जरा इस खबर पर नजर डालें और सोचें कि हमारे देश में चिंकारा के शिकार का मामला कितने सालों से चल रहा है? अब तक इस मामले का कोई फैसला क्यों नहीं हो सका ? भारत में प्रभावशाली लोगों के खिलाफ वन्य जीवों पर अत्याचार के मामलों में कोई कार्रवाई नहीं होती लेकिन वे कानून से ऊपर नहीं हैं.
खतरे में पड़ी प्रजाति के दो पक्षियों को गोली मारकर शिकार करने के मामले में पुलिस ने प्रिंस हैरी से पूछताछ की. बकिंघम पैलेस ने कहा कि पक्षियों का शिकार करने की यह घटना नारफोक के नजदीक रॉयल एस्टेट में आज ही यानि बुधवार को हुई. हेन हैरियर्स नाम के दो पक्षियों का गोली मारकर शिकार किया गया. बकिंघम पैलेस ने कहा कि घटना के समय अपने एक मित्र के साथ प्रिंस हैरी संबंधित क्षेत्र में थे. पुलिस ने संभावित वन्यजीव अपराध के तहत हैरी से पूछताछ की. हेन हैरियर्स पक्षी को रॉयल सोसायटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स ने विलुप्त हो रही प्रजाति में शामिल कर रखा है. इस पक्षी को शिकारी अक्सर अपना शिकार बनाते रहते हैं. ब्रिटेन में हेन हैरियर्स के प्रजनन करने योग्य सिर्फ 521 जोड़े बचे हैं.
बुधवार, ३१ अक्तूबर २००७
प्रिंस हैरी से की पुलिस ने पूछताछ
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ग्यारह हजार साल बाद मनुष्य की दो नस्लें
प्रकृति से छेड़छाड़ के अंतत: भयावह नतीजे सामने आएंगे. कुछ हद तक यह शुरू भी हो चुका है लेकिन मानव को इसकी चिंता नहीं है. हर रोज ऐसे समाचार सामने आ रहे हैं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ रहा. यह बेहद चिंता का विषय है. एक ताजातरीन खोज के बारे में जानकारी देता यह समाचार पढ़ना काफी रोचक है. आप भी पढ़ें और कल्पना करें कि क्या होगा तब, जब यह कल्पना सच्चाई ? यह मानव के कथित विकास की गाथा है या उसके विनाश की?
विश्व प्रसिद्ध लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स की मानें तो अगले 11 हजार वर्षों में मानव जाति दो अलग-अलग नस्लों में बँट जाएगी. एक नस्ल आकर्षक, बुद्धिमान और शासन करने वाली होगी, जबकि दूसरी मूर्ख, बदसूरत और दिखने में पिशाचों-सी होगी. यह निष्कर्ष लंबे शोध के बाद स्कूल के अग्रणी विकासवादी वैज्ञानिक डॉ. ओलिवर करी ने निकाला है. डॉ. करी के अनुसार मानव जाति शारीरिक तौर पर सन 3000 तक चरम पर पहुँच जाएगी. उसके बाद उसका पतन होना शुरू हो जाएगा. उनके अनुसार जब मानव शारीरिक तौर पर अपने चरम पर होगा तब उसकी औसत लंबाई 6 से 7 फुट तक होगी तथा उसका औसत जीवन भी 120 वर्षों तक का होगा.
यहाँ पुरुषों के लिए प्रसारित होने वाले सेटेलाइट चैनल 'ब्रॉवो' को एक रिपोर्ट में डॉ. करी ने कहा कि उस समय मानव की शारीरिक क्षमता कई स्तरों पर आँकी जाएगी जिसमें उसके स्वास्थ्य के साथ-साथ पुरुषों और महिलाओं की उत्पादकता और योग्य साथी की तलाश मुख्य पैमाना होगी. उस समय के पुरुषों की आवाज गहरी और ज्ञानेन्द्रिय बड़ी होगी. इसी तरह महिलाओं के सिर के बाल चमकीले होंगे, त्वचा केश रहित होगी तथा आँखें बड़ी होंगी. आज से 10 हजार साल बाद जब मानव सभ्यता अपने चरम पर होगी और उसके पास तकनीक भी विश्वसनीय होगी तब मानव दिखने में भी बिलकुल भिन्न हो जाएगा.
डॉ. करी के अनुसार वह स्थिति ठीक वैसी ही होगी जैसी मशहूर साइंस फिक्शन लेखक एचजी वैल्स के उपन्यास 'द टाइम मशीन' में बताई गई है. उस समय हम दवाइयाँ खा-खाकर अपनी प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर चुके होंगे और शक्ल में बच्चों जैसे दिखेंगे. अगली शताब्दी तक ही हम तकनीक के मामले में इतने आगे बढ़ चुके होंगे कि सब कुछ विज्ञान को आधार बनाकर किया जाएगा. हमारी प्राकृतिक चीजें धीरे-धीरे नष्ट होती जाएँगी. उसके बाद जमाना 'हैव' और 'हैव नॉट' का आएगा. यानी कुछ लोगों के पास बहुत कुछ होगा तो कुछ के पास कुछ भी नहीं.
