार्ड के समसामयिक मुद्दों के वर्ग में प्रथम स्थान दक्षिण अफ़्रीका के छायाकार ब्रेंट स्टर्टन को मिला. न्यूज़वीक पत्रिका के लिए उन्होंने ये तस्वीर खींची थी जिसमें कॉंगो के विरुंगा नेशनल पार्क से एक मृत पहाड़ी गोरिल्ला को उठाकर ले जाते लोगों का दृश्य है.

प्रकृति



विश्‍व प्रेस फोटोग्राफी अवार्ड के प्रकृति वर्ग में इस तस्वीर को दूसरा पुरस्कार मिला है.
कनाडा के पॉल निकलेन ने ये तस्वीर कनाडा में खींची.



दोनों तस्‍वीरें बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार

मंगलवार, ५ फरवरी २००८

प्रशांत महासागर में प्लास्टिक का समुद्री कचराघर

विश्व का सबसे बड़ा महासागर प्रशांत जल्द ही प्लास्टिक महासागर में तब्दील हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई चेतावनियों के बावजूद लोग प्रशांत महासागर में कूड़ा-करकट डालना जारी रखे हुए हैं। इससे यह महासागर कूड़े के ढेर में तब्दील होता जा रहा है और पानी में गंदगी फैल रही है।

अमेरिकी संस्था अल्गेलिता मेरीन रिसर्च फाउंडेशन के अनुसंधान निदेशक मा‌र्क्स एरिकसन ने कहा कि प्रशांत महासागर में प्लास्टिक और अन्य तरह का कचरा डाले जाने से यह अपने वास्तविक स्वरूप को खो रहा है। यदि यह सिलसिला रुका नहीं तो प्रशांत महासागर प्लास्टिक महासागर के रूप में अपनी पहचान बना लेगा। यह स्थितिन केवल समुद्री जीवों, बल्कि मनुष्यों के लिए भी घातक होगी।

अमेरिकी वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर में प्लास्टिक का समुद्री कचराघर तैयार हो गया है। यह कचराघर हवाई से जापान तक फैलता जा रहा है। दि इंडिपेंडेंट ने एरिकसन के हवाले से लिखा है कि प्लास्टिक का यह कचराघर क्षेत्रफल के हिसाब से अमेरिका से दुगना बड़ा हो सकता है। प्रशांत महासागर में प्लास्टिक के इस समुद्री कचराघर को 1997 में लास एंजिलिस से हवाई तक हुई नौका दौड़ के दौरान खोजा गया था।

यह समुद्री कचराघर वास्तव में दो जुड़े हुए क्षेत्र हैं। ये हवाई द्वीप के दोनों ओर स्थित हैं। ये पूर्वी व पश्चिमी प्रशांत कूड़ा पट्टी के रूप में जाने जाते हैं। इनका करीब पांचवां हिस्सा जहाजों और तेल संयंत्रों से फेंका गया कूड़ा है, जबकि बाकी का कचरा जमीन से इसमें डाला गया है। पिछले 15 साल से इसपर नजर रखे कर्टिस एबिसमेयर के अनुसार यह सुरसा के मुंह की तरह बढ़ता ही जा रहा है।

हवाई विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डेविड कार्ल के अनुसार प्लास्टिक समुद्री कचराघर के आकार और व्यवहार का पता लगाने के लिए और ज्यादा अनुसंधान की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अल्गेलिता की खोज पर शक करने का कोई कारण नहीं है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार प्लास्टिक के कचरे से हर साल दस लाख से अधिक समुद्री जीवों की मौत होती है। मृत पाए जाने वाले समुद्री जीवों के पेट में सिगरेट लाइटर और टूथब्रश पाए जाते हैं, क्योंकि समुद्र में डाले जाने वाले प्लास्टिक के इन अपशिष्ट पदार्थो को समुद्री जीव गलती से भोजन समझ कर खा जाते हैं।

सोमवार, ४ फरवरी २००८

फैशन जगत में अब इको फ्रैंडली कपड़े

फैशन जगत में अब इको फ्रैंडली कपड़ों का दबदबा बढ़ने लगा है। दुनिया भर के फैशन डिजाइनरों का ध्यान अब इको फ्रैंडली कपड़ों की ओर लगा है। लॉस एंजिल्स से लेकर टोरंटो तक आयोजित फैशन शो में इको फ्रैंडली कपड़ों का प्रदर्शन जोर-शोर से किया जा रहा है। पिछले साल लॉस एंजिल्स में आयोजित मर्सिडिज बेंज फैशन वीक के दौरान पर्यावरण हितैषी कपड़ों का बोलबाला रहा। इसमें भाग लेने वाले तमाम फैशन डिजाइनर्स ने अपने लेटेस्ट ट्रेंड में इको फ्रैंडली कपड़ों पर जोर दिया।

