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Tuesday, December 18, 2007

विशालकाय चूहा और आदमी से बड़ा बिच्‍छू

इंडोनेशिया के सुदूर पूर्वी क्षेत्र में पापुआ प्रांत में खोज के दौरान वैज्ञानिकों ने दो स्तनपायी जीवों का पता लगाया है. इन जीवों में एक विशालकाय चूहा भी है. वैज्ञानिकों के अनुसार पाए गए दोनों जीव नई प्रजाति के है. 'कंजरवेशन इंटरनेशनल' और 'इंडोनेशियन इंस्टीट्यूट आफ सांइस' के वैज्ञानिक समूह ने 2005 के बाद एक बार फिर फूजा पहाड़ियों का भ्रमण किया जिस दौरान उन्हे कई नए पौधे और जानवर मिले.

इस दौरान टीम को दो स्तनपायी जीव भी मिले है जिनमें सबसे छोटे थली धारी जीव 'सरकार्टीटस पिगमी पोसम' के अलावा 'मेलोमिस' विशालकाय चूहा शामिल है. इस चूहे का आकार आमतौर पर पाए जाने वाले चूहे से पांच गुना है. खोज का नेतृत्व करने वाले 'कंजरवेशन इंटरनेशनल' के उपाध्यक्ष ब्रूस बीहल्र के अनुसार, यह अपने आप में सुखद एहसास है कि पृथ्वी पर एक जगह ऐसी भी है जहां वन्यजीव और प्राकृतिक जीव सुरक्षित हैं.


आदमी से बड़े हुआ करते थे समुद्री बिच्छू

कभी समुद्री बिच्छू मनुष्य से बड़े हुआ करते थे. इनकी लंबाई ढाई मीटर यानी आठ फुट तक हुआ करती थी. ब्रिटेन और जर्मनी के शोधकर्ताओं के हाथ लग गया है इसी तरह के बिच्छू के एक पंजे का जीवाश्म. यह जीवाश्म पश्चिमी जर्मनी के सीमांत कस्बे प्रूएम में खुदाई के दौरान पाया गया है. यह आरथ्रोपाड यानी संधिपाद श्रेणी के जीव का अब तक का सबसे बड़ा जीवाश्म है. ब्रिटिश रायल सोसाइटी के एक जर्नल बायोलाजी लेटर्स में प्रकाशित अध्ययन में यह बात कही गई है.

पश्चिमी इंग्लैंड की ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी में पृथ्वी विज्ञान संकाय के सिमोन ब्रैडी के शब्दों में यह सचमुच एक अद्भुत खोज है. सामान्य से बड़े आकार के कनखजूरे, बिच्छू, काक्रोच और कीट-पतंगों के जीवाश्म बरामद किए जाने के बारे में तो हम सब वाकिफ हैं, लेकिन अभी तक किसी रेंगने वाले प्राचीन कालीन जीव का यह शायद सबसे बड़ा जीवाश्म है.

अध्ययन में बताया गया है कि प्रूएम में बरामद पंजा 46 सेंटीमीटर का है. यह पंजा 4600 से 2550 लाख वर्ष पूर्व समुद्री बिच्छू का है जिसे जैकेलोपटेरस रेनानिया कहा जाता है. वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यह पंजा जिस बिच्छू का है उसकी लंबाई 2.33 मीटर से 2.5 मीटर के बीच का रहा होगा. यह अब तक के बरामद किसी आरथ्रोपाड के शरीर से कहीं ज्यादा बड़ा है.

3 comments :

अजित वडनेरकर said...

बंधुवर,बहुत अच्छा कर रहे हैं आप। धीरे धीरे ही सही, यूं नष्ट होने की कगार पर आकर भी अनायास बचने की पहल हो , पर्यावरण चेतना के जरिये तो कम नहीं। वर्ना सृष्टि को नष्ट करने पर तो तुले हुए हैं हम।

दिनेशराय द्विवेदी said...

आप जानकारी भी दे रहे हैं और इस तरीके से कि इंसान को सोचने पर भी विवश करे। बधाई।

शास्त्री जे सी फिलिप् said...

उपयोगी जानकारी, सरल शब्दों में!!

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