सोचें: तब हम यानि भारतवासी किस वर्ग में शामिल होंगे ... ''हैव'' वालों में या ''हैव नॉट'' वालों में?
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मंगलवार, ३० अक्तूबर २००७
उपयोगी जानकारी
कुछ साथियों के मन में यह सवाल उठ सकता है कि यदि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली किसी गतिविधि के विरोध में वे आवाज उठाना चाहें तो क्या करना होगा ? इस संबंध में कुछ उपयोगी जानकारी जुटाने का प्रयास कर रहा हूं और शीघ्र ही इस बारे में आपको एक सूचनात्मक लेख पढ़ने का अवसर मिलेगा. मेरा अनुरोध सिर्फ इतना है कि जीवों के खिलाफ अत्याचार और प्रकृति से छेड़छाड़ के प्रति 'मुझे क्या लेना देना' या 'मैं क्या कर सकता हूं'... ऐसे रवैये को छोड़ने और विरोध में आवाज उठाने का प्रयास हर व्यक्ति को करना चाहिए.
यह सोचने से कुछ नहीं होगा कि भला अकेला मैं क्या कर सकता हूं. चंडी प्रसाद भट्ट हों या चिको मेंडिस, पहला विरोध का स्वर उन्होंने अकेले ही बुलंद किया था. बाद में तो स्वयंमेव लोग जुड़ते चले गए. मैं जानता हूं कि हममें से कई व्यक्ति कुछ कहना चाहते हैं, करना भी चाहते हैं लेकिन अकेले होने के कारण पहल का साहस नहीं जुटा पाते. बात सिर्फ इतनी है कि अपनी सोई हुई अंतरात्मा को जाग्रत करना है. उसकी आवाज को सुनना है और उसे बुलंद करना है. अकेले पहला कदम उठा कर देखिए खुद-ब-खुद साथियों का कारवां जुटता चला जाएगा. कोई संगठन बनाने या आंदोलन चलाने की आवश्यकता नहीं है. बस जाग्रत रहना है और अपनी अंतरातमा की आवाज बुलंद करना है.
बकौल दुष्यंत
कैसे आकाश में सूराख नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो.
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सबको है जीने का अधिकार
एक सीधी सी बात है कि धरती पर कोई भी जीव अकारण नहीं है. प्रकृति ने प्रत्येक जीव की कोई न कोई भूमिका निर्धारित कर रखी है. इस जीव चक्र की सभी कड़ियों का सुरक्षित रहना बेहद महत्वपूर्ण है. एक भी कड़ी टूटने का अर्थ है प्रकृति के विधान में हस्तक्षेप. पर्यावरण संतुलन पृथ्वी पर जीवन बरकरार रहने की एक मात्र गारंटी है लेकिन दुर्भाग्य से जीवों में सबसे बुद्धिमान समझा जाने वाला मानव ही इस संतुलन को सर्वाधिक क्षति पहुंचा रहा है. मानव की अनेक गतिविधियां धरती पर मौजूद अनेक प्राणियों के अस्तित्व को संकट में डाल रही हैं और बीते हुए कुछ दशकों में अनेक जीव प्रजातियां विलुप्त हो गईं या इसकी कगार पर हैं. यह अत्यधिक गंभीर संकट की ओर संकेत करता है. जीव चक्र की कड़ियों का नष्ट होना अंत में मानव जीवन पर ही भारी पड़ेगा और उसे इसकी कीमत अवश्य चुकाना पड़ेगी.
दो बेहद उपयोगी और जीव चक्र के महत्वपूर्ण जीवों का अस्तित्व मानव गतिविधियों के कारण खतरे में है. हाल ही में इस संबंध में समाचारपत्रों में एक बेहद चौंका देने वाला समाचार प्रकाशित हुआ. पर्यानाद के पाठकों को उसमें दी गई जानकारी से अवगत कराने का प्रयास कर रहा हूं. आशा करता हूं कि यह सबके मन में इस समस्या के प्रति कुछ सोचने का भाव पैदा अवश्य करेगा.
समाचार के अनुसार गुरिल्ला और गिद्धों के अस्तित्व पर संकट के बादल मँडरा रहे हैं और यदि जल्द ही इनके संरक्षण के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो धरती से इनका नामोनिशान मिट जाएगा. जीव-जन्तुओं की प्रजातियों की रक्षा के काम में लगे अंतरराष्ट्रीय संरक्षण संघ (आईयूसीएन) द्वारा जारी रेड लिस्ट में गुरिल्ला और गिद्धों के अस्तित्व को भारी खतरा बताया गया है. रेड लिस्ट में कहा गया है कि 20-25 साल के दौरान गुरिल्ला की 60 फीसदी आबादी नष्ट हो गई है. इस अवधि में जहाँ आवास ह्रास गुरिल्ला के लिए मुश्किल साबित हुआ है, वहीं एबोला विषाणु भी उनके लिए कहर बना हुआ है.
अफ्रीका में पाए जाने वाले पश्चिमी लोलैंड गुरिल्ला की आबादी 60 फीसदी से भी अधिक घट गई है, जबकि पश्चिमी गुरिल्ला खतरे वाली सूची से गिरकर अब अत्यधिक खतरे वाली सूची में शामिल हो गया है. सुमात्रन ओरंग उटेन (पोंगो एबेली) तथा बोर्निअन ओरंग उटेन प्रजाति के गुरिल्ले भी आईयूसीएन की अत्यधिक खतरे वाली सूची में हैं जो जल्द ही पूरी तरह विलुप्त हो सकते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि वनों को काटे जाने से हो रहे आवास ह्मस और शिकार को नहीं रोका गया तो गुरिल्ला के लिए भारी मुसीबत हो जाएगी. जंगलों में रहने वाले लोग माँस खाने के लिए अन्य वन्य जीवों की तरह ही गुरिल्ला का भी शिकार करते हैं.
वहीं दूसरी ओर कुदरत के ब्यूटीशियन कहे जाने वाले गिद्धों के बारे में आईयूसीएन ने कहा है कि भोजन की कमी, आवास ह्रास और बिजली के तारों से टकराने के कारण इनकी बड़े पैमाने पर मौत हो रही है.इसके अतिरिक्त पशुओं को दर्द निवारक के रूप में दी जाने वाली डाइक्लोफेनिक दवा भी गिद्धों के लिए कहर बनी हुई है. डाइक्लोफेनिक दवा पशुओं को फौरी तौर पर दर्द से छुटकारा तो दिला देती है, लेकिन यह उनकी माँस पेशियों में हमेशा के लिए जमा हो जाती है. पशु की मौत पर गिद्ध स्वभाव के अनुरूप उन्हें खाने के लिए आते हैं, लेकिन इस क्रम में डाइक्लोफेनिक दवा उनके शरीर में भी पहुँच जाती है. गिद्धों के शरीर में इस दवा के पहुँच जाने पर वे कुछ दिन बाद बीमार होने लगते हैं और धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं. कई देशों के साथ भारत में भी यह दवा प्रतिबंधित है, लेकिन इसके बावजूद यह मेडिकल स्टोरों पर धड़ल्ले से बिकती है.
इस बारे में में पाठकों को बताना चाहूंगा कि मेरे शहर के आस पास एक समय गिद्ध बड़ी संख्या में वास करते थे क्योंकि यह इलाका उनका पुराना आवास क्षेत्र था. इधर पिछले एक दशक से अधिक समय से किसी गिद्ध को नहीं देखा गया है. मेरे एक साथी पत्रकार ने कुछ साल पहले इस बारे में काफी खोजबीन कर एक रिपोर्ट लिखी थी. हालांकि वह काफी देर बाद लिखी गई रिपोर्ट थी लेकिन दुर्भाग्य से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई और नतीजा सामने है. इस इलाके में गिद्ध का अस्तित्व समाप्त हो गया. अपने आस-पास देखिए, कौन सी प्रजाति लुप्त हो रही है. सोचिए कि हम बच्चों को डायनासौर की भांति कितने जीवों की तस्वीर दिखाकर बताएंगे कि कभी यह भी पृथ्वी पर रहता था.
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सोमवार, २९ अक्तूबर २००७
पर्यानाद इसलिए
हर रोज वृक्ष कट रहे हैं, जीव जंतुओं पर अत्याचार हो रहा है, ओजोन की परत में छेद बढ़ रहा है, मौसम चक्र खंडित होता जा रहा है, भूजल दोहन के कारण शुद्ध पेयजल का संकट बढ़ता जा रहा है और प्रकृति आर्तनाद् कर रही है. क्या कभी आपने सोचा है कि इस सबका जिम्मेदार कौन है? ग्रीन हाउस इफैक्ट, ग्लोबल वार्मिंग, सूखा, बाढ़, दावानल, पिघलते ग्लेशियर, उफनता समुद्र, सुनामी ...... और भी न जाने क्या क्या ? लेकिन हैरत है कि हम फिर भी चेतना शून्य हैं. यह जड़ता क्यों है, इतना संवेदनहीनता की क्या वजह है ? क्यों नहीं सुन रहा कोई प्रकृति का आर्तनाद्? पर्यानाद् इसी जड़ हो चुकी चेतना को झकझोरने का छोटा सा प्रयास है. मैं कोई पर्यावरण विशेषज्ञ नहीं बल्कि एक आहत प्रकृति प्रेमी मात्र हूं. जो मुझे दिखेगा वही दिखाने का प्रयास करूंगा. मैं पर्यानाद् हूं.
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पर्यानाद
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