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Friday, December 7, 2007

चार सौ बाघ निगल गया मध्‍य प्रदेश

बरसों से 'टाइगर स्टेट' के दर्जे पर इतरा रहे मप्र के लिए यह खतरे की घंटी है. नई और वैज्ञानिक विधि से हुई ताजा गणना ने यह राज फाश कर दिया है कि राज्य के जंगलों और संरक्षित वन क्षेत्रों में सिर्फ 296 बाघ ही बचे हैं. जबकि कुछ समय पहले तक समूचा महकमा यह दावे करते नहीं अघाता था कि प्रदेश में बाघों की संख्या 7 सौ है. अगर सरकार के दावे तब सही थे तो यह जवाब लाजिमी है कि बाकी 400 बाघों को जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

एक खबर के अनुसार भारतीय वन्य प्राणी संस्थान देहरादून ने हाल में मप्र के बाघों की गणना की अंतिम रिपोर्ट तैयार की है. इसमें संख्या का खुलासा हुआ है. लगभग पाँच महीने पहले संस्थान ने अंतरिम रिपोर्ट में बाघों की अनुमानित संख्या 4 सौ के आसपास बताई थी. लेकिन अंतिम निष्कर्ष यह उभरा कि राज्य के खुले एवं संरक्षित क्षेत्रों में महज 296 बाघ बचे हैं. यदि शावकों को भी जोड़ लिया जाए तो यह गिनती 346 तक पहुँच रही है.

खास बात यह है कि बाघों की गणना का तरीका अब बदल गया है. वन्य प्राणी संस्थान ने वैज्ञानिक विधि अपनाते हुए बाघों का जंगल में रहवास क्षेत्र, उनका विचरण क्षेत्र, पगमार्क आदि के आधार पर गिनती का तरीका अपनाया है. इसके पहले राज्य के वनकर्मी बाघों के पगमार्क के आधार पर ही गिनती किया करते थे. ताजा रिपोर्ट से साफ है कि राज्य में बाघों की संख्या में काफी कमी आ गई है. खुले वन क्षेत्रों में तो इनकी संख्या में चिंताजनक गिरावट है. जबकि नेशनल पार्क व टाइगर रिजर्व में यह संख्या संभली हुई तो है, लेकिन पिछले दावों की तुलना में काफी कम है.

अब मप्र के पाँच टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या 232 है और खुले क्षेत्रों में महज 64 बाघ हैं. कई टाइगर रिजर्व में तो बाघों के नजर ही नहीं आने की बातें भी सामने आती रही हैं. मप्र में कुल 5 टाइगर रिजर्व हैं, जबकि 25 अभयारण्य और 9 नेशनल पार्क हैं. उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के अलग होने के बाद मप्र में वर्ष 2003 में बाघों की संख्या 711 बताई गई थी. इसके बाद वर्ष 05 व 06 में गणना की विधि को वैज्ञानिक आधार दे दिया गया.

नतीजतन जो संख्या सामने आई वह चौंकाने वाली रही. यदि यही हाल रहा तो आने वाले वक्तमें मप्र के माथे से टाइगर स्टेट का तमगा हट भी सकता है. वैसे राज्य के अधिकारी अभी यह कहकर अपने आप को दिलासा दे रहे हैं कि पूरे देश में ही 911 बाघ बचे हैं और इनमे से साढ़े तीन सौ मप्र में हैं लिहाजा तमगा छिनने का सवाल ही नहीं. यही सोच शायद बाघों के प्रति पर्याप्त समर्पण में बाधक बन रही है. वैसे इस संख्या ने राज्य के जंगलों में शिकार माफिया के सक्रिय होने तथा जंगल महकमे के लाचार और लापरवाह होने की तरफ भी उँगली उठाई है.

जानकारों का मानना है कि हालातों को तत्काल बस में नहीं किया गया तो स्थिति और बिगड़ भी सकती है. इधर सूत्र बताते हैं कि राज्य शासन शीघ्र ही वन विभाग के वरिष्ठ अफसरों को तलब कर जंगलों व संरक्षित वन क्षेत्रों की स्थिति पर नए सिरे से विचार किया जा सकता है. बाघ की कुल नौ उप प्रजातियाँ ज्ञात हैं, जिनमें से पाँच फिलहाल मौजूद हैं. भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान और म्यांमार में बंगाल या रॉयल बंगाल टाइगर पाया जाता है.

जानवरों में बाघ सबसे वजनदार कैट प्रजाति का है. साइबेरियन टाइगर में अब तक सबसे वजनदार बाघ 384 किग्रा का दर्ज है. नर बंगाल टाइगर का वजन 227 किलो तक होता है जबकि मादा का 141 किलो. बाघ कभी भी समूह में शिकार नहीं करता. यह अकेले शिकार करना पसंद करता है. इसकी दौ़ड़ने की गति 49 से 65 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है. बाघ पाँच मीटर यानी करीब 16 फुट की ऊँचाई तक कूद सकता है और 9 से 10 मीटर दूरी से शिकार पर छलाँग लगा सकता है.

2 comments :

Pratyaksha said...

आप सही इशूज़ उठा रहे हैं । लिखते रहिये । शायद किसी की आँख खुले । कमसे कम मुद्दे उठाना पहला कदम तो है ।

Aflatoon said...

वन्यजीव और आदिवासी हमेशा से साथ रहते आ रहे हिम लेकिन अब अभयारंयो के नाम पर मनुष्यों को विस्थापित किया जा रहा है | आइए होशंगाबाद जिले के चक्कर लगा कर आयें !

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