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Wednesday, November 28, 2007

जलवायु परिवर्तन से निपटने को मदद मांगी

भारत जैसे विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन को सहने योग्य बुनियादी ढांचे के निर्माण की जरूरत पर जोर देते हुए यूएनडीपी की रिपोर्ट में इन परिवर्तनों के घातक परिणामों से निपटने के उपायों पर खर्च के लिए विकसित देशों से आगामी दस वर्ष में 86 अरब डालर की राशि देने की सिफारिश की गई है. यूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट 2007-08 में यह भी चेतावनी दी गई है कि दुनिया में जलवायु में हो रहे परिवर्तनों से गरीबों की स्थिति में सुधार की दिशा में भारत की कोशिशों को धक्का लग सकता है.

फाइटिंग क्लाइमेट चेंज ह्यूमन सोलिडरिटी इन ए डिवाइडेड व‌र्ल्ड शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में विकासशील देशों से आह्वान किया गया है वे जलवायु परिवर्तनों को सहने योग्य बुनियादी ढांचे सर्वाधिक खतरे का सामना कर रहे लोगों को अधिक सामाजिक सुरक्षा, सामुदायिक क्षमता का निर्माण तथा आपदा नियंत्रण को मजबूत बनाने के लिए अधिक प्रयास करें.

जलवायु परिवर्तनों को सहने के लिए होने वाले उपायों के वित्तपोषण के लिए रिपोर्ट में सिफारिश की है कि विकसित देश 86 अरब डालर की राशि अब से वर्ष 2016 तक विकासशील देशों को दें. रिपोर्ट जारी करते हुए योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव दुनिया के सभी भागों पर पड़ेगा, खासकर दक्षिण एशिया पर अधिक. इन परिवर्तनों के चलते मलेरिया जैसी बीमारियां बढ़ेगी वहीं हिमालय के हिमनद तथा मानसून पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा.

अहलूवालिया ने कहा कि इसलिए भारत को अकेले नहीं बल्कि सभी देशों को मिलकर इन परिवर्तनों को कम करने और इनके प्रभावों को सहने के लिए सामूहिक उपाय करने चाहिए. भारत में विकास कार्यो पर जलवायु परिवर्तनों के प्रभाव की चर्चा करते हुए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की स्थानीय प्रतिनिधि मैक्सीन ओलसान ने कहा कि भारत में लोगों के स्वास्थ्य शिक्षा और समृद्धि को सुधारने की दिशा में धीमी प्रगति हुई है. लेकिन अब भी काफी लोग विकास की दौड़ में पिछड़ रहे हैं.

ओलसान का मानना है कि अगर इन कमियों के होते हुए जलवायु परिवर्तन का खतरा भी आए तो असमानता बढ़ेगी. ओलसान ने कहा कि अगर देश को समग्र विकास की महत्वाकांक्षा को हकीकत में तब्दील करना है तो गरीब लोगों की क्षमता इन परिवर्तनों के सहने योग्य बनानी होगी.

1 comment :

हर्षवर्धन said...

गरीब देशों के लोग पहले तो सबकुछ सहने की क्षमता रखते थे। अब थोड़े पैसे वाले हुए तो, अमीरों के दिए हुए जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं। और, अब इससे निपटने के लिए उन्हीं देशों से मदद मांगनी पड़ रही है।

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