फैशन डिजाइनरों का कहना है कि ऐसे कपड़े न सिर्फ पर्यावरण संरक्षण में मददगार होते हैं, बल्कि सेक्सी लुक भी देते हैं। इस फैशन शो की थीम भी 'द ग्रीन इनिशिएटिव' रखी गई थी। कनाडा के एक फैशन मॉल में भी इन दिनों ग्रीन फैशन का बोलबाला है। सभी बड़े फैशन मॉल में सिंथेटिक कपड़ों की जगह पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने वाले कपड़े नजर आ रहे हैं।

फैशन डिजाइनर और स्टोर मालिक भी लोगों की भारी माँग को पूरा करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए तमाम फेब्रिक कंपनियों ने वर्ष 2008 के लिए नई स्टाइल और लुक वाले कपड़े और उनके साथ की एक्सेसरीज लांच करने की तैयारी पूरी कर ली है। इनमें कपड़ों के मटेरियल से लेकर रंगों तक में जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है।

ऑर्गनिक ट्रेड एसोसिएशन (ओटीए) का कहना है कि आगामी तीन वर्षों में जैविक कपड़ों के बाजार में जबर्दस्त उछाल आने की संभावना है। वर्ष 2006 की ही बात करें तो इस वर्ष 2005 की तुलना में अमेरिका में 160 मिलियन डॉलर का मुनाफा हुआ। एसोसिएशन ने अनुमान लगाया है कि जैविक कपड़ों का बाजार आगामी तीन वर्षों में 116 फीसदी प्रतिवर्ष की रफ्तार से बढ़ेगा।


टोरंटो की फैशन डिजाइनर एनी थॉम्पसन कहती हैं कि इको फ्रैंडली कपड़ों का बाजार गर्म हो रहा है। लोगों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ रही है, ऐसे में इको फ्रैंडली कपड़ों की रेंज लोगों को काफी पसंद आ रही है। एनी ने अपनी नई रेंज तैयार करने में केमिकल का अत्यंत कम उपयोग किया है। उन्होंने ज्यादातर बाँस, वाइल्ड सिल्क, फूलों के फर, सोया और अन्य जैविक पदार्थों का इस्तेमाल किया है। उनका यह कलेक्शन संभवतः अगले महीने तक बाजार में छा जाएगा।

रविवार, ३ फरवरी २००८

कार है ग्‍लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण

वैज्ञानिकों के एक शोध के मुताबिक ग्लोबल वार्मिंग का सबसे बड़ा कारण परिवहन साधन हैं। इनमें कार सबसे ज्यादा है। कार के बाद ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने का दूसरा कारण विमानन क्षेत्र है। परंतु पानी के जहाज का मामला बेहद जटिल है। एनवायरमेंटल न्यूज नेटवर्क की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीआईसीईआरओ (सेंटर फॉर इंटरनेशनल क्लाइमेट एंड एनवायरमेंटल रिसर्च) के पाँच शोधकर्ता ने यह शोध किया है। इन्होंने परिवहन क्षेत्र को चार उपक्षेत्रों में बाँटा। इनमें स़ड़क परिवहन, उड्डयन, रेल और जहाजरानी हैं।

शोध करने वाले दल ने प्रत्येक उपक्षेत्र का ग्लोबल वार्मिंग में योगदान को आँका। इसके लिए रेडिएटिव फोर्स (आरएफ) को देखा, जो गाड़ियों से निकलने वाले धुएँ से होता है। अध्ययन का नतीजा यह निकला कि औद्योगिकीकरण के पहले से 15 प्रतिशत आरएफ मानव निर्मित कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन से होता है। परिवहन क्षेत्र इसकी जड़ है।

ओजोन के लिए परिवहन को 30 प्रतिशत तक जिम्मेदार माना जा सकता है। अध्ययन कहता है कि ज्यादा से ज्यादा ध्यान तेजी से बन रही सड़कों की ओर भी दिया जाना चाहिए। अकेले कार्बन डायऑक्साइड के उत्सर्जन में सड़क यातायात ने दो-तिहाई योगदान दिया है। अगले सौ साल में यह स्थिति और बिगड़ती जाएगी। यानी सड़क यातायात का योगदान ग्लोबल वार्मिंग में तेजी से बढ़ेगा।

जहाँ तक पानी के जहाजों की बात है तो स्थिति और जटिल है। अभी तक यह माना जाता रहा है कि जहाजों से ज्यादा नुकसान नहीं होता। कारण जहाजों से सल्फर डायऑक्साइड और नाइट्रोजन उत्सर्जित होती है। इनका असर ठंडा होता है। चूँकि ये गैसें ज्यादा समय तक वातावरण में नहीं रहती हैं और आने वाले समय में कार्बन डायऑक्साइड इसका असर खत्म कर देगी।

शुक्रवार, १ फरवरी २००८

सन् 2007 में 3 लाख 30 हजार टन... लेकिन क्‍या?

मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन फॉर इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी (एमएआईटी) की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 2007 में भारत में 3 लाख 30 हजार टन इलेक्ट्रॉनिक कचरा निकला, जिसमें से केवल 19 हजार टन को रिसाइकल किया जा सका। रिपोर्ट में बताया गया है कि केवल टेलीविजन और कम्प्यूटर से 56,324 टन कचरा निकला, जिसमें से केवल 12 हजार टन को ही प्रोसेस किया गया। बाकी कचरा पर्यावरण संतुलन के लिए गंभीर खतरा बन रहा है।


एचसीएल इंफोसिस्टम्स के कार्यकारी उपाध्यक्ष जॉर्ज पॉल कहते हैं कि भारत में बड़े पैमाने पर रिसाइकल प्लांट की जरूरत है जिसमें सरकार को सहयोग करना चाहिए।एक अध्ययन के मुताबिक चीन और जापान में इलेक्ट्रॉनिक कचरा गंभीर परेशानी का कारण बनता जा रहा है। भारत की अपेक्षा उन देशों में अत्यधिक मात्रा में ई-वेस्ट निकलता है। प्रोसेस की प्रक्रिया तेज होने के बावजूद वहाँ ई-वेस्ट का समुचित निपटारा नहीं हो पाता है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रॉनिक पदार्थों में कई खतरनाक रसायन होते हैं जो स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। जागरूकता की कमी और नष्ट करने की मुश्किल प्रक्रिया के कारण भारत में ई-वेस्ट को रिसाइकल करने का कोई भी प्रोजेक्ट पूरी तरह सफल नहीं हो पा रहा है।

सच्‍चई यह है कि इलेक्ट्रॉनिक चीजों का बाजार जिस तेजी से बढ़ रहा है उतनी तेजी से इलेक्ट्रॉनिक कचरे को नष्ट करने का काम नहीं हो पा रहा है। अब यही इलेक्ट्रॉनिक कचरा न सिर्फ भारत बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए मुसीबत का कारण और बीमारियों का घर बनता जा रहा है।


नईदुनिया से साभार

दुनिया के सबसे नए प्राणी की खोज

वैज्ञानिकों ने तंज़ानिया के पहाड़ियों में एक नए स्तनधारी जीव की खोज की है जो चूहे की शक्ल का है. इस नए अनोखे प्राणी को 'रिनोकोस्यॉन उडज़ुंग्वेंसिस' नाम दिया गया है. इसे अफ़्रीका में पाए जाने वाले चूहे जैसे प्राणी 'एलिफैंट श्रियू' की ही एक नस्ल माना जा रहा है जिसके पैर लंबे होते हैं और जिसका मुँह निकला हुआ होता है.

'ज़ूलॉजी' पत्रिका में इस प्राणी की खोज की ख़बर छापी गई है. बिल्ली के आकार के इस जीव को छोटे हिरन और चींटी खाने वाले दंतविहीन प्राणियों के बीच की संकर प्रजाति माना जा रहा है. इसका चेहरा स्लेटी रंग का और थूथन लंबा और लचकदार है. पीले और भूरे रंग वाले इस जीव की टांगें नुकीली हैं.


शोध की पुष्टि करने वाले कैलीफोर्निया अकादमी ऑफ साइंस के डॉक्टर ग्लेन रथबन ने कहा, “यह मेरे अब तक के करियर की सबसे रोमांचक खोजों में से एक है. एलिफैंट श्रियू केवल अफ़्रीका में पाए जाते हैं. ये नाम इसलिए रखा गया क्योंकि इनका ऊपरी हिस्सा अमरीका और यूरोप के श्रियू से मिलता जुलता है." वास्तव में इस प्राणी का संबंध दस करोड़ साल पहले के अफ़्रीकी स्तनधारियों के समूह से माना जा रहा है.

इस नई प्रजाति को सबसे पहले वर्ष 2005 में तंज़ानिया में डुंडुलु जंगलों की उडज़ुंगवा पहाड़ियों पर फ़िल्माए दृश्यों में देखा गया था. ये फ़िल्म इटली में ट्रेन्टो म्युज़ियम ऑफ नेचुरल साइंस के फ़्रैंसेस्को रोवरो ने बनाई थी. डॉक्टर रथबन ने कहा, “जब मैंने ये तस्वीरे देखी तो मुझे सब नया लगा लेकिन केवल तस्वीरों के आधार पर कुछ कहना मुमकिन नहीं था. फिर मार्च 2006 में हम वहाँ दोबारा गए और कुछ नमूने लिए.”


वैज्ञानिकों का कहना है अभी रिनोकोस्यॉन उडज़ुंग्वेंसिस नामक इस प्राणी के बारे में काफ़ी कुछ जानना बाक़ी है लेकिन उनका मानना है कि आगे शोध में इस तरह के जानवरों और उनके रहन-सहन के बारे में जानने को मिलेगा. तंज़ानिया की उडज़ुंगवा पहाड़ियों में जैव विविधता से भरी पड़ी है. इस नई प्रजाति के अलांवा बंदर की नई प्रजाति किपुंजी भी वहीं पाई गई थी.

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार