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Saturday, December 1, 2007

शायद उसकी जान नहीं बच पाई

यह सच्ची घटना कल शुक्रवार 30 नवंबर की शाम को हुई. मैं और मेरा एक मित्र अपने अपने दोपहिया वाहनों पर सवार हो‍कर कहीं जा रहे थे. शहर के बीचों-बीच एक बेहद व्‍यस्‍त मार्ग पर हमेशा की तरह भयंकर ट्रैफिक जाम लगा देख कर मूड ऑफ हो गया. वाहनों का जमावड़ा बढ़ता जा रहा था और उस नीम अंधेरे में अंडर ब्रिज के ठीक पहले सारा ट्रैफिक थम सा गया था. धीरे-धीरे अपने छोटे से दो पहिये को लुढ़काते हुए जब मैं ट्रैफिक जाम के बीच पहुंचा तो माजरा देख कर दिल को बड़ी चोट पहुंची.

वह सड़क के बीचों-बीच अधमरी सी हालत में पड़ा था. वाहन चालक बड़बड़ा रहे थे लेकिन कोई उसकी सहायता के बारे में कुछ नहीं सोच रहा था. सब एक दूसरे को कोसते हुए किसी भी तरह उसके अगल-बगल से आगे निकलने की कोशिश में लगे थे. मै किसी तरह अपना वाहन लेकर उसके पास पहंचा और सबसे पहला काम मैने अपने दोपहिए को उसके सामने आड़ा खड़ा कर एक तरफ का ट्रैफिक रोकने का किया. इस बीच मेरा दोस्‍त अपने वाहन पर आगे निकल गया.

हालत बड़ी विकट थी. मैं उसके पास पहंचा और झुक कर देखने का प्रयास किया कि वह जीवित था या नहीं .... धीरे से हाथ लगा कर उसे छुआ तो उसके शरीर में हल्‍की सी जुंबिश हुई. अचानक लोगों का जमावड़ा इकट्ठा होने लगा. एक सज्‍जन बोले, मर गया है.... दूसरे बोले कमर टूट गई है... मैं सोच रहा था कि क्‍या करूं ? जहां जाने के लिए निकला था, वहां पहुंचना भी जरूरी था. लेकिन में उसे सड़क पर इस तरह छोड़ कर भी नहीं जा सकता था.

ट्रैफिक बुरी तरह जाम हो चुका था और पब्लिक मुझसे कुछ करने की उम्‍मीद कर रही थी. यह सब कुछ केवल दो या तीन मिनट के अंदर हो गया... मैंने सोचा कि अब उसे उठाना ही होगा. पिछले हिस्‍से को धीरे से पकड़ा, उठाया ... सड़क पार की बगल में गहरे नाले के किनारे बने बगीचे की बाड़ के अंदर हाथ डाल कर उसे धीरे से छोड़ दिया. ट्रैफिक चल पड़ा किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा और मैं भी अपना वाहन उठा कर आगे बढ़ गया.

लेकिन मेरा मन अब भी मुझे कचोट रहा है. मुझे नहीं मालुम कि वह जीवित बचा या नहीं, मुझे उस समय जो सही लगा मैने कर दिया. लेकिन मन बार-बार कह रहा है कि मुझे उसकी सुरक्षा के लिए कुछ और भी करना चाहिए था जो कि मैने नहीं किया. यह आत्‍मग्‍लानि का बोध मुझ पर हावी होता जा रहा है और नहीं जानता कि मैं इससे कैसे उबरूंगा.

मैं आपसे जानना चाहता हूं कि ऐसे हालात में यदि आप होते तो क्‍या करते ? जो मैने किया क्‍या वह सही था ? या मुझे कुछ और भी करना चाहिए था ? अवश्‍य बताएं कि मैने जो किया वह सही था या गलत ? यदि उसकी मौत हो गई तो क्‍या मैं भी उसके लिए जिम्‍मेदार माना जाउंगा ?

शायद आप जानना चाहते हैं कि वह कौन था ? वह करीब पांच फीट लंबा एक सर्प था.

6 comments :

Pratyaksha said...

शायद वही जो आपने किया । लेकिन मर्सी किलिंग के बारे में क्या ख्याल है ?

मीनाक्षी said...

आपने सही किया कि उसे सड़क के किनारे सुरक्षित स्थान पर रखा लेकिन क्या हमारे देश में जानवरों के अस्पताल नहीं हैं ..जहाँ घायल जीव-जंतुओं का इलाज होता हो.
प्रत्यक्षा जी , मर्सी किलिंग बड़ा पेचीदा विषय है जिस पर घर में दो मत हैं.. भोगने वाला उसे उचित मानता है लेकिन सेवा करने वाला उसे गलत करार देता है.

पर्यानाद said...

प्रत्‍यक्षा, मैं व्‍यक्तिगत रूप से यूथेनेशिया को सही मानता हूं. ऑटोथनेशिया या सेल्‍फ किलिंग के बारे में मेरा एक बहुत पुराना लेख कभी विवाद का विषय बना था. लेकिन ऐसे मूक और निरीह प्राणियों को दया मृत्‍यु का विचार ना जाने क्‍यों अब बेहद क्रूर लगने लगा है. तथापि यदि किसी दिन मैं स्‍वयं ऐसी स्थिति में गया तो मेरा विकल्‍प यही होगा, पर जानवरों को.... पता नहीं. अपने दो पालतू कुत्तों को इसी तरह मारने का बोझ सीने पर लिए हूं. पीयू (मेरा पहला कुत्ता) की इंजेक्‍शन लगने के बाद अंतिम क्षणों में मेरी ओर देखती आंखें कभी भूल नहीं पाउंगा. उनमें कृतज्ञता थी या सवाल आज तक नहीं समझ पाया.
मीनाक्षी, मेरे शहर में जानवरों का इलाज करने के लिए ऐसा अस्‍पताल नहीं है जो रात 8 बजे खुला होता. और मैं ऐसे किसी डॉक्‍टर को नहीं जानता जो कम से कम सर्प का इलाज करने में सक्षम हो. वैसे हमारे देश में जहां आम आदमी को ही अच्‍छा इलाज नहीं मिल पाता, जानवरों के इलाज की सुविधाएं मिलने की उम्‍मीद करना क्‍या कुछ ज्‍यादा नहीं?
आप दोनों का धन्‍यवाद.

Sanjeet Tripathi said...

भाई, जानवर हो या इनसान, दोनो ही हालात में, इस आत्मग्लानि से मै गुज़र चुका हूं। पर यह समझ में नही आता कि उन हालात में और क्या किया जा सकत है!!

मीनाक्षी जी को जो जवाब आपने दिया है वही सवाल बनकर खड़ा हो जाता है !!

मीनाक्षी said...

मेरा व्यक्तिगत विचार है कि जब हम प्रकृति और जीव-जंतुओं से प्यार करना सीख जाते हैं तो अपने आप ही मानव से प्यार हो जाता है, जब मानव से प्यार हो जाता है तो स्वाभाविक है कि मानवता को नया रूप देना संभव हो जाता है.
जड़ चेतन से प्यार करने वाला मानव हित के लिए भी तड़पेगा.

विनोद पाराशर said...

आपने जो किया,बिल्कुल ठीक किया,मॆं आपकी भावनाओं का सम्मान करता हूं,लेकिन हमारे देश में तो खुद इन्सानों की हालत भी जानवरो जॆसी हो गयी हे.वास्तव में आदमी को दु:ख का अहसास उसी समय होता हॆ,जब स्वयं उसपर या उसके किसी नजदीकी पर बितती हॆ.

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