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Friday, March 14, 2008

शहरीकरण का बोझ नहीं सह पाएगा धरती का पर्यावरण

चाहे शहरी चकाचौंध का आकर्षण हो या रोटी कमाने की मजबूरी लेकिन सच यह है कि दुनिया की करीब आधी आबादी शहरों में बसने लगी है। वातावरण में हर साल कार्बन डाईआक्साइड के रूप में घुलने वाले जहर की 80 फीसदी मात्रा इन्हीं लोगों की वजह से है। विशेषज्ञ बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि धरती की जलवायु का हश्र इसी बात पर निर्भर करता है कि हम अपने शहरों को कैसे सजाते-संवारते हैं। वे यह भी कहते रहे हैं कि शहरों का भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि अगले 20 साल में शहरों पर लगातार बढ़ रहे बोझ को किस तरह नियंत्रित किया जाता है।

हम जैसों के लिए ज्‍यादा चिंता : भारत जैसे विकासशील देशों के संदर्भ में यह चेतावनी कुछ ज्यादा ही गंभीर है। वजह यह कि व‌र्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के मुताबिक विकासशील देशों में शहरी आबादी साढ़े तीन फीसदी सालाना की दर से बढ़ रही है, जबकि विकसित देशों में यह दर एक फीसदी से भी कम है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक अगले 20 सालों में शहरों की आबादी जितनी बढ़ेगी, उसका 95 फीसदी बोझ विकासशील देशों पर ही पड़ेगा। यानी 2030 तक विकासशील देशों में दो अरब और लोग शहरों में रहने लगेंगे।

संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अगर शहरों पर बढ़ रहे बोझ और प्रदूषण को नियंत्रित नहीं किया गया तो एक करोड़ से ज्यादा आबादी वाले बड़े शहरों पर भविष्य में बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं का खतरा काफी बढ़ जाएगा। दुनिया के ऐसे 21 बड़े शहरों में से 75 फीसदी विकासशील देशों में ही हैं। कुछ आंकड़ों के मुताबिक 2015 तक ऐसे 33 में से 27 शहर विकासशील देशों में होंगे।

बढ़ती संख्या, घटती सुविधाएं: शहरों पर ज्यों-ज्यों बोझ बढ़ रहा है, लोगों को मिलने वाली सुविधाएं घट रही हैं। बेहतर जिंदगी की चाह में लोग शहरों की ओर भागते हैं, लेकिन वास्तव में उन्हें मुसीबतें ही मिलती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक विकासशील देशों में 70 फीसदी से ज्यादा [करीब 90 करोड़] आबादी झुग्गी-झोपड़ियों में रहती है। वर्ष 2020 तक यह संख्या दो अरब हो जाने का अनुमान है। ऐसे में जहां उनके लिए स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ती हैं, वहीं पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है।

प्रदूषण की कीमत: शहरों में विकास और बढ़ती जनसंख्या के चलते प्रदूषण भी खूब बढ़ रहा है। तेजी से विकास कर रहे चीन के खाते में दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 16 शहर हैं। प्रदूषण के चलते शहरों में हर साल करीब दस लाख लोग समय से पहले मर जाते हैं। इनमें ज्यादातर विकासशील देशों के ही होते हैं।

3 comments :

Vikas said...

बड़े शहरों में तो विकास बिना किसी प्लानिंग हुआ और प्रदूषण अपने चरम पर है. क्या आपको नही लगता अगर प्लानिंग की जाए तो छोटे शहरों को बचाया जा सकता है? यहा पर मैंगलूर और बैंगलूर का उदाहरण लें सकते है. बैंगलूर मे विकास तेज़ गति से हुआ और प्रदूषण अपने चरम पर है, मैंगलूर मे कई कंपनियों ने अपने पाव पसार दिए है और जहा तहाँ इमारते खड़ी हो रही हैं.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

सहज-सरल शैली में मौज़ूदा दौर की
जटिल समस्या पर प्रकाश डाला आपने .
एक तरफ विजन-२०२० की पुरजोर चर्चा है,
दूसरी ओर वक्त की इसी दहलीज पर झुग्गियों
की तादात के आपके आँकड़े
सोचने-समझने को बाध्य करते हैं.

पोस्ट उपयोगी है.

मीनाक्षी said...

पर्यानाद जी

कई दिनों से पर्यानाद पर पर्यावरण से जुड़ी खबर नहीं पढ़ी तो सोचा कि आज हम ही आपको अपने शहर में होने वाली एक घटना के बारे में बताएँ.
अरब देशों में दुबई सबसे पहला देश है जो अर्थ ऑवर मनाने की पहल कर रहा है और दुनिया के दूसरे देशों के साथ इस काम में लग रहा है. आज शाम को 8 बजे से 9 बजे तक बिजली बन्द करके सभी इस काम में भागीदार बनेंगे.
घर में सब काम बिजली से होते हैं. यहाँ तक कि अगर चाय का प्याला भी पीना है तो बिजली की ही ज़रूरत होती है. फिर भी ग्लोबल वार्मिंग को कम करने के लिए अगर हम सब सोच लें कि एक एक जुगनू मिलकर अन्धकार का नष्ट कर सकते हैं. यही सोचकर सिर्फ आज ही नहीं बल्कि हर दिन एक घंटे के लिए हम अपने घर की बिजली बन्द रखेंगे.
मीनाक्षी

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