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Sunday, December 23, 2007

अफ्रीका से 17 साल में 24 हजार जिराफ गायब

अफ्रीकी जिराफ के अस्तित्व पर भारी खतरा मँडरा रहा है और यदि शीघ्र ही इनके संरक्षण के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो इनके विलुप्त होने में देर नहीं लगेगी. अमेरिकी और कीनियाई जीव विज्ञानियों ने एक अध्ययन में कहा कि जिराफ की आबादी पर भारी खतरा मँडरा रहा है.

इंटरनेशनल जिराफ वर्किंग ग्रुप की अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है सोमालिया, इथियोपिया तथा कीनिया में सशस्त्र संघर्ष और शिकार की वजह से जिराफों की संख्या घटकर सिर्फ तीन हजार रह गई है, जबकि 1990 में इनकी संख्या 27 हजार थी. अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार पश्चिमी अफ्रीकी जिराफ की संख्या लगभग 100 ही रह गई है और ये नाइजर के एक ही क्षेत्र तक सिमटकर रह गए हैं.

सात महीनों में 29 शेर मरे

भारत के गिरि वन और अन्य वन्य जन्तु अभयारण्यों में पिछले सात महीनों में 29 शेरों की मृत्यु हुई. पिछले दिनों सरकार ने संसद में यह जानकारी दी थी. इन 29 शेरों में से 22 की स्वाभाविक कारणों से, एक की कुएँ में गिरने पर, पाँच की बिजली का करन्ट लगने से तथा एक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हुई.

केंद्र सरकार का कहना है कि राज्य सरकार ने शेरों की मृत्यु के मामलों की जाँच पड़ताल कराई तथा चार संदिग्ध व्यक्तियों को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया गया है. केन्द्र सरकार ने भी शेरों की रक्षा के लिए अनेक कदम उठाए है. इसके बावजूद यह बताने को कोई तैयार नहीं है कि शेरों की आबादी में लगातार गिरावट क्‍यों आ रही है.

पर्यानाद: बात भारत के शेर या अफ्रीकी जिराफ की नहीं है. असल मुद्दा यह है कि सारी दुनिया में वन्‍य जीवों के साथ एक निर्दयी हिंसा जारी है जिसे रोकने के लिए कोई चिंति‍त नहीं है. अध्‍ययन होते जा रहे हैं, रिपोर्ट तैयार हो रही हैं लेकिन असल समस्‍या जस की तस है. यदि इस विनाश के क्रम को नहीं रोका गया तो अंत में इसकी परिणिति मानव जाति के समूल नाश के रूप में होगी.

1 comment :

सागर नाहर said...

पर्यानाद सर जी
यह आँकड़ा तो बहुत ही कम है, यों कहिये कुछ भी नहीं।
पैसेन्जर कबूतर की टोली जिन दिनों अमरीका में से निकलती थी कई कई दिनों तक आकाश में सूरज दिखना बन्द हो जाता था। किसी जगह उन्होने डेरा डाल दिला तो बीट के पहाड़ खड़े हो जाते थे और सैंकड़ों मीलों तक फसल मिनिटों में चट हो जाती थी।
जब मानव वहाँ पहुंचा और इन पक्ष्यों की वजह से परेशान हो कर कबूतरों को मारना शुरु किया, बंदूक की एक गोली से कई पक्षी ढ़ेर हो जाते थे। लोगों को इस खेल में मजा आने लगा और कबूतरों का स्वाद भी उन्हें खाने में अच्छ लगने लगा, बस फिर क्या था; अरबों अरब पक्षियों को मानव ने कुछ ही वर्षों में मार डाला और आखिरकार मार्था नाम की अंतिम कबूतरी के १९०१ में प्राण त्याग देने के बाद पैसेन्जर कबूतरों की नस्ल ही क्रूर मानव ने कत्म कर दी।
यही हाल डोडो जैसे निर्दोष पक्षी का हुआ।

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